श्री मेधा दक्षिणामूर्ति मंत्रवर्णपद स्तुतिः
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरंति त्रयः शिखाः |
तस्मै तारात्मने मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 1 ||
नत्वायं मुनयः सर्वे परं यांति दुरासदं |
नकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 2 ||
मोहजालविनिर्मुक्तो ब्रह्मविद्याति यत्पदं |
मोकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 3 ||
भवमाश्रित्य यं विद्वान् नभवोह्यभवत्परः |
भकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 4 ||
गगनाकारवद्भांतमनुभात्यखिलं जगत् |
गकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 5 ||
वटमूलनिवासो यो लोकानां प्रभुरव्ययः |
वकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 6 ||
तेजोभिर्यस्य सूर्योऽसौ कालक्लुप्तिकरो भवेत् |
तेकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 7 ||
दक्षत्रिपुरसंहारे यः कालविषभंजने |
दकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 8 ||
क्षिप्रं भवति वाक्सिद्धिर्यन्नामस्मरणान्नृणां |
क्षिकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 9 ||
णाकारवाच्यो यः सुप्तं संदीपयति मे मनः |
णाकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 10 ||
मूर्तयो ह्यष्टधा यस्य जगज्जन्मादिकारणं |
मूकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 11 ||
तत्त्वं ब्रह्मासि परममिति यद्गुरुबोधितः |
सरेफतात्मने मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 12 ||
येयं विदित्वा ब्रह्माद्या ऋषयो यांति निर्वृतिं |
येकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 13 ||
महतां देवमित्याहुर्निगमागमयोः शिवः |
मकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 14 ||
सर्वस्य जगतोह्यंतर्बहिर्यो व्याप्य संस्थितः |
ह्यकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 15 ||
त्वमेव जगतः साक्षी सृष्टिस्थित्यंतकारणं |
मेकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 16 ||
दामेति धातृसृष्टेर्यत्कारणं कार्यमुच्यते |
धांकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 17 ||
प्रकृतेर्यत्परं ध्यात्वा तादात्म्यं याति वै मुनिः |
प्रकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 18 ||
ज्ञानिनोयमुपास्यंति तत्त्वातीतं चिदात्मकं |
ज्ञाकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 19 ||
प्रज्ञा संजायते यस्य ध्याननामार्चनादिभिः |
प्रकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 20 ||
यस्य स्मरणमात्रेण नरो मुक्तः सबंधनात् |
यकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 21 ||
छवेर्यन्नेंद्रियाण्यापुर्विषयेष्विह जाड्यतां |
छकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 22 ||
स्वांतेविदां जडानां यो दूरे तिष्ठति चिन्मयः |
स्वाकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 23 ||
हारप्रायफणींद्राय सर्वविद्याप्रदायिने |
हाकाररूपिणे मेधादक्षिणामूर्तये नमः || 24 ||
इति श्रीमेधादक्षिणामूर्ति मंत्रवर्णपद स्तुतिः ||
अर्थ
श्री मेधा दक्षिणामूर्ति मंत्रवर्णपद स्तुति एक अत्यंत गोपनीय और अद्भुत स्तोत्र है जो ज्ञान स्वरूप भगवान शिव, दक्षिणामूर्ति की महिमा का गान करता है। इस स्तोत्र में, प्रत्येक संस्कृत अक्षर—जैसे अ, न, म, भ, ग आदि—से संबंधित परब्रह्म तत्व को दक्षिणामूर्ति के रूप में वर्णित किया गया है। दक्षिणामूर्ति को ज्ञान, मेधा शक्ति, चेतना और जीवन सत्य के मूल कारण के रूप में स्तुत किया जाता है। यह केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि प्रत्येक अक्षर के माध्यम से दिव्य ज्ञान को प्रकट करने का एक अनूठा मार्ग है।
स्तोत्र का आरंभ 'ॐ' अक्षर से होता है, जिसे ब्रह्म तत्व का सार बताया गया है। 'ॐ' नामक एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करने वाले, तारात्मक ज्ञान प्रदान करने वाले मेधा दक्षिणामूर्ति को यहाँ प्रणाम किया जाता है। अगले श्लोक विभिन्न अक्षरों के माध्यम से दक्षिणामूर्ति के दिव्य स्वरूप को उजागर करते हैं। 'नकाररूपिणि' के रूप में वे सभी मुनियों के लिए भी अगम्य परम सत्य हैं। 'मोकाररूपिणि' के रूप में वे मोह से मुक्ति दिलाने वाले, ब्रह्मज्ञान प्रदान करने वाले चैतन्य मूर्ति हैं। 'भकाररूपिणि' के रूप में वे भवसागर से बाहर निकलने का मार्ग दिखाने वाले गुरु स्वरूप हैं। 'गकाररूपिणि' के रूप में वे गगन के समान सर्वव्यापी हैं, जिनकी कांति से संपूर्ण जगत प्रकाशित होता है। 'वकाररूपिणि' के रूप में वे वटवृक्ष के मूल में निवास करने वाले, लोकों के अविनाशी प्रभु परब्रह्म हैं।
बाद के श्लोकों में, दक्षिणामूर्ति को सूर्य को प्राणशक्ति देने वाला तेज ('तेकार'), त्रिपुरा का संहार करने वाला ('दकार'), और तुरंत वाक् सिद्धि प्रदान करने वाला ('क्षिकारक') बताया गया है। यह स्तोत्र केवल भौतिक ज्ञान तक सीमित नहीं है; यह मन को जागृत करने वाले, अष्ट मूर्तियों के स्रोत, 'तत्त्वमसि' जैसे परम सत्य को प्रकट करने वाले, सृष्टि, स्थिति और लय के कारणभूत परम साक्षी के रूप में दक्षिणामूर्ति को चित्रित करता है। 'प्र', 'ज्ञ', 'य', 'च', 'स्व', 'हा' जैसे अक्षर ज्ञान की पूरी श्रृंखला, ब्रह्मांडीय शक्ति और शुद्ध चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे मुक्ति के मूल कारण हैं; उनका ध्यान करने वालों को ज्ञान प्राप्त होता है; उनके नाम का जप करते ही बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।
इस स्तोत्र का प्रत्येक पद दक्षिणामूर्ति के उच्चतर तत्व, उनके चिदात्मक रूप, उपास्य मूर्ति, प्रकृति परब्रह्म और मन को प्रकाश देने वाले परमात्मात्व का वर्णन करता है। अंत में, सभी विद्याओं को प्रदान करने वाले महागुरु दक्षिणामूर्ति को प्रणाम कर स्तोत्र पूर्ण होता है। इस स्तोत्र का पाठ ज्ञान वृद्धि, वाक् सिद्धि, मेधा वृद्धि, मोह निवारण, अज्ञान दूर होकर आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए अत्यंत पुण्यप्रद है। यह छात्रों, ज्ञान seekers और आध्यात्मिक साधकों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
लाभ (Benefits):
- मेधा शक्ति और ज्ञान में वृद्धि: इस स्तोत्र के पाठ से बुद्धि, स्मरण शक्ति और ग्रहण क्षमता बढ़ती है, जिससे ज्ञानार्जन सुगम होता है।
- वाक्पटुता और संचार कौशल: 'क्षि'कार स्वरूप के स्मरण से वाक् सिद्धि प्राप्त होती है, जिससे वाणी में स्पष्टता, प्रभाव और सिद्धि आती है।
- मोह और अज्ञान का निवारण: भगवान दक्षिणामूर्ति मोह के जाल से मुक्ति दिलाते हैं, अज्ञान को दूर करते हैं और आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन करते हैं।
- शिक्षा और परीक्षाओं में सफलता: छात्रों के लिए एकाग्रता, बेहतर परिणाम और अध्ययन में प्रगति के लिए यह स्तोत्र सहायक है।
- आध्यात्मिक विकास और शांति: गुरु की कृपा प्राप्त होती है, आंतरिक शांति, आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री मेधा दक्षिणामूर्ति मंत्रवर्णपद स्तुति क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री मेधा दक्षिणामूर्ति स्तुति के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या रचनाकार कौन है?
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