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श्री महालक्ष्मी स्तव कवच पूजा

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स्तोत्रलक्ष्मी देवी
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श्रीगणेशाय नमः ।

नारद उवाच ।
आविर्भूय हरिस्तस्मै किं स्तोत्रं कवचं ददौ ।
महालक्ष्म्याश्च लक्ष्मीशस्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥1॥

नारायण उवाच ।
पुष्करे च तपस्तप्त्वा विरराम सुरेश्वरः ।
आविर्बभूव तत्रैव क्लिष्टं दृष्ट्वा हरिः स्वयं ॥ 2॥

तमुवाच हृषीकेशो वरं वृणु यथेप्सितं ।
स च वव्रे वरं लक्ष्मीमीशस्तस्मै ददौ मुदा ॥ 3॥

वरं दत्त्वा हृषीकेशः प्रवक्तुमुपचक्रमे ।
हितं सत्यं च सारं च परिणामसुखावहं ॥ 4॥

मधुसूदन उवाच ।
गृहाण कवचं शक्र सर्वदुःखविनाशनं ।
परमैश्वर्यजनकं सर्वशत्रुविमर्दनं ॥ 5॥

ब्रह्मणे च पुरा दत्तं विष्टपे च जलप्लुते ।
यद्धृत्वा जगतां श्रेष्ठः सर्वैश्वर्ययुतो विधिः ॥ 6॥

बभूवुर्मनवः सर्वे सर्वैश्वर्ययुता यतः ।
सर्वैश्वर्यप्रदस्यास्य कवचस्य ऋषिर्विधिः ॥ 7॥

पंक्तिश्छंदश्च सा देवी स्वयं पद्मालया वरा ।
सिद्ध्यैश्वर्यसुखेष्वेव विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ 8॥

यद्धृत्वा कवचं लोकः सर्वत्र विजयी भवेत् ।
मस्तकं पातु मे पद्मा कंठं पातु हरिप्रिया ॥ 9॥

नासिकां पातु मे लक्ष्मीः कमला पातु लोचने ।
केशान्केशवकांता च कपालं कमलालया ॥ 10॥

जगत्प्रसूर्गंडयुग्मं स्कंधं संपत्प्रदा सदा ।
ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु ॥ 11॥

ॐ ह्रीं श्रीं पद्मालयायै स्वाहा वक्षः सदाऽवतु ।
पातु श्रीर्मम कंकालं बाहुयुग्मं च ते नमः ॥ 12॥

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे संततं चिरं ।
ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितंबकं ॥ 13॥

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वांगं पातु मे सदा ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः ॥ 14॥

इति ते कथितं वत्स सर्वसंपत्करं परं ।
सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतं ॥ 15॥

गुरुमभ्यर्च्य विधिवत्कवचं धारयेत्तु यः ।
कंठे वा दक्षिणे बाहौ स सर्वविजयी भवेत् ॥ 16॥

महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन ।
तस्यच्छायेव सततं सा च जन्मनि जन्मनि ॥ 17॥

इदं कवचमज्ञात्वा भजेल्लक्ष्मीं स मंदधीः ।
शतलक्षप्रजापेऽपि न मंत्रः सिद्धिदायकः ॥ 18॥

नारायण उवाच ।
दत्त्वा तस्मै च कवचं मंत्रं वै षोडशाक्षरं ।
संतुष्टश्च जगन्नाथो जगतां हितकारणं ॥ 19॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो महालक्ष्म्यै स्वाहा ।
ददौ तस्मै च कृपया चेंद्राय च महामुने ॥ 20॥

ध्यानं च सामवेदोक्तं गोपनीयं सुदुर्लभं ।
सिद्धैर्मुनींद्रैर्दुष्प्राप्यं ध्रुवं सिद्धिप्रदं शुभं ॥ 21॥

श्वेतचंपकवर्णाभां शतचंद्रसमप्रभां ।
वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषितां ॥ 22॥

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां भक्तानुग्रहकारिकां ।
कस्तूरीबिंदुमध्यस्थं सिंदूरं भूषणं तथा ॥ 23॥

अमूल्यरत्नरचितकुंडलोज्ज्वलभूषणं ।
बिम्रती कबरीभारं मालतीमाल्यशोभितं ॥ 24॥

सहस्रदलपद्मस्थां स्वस्थां च सुमनोहरां ।
शांतां च श्रीहरेः कांतां तां भजेज्जगतां प्रसूं ॥ 25॥

ध्यानेनानेन देवेंद्रो ध्यात्वा लक्ष्मीं मनोहरां ।
भक्त्या संपूज्य तस्यै च चोपचारांस्तु षोडश ॥ 26॥

स्तुत्वाऽनेन स्तवेनैव वक्ष्यमाणेन वासव ।
नत्वा वरं गृहीत्वा च लभिष्यसि च निर्वृतिं ॥ 27॥

स्तवनं शृणु देवेंद्र महालक्ष्म्याः सुखप्रदं ।
कथयामि सुगोप्यं च त्रिषु लोकेषु दुर्लभं ॥ 28॥

नारायण उवाच ।
देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि न क्षमाः स्तोतुमीश्वराः ।
बुद्धेरगोचरां सूक्ष्मां तेजोरूपां सनातनीं ।
अत्यनिर्वचनीयां च को वा निर्वक्तुमीश्वरः ॥ 29॥

स्वेच्छामयीं निराकारां भक्तानुग्रहविग्रहां ।
स्तौमि वाङ्मनसोः पारां किंवाऽहं जगदंबिके ॥ 30॥

परां चतुर्णां वेदानां पारबीजं भवार्णवे ।
सर्वसस्याधिदेवीं च सर्वासामपि संपदां ॥ 31॥

योगिनां चैव योगानां ज्ञानानां ज्ञानिनां तथा ।
वेदानां वै वेदविदां जननीं वर्णयामि किं ॥ 32॥

यया विना जगत्सर्वमबीजं निष्फलं ध्रुवं ।
यथा स्तनंधयानां च विना मात्रा सुखं भवेत् ॥ 33॥

प्रसीद जगतां माता रक्षास्मानतिकातरान् ।
वयं त्वच्चरणांभोजे प्रपन्नाः शरणं गताः ॥ 34॥

नमः शक्तिस्वरूपायै जगन्मात्रे नमो नमः ।
ज्ञानदायै बुद्धिदायै सर्वदायै नमो नमः ॥ 35॥

हरिभक्तिप्रदायिन्यै मुक्तिदायै नमो नमः ।
सर्वज्ञायै सर्वदायै महालक्ष्म्यै नमो नमः ॥ 36॥

कुपुत्राः कुत्रचित्संति न कुत्रापि कुमातरः ।
कुत्र माता पुत्रदोषं तं विहाय च गच्छति ॥ 37॥

स्तनंधयेभ्य इव मे हे मातर्देहि दर्शनं ।
कृपां कुरु कृपासिंधो त्वमस्मान्भक्तवत्सले ॥ 38॥

इत्येवं कथितं वत्स पद्मायाश्च शुभावहं ।
सुखदं मोक्षदं सारं शुभदं संपदः प्रदं ॥ 39॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यं पूजाकाले च यः पठेत् ।
महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन ॥ 40॥

इत्युक्त्वा श्रीहरिस्तं च तत्रैवांतरधीयत ।
देवो जगाम क्षीरोदं सुरैः सार्धं तदाज्ञया ॥ 41॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे गणपतिखंडे
नारदनारायणसंवादे लक्ष्मीस्तवकवचपूजाकथनं
नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ 22॥

अर्थ

श्री महालक्ष्मी स्तव कवच पूजा देवी महालक्ष्मी की भक्ति, सुरक्षा और आह्वान का एक दिव्य स्तोत्र है। यह नारद मुनि और भगवान नारायण के बीच एक संवाद के रूप में वर्णित है, जिसमें देवी के पवित्र कवच (सुरक्षा कवच) का वर्णन किया गया है। भगवान विष्णु ने नारद को, और फिर इंद्र तथा अन्य ऋषियों को महालक्ष्मी कवच का रहस्य बताया, जो धन, विजय, स्वास्थ्य और दिव्य कृपा प्रदान करता है, जबकि दुख, गरीबी और नकारात्मकता को नष्ट करता है।

इस स्तोत्र में, महालक्ष्मी को पद्मा (कमल से जन्मी), हरि-प्रिया (विष्णु की पत्नी), और जगत्-प्रसूः (ब्रह्मांड की माता) जैसे विभिन्न रूपों में आह्वान किया जाता है, जो शरीर के प्रत्येक अंग को सुरक्षा प्रदान करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह कवच स्वयं भगवान विष्णु ने सभी प्राणियों के लाभ के लिए प्रदान किया था। ब्रह्मा को सृष्टि की शुरुआत में यह कवच मिला था, जिसके माध्यम से उन्होंने सभी ऐश्वर्य प्राप्त किए और लोकों का निर्माण करने में सक्षम हुए। जो व्यक्ति इस कवच को धारण करते हैं या इसका पाठ करते हैं, वे गरीबी, बीमारी, अपशकुन और शत्रुओं से सुरक्षित रहते हैं।

यह पूजा विधि केवल पाठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ध्यान, जप और भक्तिपूर्ण आराधना भी शामिल है। भक्त धन, शांति, मोक्ष और देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए इस कवच का पाठ करते हैं। यह स्पष्ट किया गया है कि केवल देवी का स्मरण करने की तुलना में, इस कवच का ज्ञानपूर्वक पाठ करने से अधिक फल प्राप्त होता है। यह एक परम रहस्यमय कवच है जो देवताओं, मनुष्यों और सभी संपत्तियों की रक्षा करने की शक्ति रखता है। इस कवच का पाठ करने से भक्त सभी दुखों से मुक्ति पाते हैं, ऐश्वर्यवान बनते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं।

स्तोत्र के अंत में, भक्त क्षमा, अटूट भक्ति और महालक्ष्मी देवी की स्थायी उपस्थिति अपने घर और हृदय में मांगता है। इस स्तव कवच का पाठ शुक्रवार, दीपावली के दौरान या वैभव लक्ष्मी व्रत के समय करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग प्रतिदिन भक्तिपूर्वक इसका जप करते हैं, उन्हें धन, धान्य, स्वास्थ्य और सभी प्रकार की सफलताएँ प्राप्त होती हैं, और महालक्ष्मी सदा उनके घर में निवास कर उन्हें आशीर्वाद देती हैं।

लाभ (Benefits):

  • समस्त दुखों का नाश: इस कवच का पाठ करने से जीवन के सभी दुख, कष्ट और नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होती हैं, जिससे मन को शांति मिलती है।
  • ऐश्वर्य की वृद्धि: महालक्ष्मी धन, धान्य और समृद्धि की देवी हैं, इसलिए इस कवच के नियमित पाठ से भक्तों को अक्षय धन और भौतिक समृद्धि प्राप्त होती है।
  • शत्रुओं पर विजय: यह कवच शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और सभी बाधाओं को दूर करने की शक्ति प्रदान करता है, जिससे जीवन में सफलता और जीत प्राप्त होती है।
  • स्वास्थ्य और सुरक्षा: महालक्ष्मी कवच शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करता है, और सभी प्रकार की बीमारियों और आपदाओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • दिव्य कृपा और शांति: इस कवच का भक्तिपूर्वक पाठ करने से महालक्ष्मी देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है, और घर में हमेशा शांति, सुख और सकारात्मक वातावरण बना रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री महालक्ष्मी स्तव कवच पूजा क्या है?
यह देवी महालक्ष्मी की भक्ति, सुरक्षा और आह्वान का एक दिव्य स्तोत्र है, जिसे नारद और नारायण के संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह महालक्ष्मी के पवित्र कवच के महत्व को बताता है, जो धन, विजय और सुरक्षा प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तव कवच का पाठ शुक्रवार को, दीपावली या वैभव लक्ष्मी व्रत के दौरान करना श्रेष्ठ है। इसे प्रतिदिन भक्तिपूर्वक और ध्यान के साथ जपना चाहिए।
श्री महालक्ष्मी स्तव कवच पूजा के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से सभी दुख दूर होते हैं, ऐश्वर्य बढ़ता है। शत्रुओं पर विजय, उत्तम स्वास्थ्य और दिव्य कृपा प्राप्त होती है, जिससे घर में शांति बनी रहती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति जो धन, धान्य, स्वास्थ्य, विजय और सभी शुभ फल प्राप्त करना चाहता है, वह इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। यह दरिद्रता, बीमारियों और शत्रुओं से मुक्ति चाहने वालों के लिए भी श्रेष्ठ है।
यह कवच कितनी बार पढ़ना चाहिए?
सर्वोत्तम परिणामों के लिए, इसे प्रतिदिन या कम से कम शुक्रवार को भक्तिपूर्वक एक या तीन बार पढ़ना चाहिए। नियमित पाठ से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति या स्रोत क्या है?
इस स्तोत्र की उत्पत्ति नारद मुनि और भगवान नारायण के बीच एक संवाद के रूप में हुई है। भगवान नारायण ने स्वयं इस महालक्ष्मी कवच का रहस्य इंद्र और अन्य ऋषियों को बताया था।

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