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श्री महालक्ष्मी स्तोत्रं

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स्तोत्रलक्ष्मी देवी
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सर्वसौभाग्यरूपा त्वं सर्वसंपत्स्वरूपिणी ।
सर्वकल्याणरूपा त्वं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥1॥

जनश्रीस्त्वं वनश्रीस्त्वं मंगलश्रीः स्वभावतः ।
ब्रह्मश्रीश्च मोक्षश्रीश्च महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥2॥

शांतिस्तुष्टिस्तथापुष्टिर्मेधा कीर्तिश्च सन्मतिः ।
दैवीसंपत्स्वरूपा त्वं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥3॥

मोक्षसाधनसंपत्तिरायुरारोग्यसंसृतिः ।
सर्वैश्वर्यस्वरूपा त्वं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥4॥

भक्तियोगा ब्रह्मनिष्ठात्वमेवैकाखिलेश्वरी ।
तदैव ब्रह्मरूपा च महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥5॥

सच्चिदानंदरूपा त्वं जगन्माता जगत्पिता ।
विष्णुब्रह्ममहेशास्त्वं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥6॥

यतो हि जायते विश्वं यतश्च परिपाल्यते ।
यस्मिन् संलीयते ह्यंते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥7॥

यच्च किंचित् सुष्ठुजातं यच्च किंचित् शुभं सुखं ।
तदेवैकात्मरूपेण महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥8॥

वेदस्मृतिः सदाचार आत्मतुष्टिर्गुरोः कृपा ।
सर्वोपास्यस्वरूपा त्वं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥9॥

वशमेवाद्वयं ब्रह्म नित्यानंदैकमात्रतः ।
भेदबुद्धिमपास्यैवं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥10॥

इति श्री श्रीधरस्वामीविरचितं महालक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णं ॥

अर्थ

श्री महालक्ष्मी स्तोत्रम, जो श्री श्रीधर स्वामी द्वारा रचित है, देवी महालक्ष्मी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र केवल धन की देवी के रूप में लक्ष्मी की पूजा नहीं करता, बल्कि उन्हें परम ब्रह्म स्वरूपिणी, समस्त सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार का कारणभूत महाशक्ति के रूप में महिमामंडित करता है। इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक महालक्ष्मी के दिव्य गुणों, उनकी सर्वव्यापकता और उनके करुणामय स्वभाव को उजागर करता है।

यह स्तोत्र 'सर्वसौभाग्यरूपा त्वं' (तुम समस्त सौभाग्य का स्वरूप हो) से शुरू होता है, यह घोषणा करते हुए कि महालक्ष्मी सभी शुभता, धन और कल्याण का मूर्त रूप हैं। वह केवल भौतिक धन प्रदान करने वाली नहीं हैं, बल्कि समस्त सौभाग्य का मूल हैं। दूसरा श्लोक 'जनश्रीस्त्वं वनश्रीस्त्वं' कहकर वर्णन करता है कि वह घरों में समृद्धि, वनों में प्रकृति की सुंदरता, मनुष्यों में सौभाग्य और मोक्ष के आनंद को प्रदान करने वाली ब्रह्मश्री स्वरूपिणी हैं। तीसरे श्लोक में बताया गया है कि वह शांति, संतोष, स्वास्थ्य, बुद्धि और कीर्ति का रूप हैं, जो दिव्य संपदा का मूल स्रोत हैं।

चौथे श्लोक में, महालक्ष्मी को मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक संपत्ति, दीर्घायु, स्वास्थ्य और समस्त ऐश्वर्य का मूल स्वरूप बताया गया है। भक्ति, योग और ब्रह्मनिष्ठा – ये सभी वही हैं, और वह समस्त लोकों की एकमात्र परमेश्वरी हैं, जैसा कि पाँचवाँ श्लोक घोषित करता है। वह सत्-चित्-आनंद स्वरूपिणी हैं, जगत की माता और पिता हैं, और ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में प्रकट होती हैं, यह छठा श्लोक वर्णन करता है। उनसे ही यह ब्रह्मांड उत्पन्न होता है, उन्हीं के द्वारा पाला जाता है, और अंत में उन्हीं में विलीन हो जाता है, सातवाँ श्लोक उनकी सृष्टि, स्थिति और संहारक शक्ति पर जोर देता है।

आठवाँ श्लोक बताता है कि सृष्टि में जो कुछ भी सुंदर, सुखमय और शुभ है, वह सब उनके एकात्म स्वरूप से ही उत्पन्न होता है। वेद, स्मृतियाँ, सदाचार, गुरु की कृपा – ये सभी उनके विभिन्न रूप हैं, और वह सभी के द्वारा पूजनीय देवी हैं, यह नौवाँ श्लोक समझाता है। अंत में, यह स्तोत्र स्पष्ट करता है कि वह अद्वैत ब्रह्म स्वरूप, नित्यानंदमयी परमात्मा हैं, और जो भेद-भाव रहित होकर उनका ध्यान करते हैं, वे मोक्ष का आनंद प्राप्त करते हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि प्राप्त होती है।

लाभ (Benefits):

  • समस्त सौभाग्य की प्राप्ति: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से जीवन में धन, समृद्धि, खुशी और सभी प्रकार के शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु: चूंकि महालक्ष्मी स्वास्थ्य और दीर्घायु का स्वरूप हैं, इस स्तोत्र का पाठ उत्तम स्वास्थ्य और लंबी उम्र प्रदान करता है।
  • ज्ञान और सद्बुद्धि में वृद्धि: लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, वह बुद्धि, ज्ञान और सद्बुद्धि प्रदान करने वाली भी हैं। इससे ज्ञान बढ़ता है और सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।
  • शांति और संतोष: यह स्तोत्र मन को शांति, सुकून और संतोष प्रदान करता है, जिससे आंतरिक खुशी और संतुष्टि मिलती है।
  • मोक्ष की साधना: महालक्ष्मी को परमात्मा स्वरूपिणी के रूप में पूजने से आध्यात्मिक प्रगति होती है और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री महालक्ष्मी स्तोत्रं क्या है?
श्री महालक्ष्मी स्तोत्रं श्री श्रीधर स्वामी द्वारा रचित एक पवित्र स्तोत्र है, जो देवी महालक्ष्मी को समस्त धन, सौभाग्य, ज्ञान और मोक्ष की देवी के रूप में स्तुति करता है। यह उन्हें केवल धन की देवी के रूप में नहीं, बल्कि परम ब्रह्म स्वरूपिणी के रूप में पूजता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम को स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। विशेष रूप से शुक्रवार को या त्योहारों पर इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। देवी की प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर पाठ करना उत्तम होता है।
श्री महालक्ष्मी स्तोत्रं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से आर्थिक समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, मानसिक शांति, बुद्धि में वृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है। यह सभी प्रकार के सौभाग्य प्रदान कर जीवन को सुखमय बनाता है।
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति, बिना किसी भेद-भाव के, शुद्ध भक्ति और श्रद्धा के साथ इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। धन, ज्ञान, शांति और आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखने वाले सभी लोगों के लिए यह लाभकारी है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, प्रतिदिन कम से कम एक बार पाठ करना शुभ माना जाता है। अधिक लाभ के लिए 11, 21, 51 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। निरंतर पाठ से मन को शांति और एकाग्रता मिलती है।
इस स्तोत्र का मूल या रचनाकार कौन हैं?
इस श्री महालक्ष्मी स्तोत्रं की रचना महान संत और आध्यात्मिक गुरु श्री श्रीधर स्वामी ने की है। उनके गहरे ज्ञान और भक्ति के परिणामस्वरूप यह स्तोत्र भक्तों के लिए उपलब्ध हुआ है।

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