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श्री मृत्युंजय स्तोत्रं

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स्तोत्रशिव
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श्री मृत्युंजय स्तोत्रं

नंदिकेश्वर उवाच |
कैलासस्योत्तरे शृंगे शुद्धस्फटिकसन्निभे |
तमोगुणविहीने तु जरामृत्युविवर्जिते || 1 ||

सर्वतीर्थास्पदाधारे सर्वज्ञानकृतालये |
कृतांजलिपुटो ब्रह्मा ध्यानासीनं सदाशिवं || 2 ||

पप्रच्छ प्रणतो भूत्वा जानुभ्यामवनिं गतः |
सर्वार्थसंपदाधारो ब्रह्मा लोकपितामहः || 3 ||

ब्रह्मोवाच |
केनोपायेन देवेश चिरायुर्लोमशोऽभवत् |
तन्मे ब्रूहि महेशान लोकानां हितकाम्यया || 4 ||

श्रीसदाशिव उवाच |
शृणु ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि चिरायुर्मुनिसत्तमः |
संजातो कर्मणा येन व्याधिमृत्युविवर्जितः || 5 ||

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे सलिलौघपरिप्लुते |
कृतांतभयनाशाय स्तुतो मृत्युंजयः शिवः || 6 ||

तस्य संकीर्तनान्नित्यं मर्त्यो मृत्युविवर्जितः |
त्वमेव कीर्तयन् ब्रह्मन् मृत्युं जेतुं न संशयः || 7 ||

लोमश उवाच |
देवाधिदेव देवेश सर्वप्राणभृतां वर |
प्राणिनामपि नाथस्त्वं मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 8 ||

देहिनां जीवभूतोऽसि जीवो जीवस्य कारणं |
जगतां रक्षकस्त्वं वै मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 9 ||

हेमाद्रिशिखराकार सुधावीचिमनोहर |
पुंडरीक परं ज्योतिर्मुत्युंजय नमोऽस्तु ते || 10 ||

ध्यानाधार महाज्ञान सर्वज्ञानैककारण |
परित्रातासि लोकानां मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 11 ||

निहता येन कालेन सदेवासुरमानुषाः |
गंधर्वाप्सरसश्चैव सिद्धविद्याधरास्तथा || 12 ||

साध्याश्च वसवो रुद्रास्तथाश्विनिसुतावुभौ |
मरुतश्च दिशो नागाः स्थावरा जंगमास्तथा || 13 ||

अनंगेन मनोजेन पुष्पचापेन केवलं |
जितः सोऽपि त्वया ध्यानान्मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 14 ||

ये ध्यायंति परां मूर्तिं पूजयंत्यमराधिप |
न ते मृत्युवशं यांति मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 15 ||

त्वमोंकारोऽसि वेदानां देवानां च सदाशिवः |
आधारशक्तिः शक्तीनां मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 16 ||

स्थावरे जंगमे वापि यावत्तिष्ठति मेदिनी |
जीवत्वित्याह लोकोऽयं मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 17 ||

सोमसूर्याग्निमध्यस्थ व्योमव्यापिन् सदाशिवः |
कालत्रय महाकाल मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 18 ||

प्रबुद्धे चाप्रबुद्धे च त्वमेव सृजसे जगत् |
सृष्टिरूपेण देवेश मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 19 ||

व्योम्नि त्वं व्योमरूपोऽसि तेजः सर्वत्र तेजसि |
प्राणिनां ज्ञानरूपोऽसि मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 20 ||

जगज्जीवो जगत्प्राणः स्रष्टा त्वं जगतः प्रभुः |
कारणं सर्वतीर्थानां मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 21 ||

नेता त्वमिंद्रियाणां च सर्वज्ञानप्रबोधकः |
सांख्ययोगश्च हंसश्च मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 22 ||

रूपातीतः सुरूपश्च पिंडस्था पदमेव च |
चतुर्युगकलाधार मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 23 ||

रेचके वह्निरूपोऽसि सोमरूपोऽसि पूरके |
कुंभके शिवरूपोऽसि मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 24 ||

क्षयं करोऽसि पापानां पुण्यानामपि वर्धसं |
हेतुस्त्वं श्रेयसां नित्यं मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 25 ||

सर्वमायाकलातीत सर्वेंद्रियपरावर |
सर्वेंद्रियकलाधीश मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 26 ||

रूपं गंधो रसः स्पर्शः शब्दः संस्कार एव च |
त्वत्तः प्रकाश एतेषां मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 27 ||

चतुर्विधानां सृष्टीनां हेतुस्त्वं कारणेश्वर |
भावाभावपरिच्छिन्न मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 28 ||

त्वमेको निष्कलो लोके सकलं भुवनत्रयं |
अतिसूक्ष्मातिरूपस्त्वं मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 29 ||

त्वं प्रबोधस्त्वमाधारस्त्वद्बीजं भुवनत्रयं |
सत्त्वं रजस्तमस्त्वं हि मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 30 ||

त्वं सोमस्त्वं दिनेशश्च त्वमात्मा प्रकृतेः परः |
अष्टत्रिंशत्कलानाथ मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 31 ||

सर्वेंद्रियाणामाधारः सर्वभूतगणाश्रयः |
सर्वज्ञानमयानंत मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 32 ||

त्वमात्मा सर्वभूतानां गुणानां त्वमधीश्वरः |
सर्वानंदमयाधार मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 33 ||

त्वं यज्ञः सर्वयज्ञानां त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा |
शब्दब्रह्म त्वमोंकारो मृत्युंजय नमोऽस्तु ते || 34 ||

श्रीसदाशिव उवाच |
एवं संकीर्तयेद्यस्तु शुचिस्तद्गतमानसः |
भक्त्या शृणोति यो ब्रह्मन् न स मृत्युवशो भवेत् || 35 ||

न च मृत्युभयं तस्य प्राप्तकालं च लंघयेत् |
अपमृत्युभयं तस्य प्रणश्यति न संशयः || 36 ||

व्याधयो नोपपद्यंते नोपसर्गभयं भवेत् |
प्रत्यासन्नांतरे काले शतैकावर्तने कृते || 37 ||

मृत्युर्न जायते तस्य रोगान्मुंचति निश्चितं |
पंचम्यां वा दशम्यां वा पौर्णमास्यामथापि वा || 38 ||

शतमावर्तयेद्यस्तु शतवर्षं स जीवति |
तेजस्वी बलसंपन्नो लभते श्रियमुत्तमां || 39 ||

त्रिविधं नाशयेत्पापं मनोवाक्कायसंभवं |
अभिचाराणि कर्माणि कर्माण्याथर्वणानि च |
क्षीयंते नात्र संदेहो दुःस्वप्नं च विनश्यति || 40 ||

इदं रहस्यं परमं देवदेवस्य शूलिनः |
दुःखप्रणाशनं पुण्यं सर्वविघ्नविनाशनं || 41 ||

इति श्रीशिवब्रह्मसंवादे श्रीमृत्युंजय स्तोत्रं |

अर्थ

श्री मृत्युंजय स्तोत्र भगवान शिव को मृत्यु के विजेता, प्राण शक्ति के स्रोत और सभी प्राणियों के लिए अंतिम आश्रय के रूप में पूजने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र नंदी, ब्रह्मा और सदाशिव के बीच एक पवित्र संवाद के रूप में भगवान शिव की अनंत महिमा, उनकी सृष्टि, स्थिति और संहार की भूमिका, तथा मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाने की उनकी क्षमता का गहन वर्णन करता है। भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करने वालों को दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है, साथ ही सभी प्रकार के संकटों से सुरक्षा भी मिलती है।

इस स्तोत्र के प्रारंभ में, कैलाश के शुद्ध स्फटिक के समान उज्ज्वल, तमोगुण रहित और जरा-मृत्यु से विहीन उत्तर शिखर पर, ब्रह्मा सदाशिव से प्रार्थना करते हैं। लोकपितामह ब्रह्मा, सृष्टि के सभी जीवों के कल्याण की कामना से, विनम्रतापूर्वक पूछते हैं, 'हे देवेश, लोमश मुनि किस उपाय से चिरंजीवी हुए? हे महेशान, लोक के हित के लिए मुझे वह रहस्य बताएं जिससे दीर्घायु, व्याधिमुक्ति और मृत्युयोग का निवारण होता है।' इस पर सदाशिव उत्तर देते हैं, 'हे ब्रह्मन्, सुनो, जिस कर्म से मुनिश्रेष्ठ लोमश व्याधि और मृत्यु से रहित हुए, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। उस घोर एकांत काल में, यमराज के भय को नष्ट करने के लिए मृत्युंजय शिव की स्तुति की गई थी। उनके निरंतर संकीर्तन से मनुष्य मृत्यु से रहित हो जाता है। तुम भी उनका कीर्तन करने से मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।'

यह स्तोत्र भगवान शिव को काल के अधिपति, शुद्ध चेतना के स्वरूप और प्राण के आधार के रूप में चित्रित करता है। उनके नाम का स्मरण और ध्यान करने से केवल मृत्यु का भय ही नहीं, बल्कि रोगों, अकाल मृत्यु और सभी प्रकार की आपदाओं से भी रक्षा मिलती है। महर्षि मार्कंडेय द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की कथा इस स्तोत्र की अलौकिक शक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण है। नियमित रूप से और श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करने वाले भक्तों को दीर्घायु, शारीरिक बल, साहस, धन और सर्वांगीण सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

यह स्तोत्र त्रिविध पापों, मानसिक क्लेशों, बुरे सपनों और आत्मविश्वास की कमी जैसी कई आपदाओं को शांत करता है। यह केवल लौकिक लाभ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान, आंतरिक शांति और भगवान के प्रति अटूट भक्ति भी प्रदान करता है। मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को दूर कर एक सुखी और सार्थक जीवन जीने में सहायक है।

प्रयोजन (Benefits):

  • मृत्यु भय का निवारण और संकटों से रक्षा: अकाल मृत्यु, दुर्घटनाओं और किसी भी प्रकार के संकटों के भय को दूर कर भगवान शिव का सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
  • रोग मुक्ति और दीर्घायु: शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाकर स्वस्थ और लंबी आयु प्रदान करता है।
  • कर्म बंधन से मुक्ति: पूर्वजन्म के कर्म दोषों, अशुभ प्रभावों और ग्रह दोषों को दूर कर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • आंतरिक शांति और साहस: मन को शांति, स्थिरता और जीवन की चुनौतियों का सामना करने का साहस बढ़ाता है।
  • समृद्धि और कल्याण: जीवन में सुख, धन, सफलता और सर्वांगीण विकास लाता है, तथा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री मृत्युंजय स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान शिव को मृत्यु के विजेता, प्राण शक्ति के स्रोत और सभी प्राणियों के लिए अंतिम आश्रय के रूप में समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। यह शिव की महिमा और मृत्यु भय से मुक्ति दिलाने की उनकी क्षमता का वर्णन करता है।
मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, स्वच्छ मन से और भगवान शिव की मूर्ति या लिंग के सामने एकाग्रता व भक्ति के साथ करना सर्वोत्तम माना जाता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इसके पाठ से मृत्यु भय दूर होता है, रोगों से मुक्ति मिलती है, दीर्घायु प्राप्त होती है, मानसिक शांति और साहस बढ़ता है, तथा जीवन में समृद्धि आती है। यह अकाल मृत्यु से रक्षा करता है।
मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
मृत्यु भय, बीमारी, आर्थिक संकट या किसी भी प्रकार के दुर्भाग्य से पीड़ित व्यक्ति, तथा जो दीर्घायु, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखते हैं, वे सभी इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना उचित है?
सामान्यतः, प्रतिदिन कम से कम 11, 21, 51 या 108 बार पाठ करना शुभ माना जाता है। अपनी सुविधा के अनुसार संख्या चुन सकते हैं, लेकिन नियमितता सबसे महत्वपूर्ण है।
मृत्युंजय स्तोत्र का उद्भव या इतिहास क्या है?
यह स्तोत्र प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित है। यह नंदी और ब्रह्मा के प्रश्न के उत्तर में सदाशिव द्वारा शिव की महिमा का वर्णन करने के रूप में प्रकट हुआ। ऐसी मान्यता है कि मार्कंडेय ऋषि ने मृत्यु पर विजय पाने के लिए इसका पाठ किया था।

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