मृ

श्री मृत्युंजय अक्षरमाला स्तोत्रं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रशिव
0 व्यूज़

श्री मृत्युंजय अक्षरमाला स्तोत्रं

शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव गंगाधर |
मृत्युंजय पाहि मृत्युंजय पाहि मृत्युंजय पाहि मृत्युंजय ||

अद्रीशजाधीश विद्राविताघौघ भद्राकृते पाहि मृत्युंजय |

आकाशकेशामराधीशवंद्य त्रिलोकेश्वर पाहि मृत्युंजय |

इंदूपलेंदुप्रभोत्फुल्लकुंदारविंदाकृते पाहि मृत्युंजय |

ईक्षाहतानंग दाक्षायणीनाथ मोक्षाकृते पाहि मृत्युंजय |

उक्षेशसंचार यक्षेशसन्मित्र दक्षार्चित पाहि मृत्युंजय |

ऊहापथातीतमाहात्म्यसंयुक्त मोहांतका पाहि मृत्युंजय |

ऋद्धिप्रदाशेषबुद्धिप्रतारज्ञ सिद्धेश्वर पाहि मृत्युंजय |

ॠपर्वतोत्तुंगशृंगाग्रसंगांगहेतो सदा पाहि मृत्युंजय |

लुप्तात्मभक्तौघसंघाति संघातकारि प्रहन् पाहि मृत्युंजय |

लूतीकृतानेकपारादिकृत्यंतनीयाधुना पाहि मृत्युंजय |

एकादशाकार राकेंदुसंकाश शोकांतक पाहि मृत्युंजय |

ऐश्वर्यधामार्क वैश्वानराभास विश्वाधिक पाहि मृत्युंजय |

ओषध्यधीशांशुभूषाधिपापौघ मोक्षप्रद पाहि मृत्युंजय |

औद्धत्यहीनप्रबुद्धप्रभाव प्रबुद्धाखिल पाहि मृत्युंजय |

अंबासमाश्लिष्ट लंबोदरापत्य बिंबाधर पाहि मृत्युंजय |

अस्तोककारुण्य दुस्तारसंसारनिस्तारण पाहि मृत्युंजय |

कर्पूरगौरोग्र सर्पाढ्य कंदर्पदर्पापह पाहि मृत्युंजय |

खद्योतनेत्राग्निविद्युद्ग्रहाक्षादि विद्योतित पाहि मृत्युंजय |

गंधेभचर्मांगसक्तांग संसारसिंधुप्लव पाहि मृत्युंजय |

घर्मांशुसंकाश धर्मैकसंप्राप्य शर्मप्रद पाहि मृत्युंजय |

ङोत्पत्तिबीजाखिलोत्पत्तिबीजामराधीश मां पाहि मृत्युंजय |

चंद्रार्धचूड मरुन्नेत्र कांचीनगेंद्रालय पाहि मृत्युंजय |

छंदः शिरोरत्न संदोहसंवेद्य मंदस्मित पाहि मृत्युंजय |

जन्मक्षयातीत चिन्मात्रमूर्ते भवोन्मूलन पाहि मृत्युंजय |

झणच्चारुघंटामणिव्रातकांचीगुणश्रेणिक पाहि मृत्युंजय |

ञित्यष्टचिंतांतरंग प्रमोदाटनानंदहृत् पाहि मृत्युंजय |

टंकातिटंक मरुन्नेत्र भृंगांगनासंगत पाहि मृत्युंजय |

ठाळी महापाळि केळी तिरस्कारकारानल पाहि मृत्युंजय |

डोलायमानांतरंगीकृतानेकलास्येश मां पाहि मृत्युंजय |

ढक्काध्वनिध्वानदाहध्वनिभ्रांतशतृत्व मां पाहि मृत्युंजय |

णाकारनेत्रांत संतोषितात्म श्रितानंद मां पाहि मृत्युंजय |

तापत्रयात्युग्रदावानलसाक्षिरूपाव्यय पाहि मृत्युंजय |

स्थाणो मुरारातिबाणोल्लसत्पंचबाणांतक पाहि मृत्युंजय |

दीनावनाद्यंतहीनागमांतैक मानोदिता पाहि मृत्युंजय |

धात्रीधराधीशपुत्रीपरिष्वंगचित्राकृते पाहि मृत्युंजय |

नंदीशवाहारविंदासनाराध्य विंदाकृते पाहि मृत्युंजय |

पापांधकारप्रदीपाद्वयानंदरूप प्रभो पाहि मृत्युंजय |

फालांबकानंत नीलोज्ज्वलन्नेत्र शूलायुध पाहि मृत्युंजय |

बालार्कबिंबांशुभास्वज्जटाजूटिकालंकृत पाहि मृत्युंजय |

भोगीश्वराकल्प योगिप्रियाभीष्टभोगप्रद पाहि मृत्युंजय |

मौळीद्युनद्यूर्मिमालाजटाजूटि काळीप्रिय पाहि मृत्युंजय |

यज्ञेश्वराखंडतज्ञानिधे दक्षयज्ञांतक पाहि मृत्युंजय |

राकेंदुकोटिप्रतीकाशलोकादिसृड्वंदित पाहि मृत्युंजय |

लंकेशवंद्यांघ्रिपंकेरुहाशेषशंकापह पाहि मृत्युंजय |

वागीशतूणीर वंदारुमंदार शौरिप्रिय पाहि मृत्युंजय |

शर्वाखिलाधार सर्वेश गीर्वाणगर्वापह पाहि मृत्युंजय |

षड्वक्त्रतात त्रिषाड्गुण्यलोकादिसृड्वंदित पाहि मृत्युंजय |

सोमावतंसांतरंगे स्वयंधाम सामप्रिय पाहि मृत्युंजय |

हेलानिगीर्णोग्र हालाहलासह्य कालांतक पाहि मृत्युंजय |

ळाणीधराधीश बाणासनावाप्तशोणाकृते पाहि मृत्युंजय |

क्षित्यंबुतेजो मरुद्व्योम सोमात्म सत्याकृते पाहि मृत्युंजय |
[ ईशार्चितांघ्रे महेशाऽखिलावास काशीपते पाहि मृत्युंजय | ]

शंभो महादेव शंभो महादेव शंभो महादेव गंगाधर |
मृत्युंजया पाहि मृत्युंजय पाहि मृत्युंजय पाहि मृत्युंजय ||

इति श्री मृत्युंजय अक्षरमालिका स्तोत्रं |

अर्थ

श्री मृत्युंजय अक्षरमाला स्तोत्रम् भगवान महामृत्युंजय शिव की महिमा, उनकी सुरक्षा शक्ति और उनके सर्वोच्च अधिकार का गुणगान करने वाला एक अद्भुत स्तोत्र है। यह अक्षरमाला स्वरूप में है, जहाँ प्रत्येक अक्षर के माध्यम से भगवान शिव के विभिन्न दिव्य गुणों और रूपों की स्तुति की जाती है। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति 'पाहि मृत्युंजय' के हार्दिक आह्वान के साथ समाप्त होती है, जिसका अर्थ है 'हे मृत्युंजय, मेरी रक्षा करो, मुझे बचाओ'। यह भक्तों की अटूट श्रद्धा और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।

इस स्तोत्र में भगवान शिव को मृत्यु को जीतने वाला, भक्तों को सभी संकटों और अनिष्टों से बचाने वाला देवता बताया गया है। वे लोकों की उत्पत्ति के परम कारण, काल, विष और अंधकार के अधिपति हैं। शिव ज्ञान के स्रोत, मोक्ष प्रदाता और भक्तों के पापों का नाश करने वाले शरणदाता हैं। स्तोत्र में आने वाले 'अद्रीशजाधीश विद्राविताघौघ भद्राकृते पाहि मृत्युंजय' जैसे पद बताते हैं कि शिव पर्वतों के स्वामी हैं, पापों का नाश करने वाले हैं और शुभ स्वरूप धारण किए हुए हैं। 'आकाशकेशामराधीशवंद्य त्रिलोकेश्वर पाहि मृत्युंजय' स्पष्ट करता है कि शिव आकाश की तरह व्यापक हैं, देवताओं द्वारा पूजित हैं और तीनों लोकों के ईश्वर हैं।

'इंदूपालेन्दुप्रभोत्फुल्లకుंदारविंदाकृते पाहि मृत्युंजय' में भगवान शिव के मुख को चंद्रमा के समान प्रकाशमान बताया गया है। 'ईक्षाहतानंग दाक्षायणीनाथ मोक्षाकृते पाहि मृत्युंजय' का अर्थ है कि शिव ने अपनी दृष्टि से कामदेव को भस्म किया, वे दक्षायणी के पति हैं और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। 'उक्षेशसंचार यक्षेशसन्मित्र दक्षार्चित पाहि मृत्युंजय' पद बताता है कि शिव वृषभ पर विचरण करने वाले, कुबेर के मित्र और दक्ष द्वारा पूजित हैं। 'ऊहापथातीतमाहात्म्यसंयुक्ता मोहांतका पाहि मृत्युंजय' यह उद्घोष करता है कि शिव की महिमा कल्पना से परे है और वे मोह का नाश करने वाले हैं। यह प्रत्येक अक्षर शिव के अनंत गुणों की स्तुति कर भक्तों को अभय प्रदान करता है।

इस स्तोत्र का निरंतर पाठ मन को शिव स्वरूप में लीन करता है, भक्ति को गहन करता है और संसार के भय को दूर करता है। 'पाहि मृत्युंजय' का मंत्र स्पंदन बार-बार दोहराया जाना हमारे मन में शिव की उपस्थिति को स्थापित करता है, जिससे भय का नाश होता है और भक्ति का प्रकाश फैलता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भक्तों के लिए शिव के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का एक सेतु है, जो सभी कष्टों से मुक्ति और आंतरिक शांति प्राप्त करने में सहायता करता है।

लाभ (Benefits):

  • भय निवृत्ति: जीवन के मानसिक और शारीरिक भयों को दूर करता है, मृत्यु, दुर्घटना और दोषों के भय को कम करता है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु: रोगों से रक्षा प्रदान कर, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद देता है।
  • मानसिक शांति और धैर्य: मन को धैर्य, स्थिरता और आंतरिक शांति प्रदान करता है, भक्ति की गहराई को बढ़ाता है।
  • परिवार और वंश की रक्षा: परिवार के सदस्यों की रक्षा करता है, वंश की भलाई सुनिश्चित करता है और घर में शांति का वातावरण बनाता है।
  • पाप नाश और मोक्ष: भक्तों के पापों का नाश कर, अंततः मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री मृत्युंजय अक्षरमाला स्तोत्रम् क्या है?
यह भगवान महामृत्युंजय शिव को समर्पित एक अद्वितीय स्तोत्र है, जिसमें प्रत्येक अक्षर के माध्यम से शिव के विभिन्न गुणों और महिमा का गान किया जाता है। यह 'पाहि मृत्युंजय' के आह्वान के साथ समाप्त होता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। विशेष रूप से सोमवार या शिव को समर्पित किसी भी शुभ दिन पर इसका पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री मृत्युंजय अक्षरमाला स्तोत्रम् के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इसके पाठ से मृत्यु भय दूर होता है, रोगों से रक्षा मिलती है, दीर्घायु की प्राप्ति होती है, मानसिक शांति और धैर्य बढ़ता है, और परिवार को सुरक्षा मिलती है। यह भक्ति और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाता है।
किन्हें इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
मृत्यु के भय से पीड़ित व्यक्तियों को, लंबी बीमारियों से मुक्ति चाहने वालों को, मानसिक शांति और धैर्य की तलाश करने वालों को, और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक किसी भी भक्त को इसका पाठ करना चाहिए।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना शुभ होता है?
पाठ की संख्या व्यक्तिगत श्रद्धा और समय पर निर्भर करती है। प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार पाठ करना शुभ माना जाता है।
इस स्तोत्र का मूल या रचनाकार कौन हैं?
यह स्तोत्र प्राचीन हिंदू धार्मिक ग्रंथों का हिस्सा है, और इसके विशिष्ट रचनाकार के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसे सनातन परंपरा के माध्यम से आया हुआ माना जाता है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...