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श्री महालक्ष्मी स्तवः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रलक्ष्मी देवी
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मयि कुरु मंगलमंबुजवासिनि मंगलदायिनि मंजुगते
    मतिमलहारिणि मंजुळभाषिणि मन्मथतातविनोदरते ।
मुनिजनपालिनि मौक्तिकमालिनि सद्गुणवर्षिणि साधुनुते
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥1॥

कलिमलहारिणि कामितदायिनि कांतविधायिनि कांतहिते
    कमलदलोपम कम्रपदद्वय शिंजितनूपुर नादयुते ।
कमलसुमालिनि कांचनहारिणि लोकसुखैषिणि कामिनुते
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥2॥

कुवलयमोचकनेत्रकृपापरिपालित संश्रितभक्तकुले
    गुरुवर शंकरसन्नुतितुष्टिसुवृष्टसुहेममयामलके ।
रविकुलवारिधिचंद्रसमादरमंत्रगृहीतसुपाणितले
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥3॥

कुलललनाकुललाळितलोलविलोचनपूर्णकृपाकमले
    चलदळकावलिवारिदमध्यगचंद्रसुनिर्मलफालतले ।
मणिमयभासुरकर्णविभूषणकांतिपरिष्कृतगंडतले
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥4॥

सुरगणदानवमंडललोहितसागरसंभवदिव्यतनो
    सकलसुरासुरदेवमुनीनतिहाय च दोषदृशाहि रमे ।
गुणगणवारिधिनाथमहोरसिदत्तसुमावलिजातमुदे
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥5॥

कनकघटोपमकुंकुमशोभित हारसुरंजित दिव्यकुचे
    कमलजपूजित कुंकुमपंगिल कांतपदद्वयतामरसे ।
करधृतकंजसुमे कटिवीतदूकुलमनोहरकांतिवृते
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥6॥

सुरपतिपूजनदत्तमनोहरचंदनकुंकुमसंवलिते
    सुरयुवतीकृतवादननर्तनवीजनवंदनसम्मुदिते ।
निजरमणारुणपादसरोरुहमर्दनकल्पनतोषयुते
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥7॥

दिनमणिसन्निभदीपसुदीपित रत्नसमावृतदिव्यगृहे
    सुतधनधान्यमुखाभिधलक्ष्म्यभिसंवृतकांतगृहीतकरे ।
निजवनपूजन दिव्यसुमार्चन वंदनकल्पितभर्तृमुदे
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥8॥

मम हृदिवास पराभवतापमपाकुरु देहि मुदं हि रमे
    मयि करुणां कुरु सादरवीक्षणमर्थिजने दिश चारुतनो ।
सकृतभिवीक्षणजातमहोदयशक्रमुखाखिलदेवगणे
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥9॥

सुतधनमौक्तिकहैमनिवेशितरत्नसुभूषण दानरते
    रथगजवाजिसमावृतमंदिरराज्यसुकल्पनकल्पलते ।
कुसुमसुचंदनवस्त्रमनोहररूपकलारतिपोषरते
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥10॥

धिमि धिमि धिंधिमि धिंधिमि धिंधिमि दुंदुभिनादसुपूर्णदिशे
    घुम घुम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शंखनिनादसुतुष्टिवशे ।
नटनकलापटुदेवनटीकुलचंक्रमनर्तनदत्तदृशे
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥11॥

हरिहरपूजनमद्भुतभाषणमष्टसुसिद्धिमुपानय मे
    मधुकृतपायसमुद्गकृतौदनभक्ष्यनिवेदनतुष्टमते ।
सकलसुमार्पणपूजनसंभ्रमदेववधूकुलसंवलिते
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥12॥

अनवधिमंगलमार्तिविनाशनमच्युतसेवनमंब रमे
    निखिलकलामतिमास्तिकसंगममिंद्रियपाटवमर्पय मे ।
अमितमहोदयमिष्टसमागममष्टसुसंपदमाशु मम
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥13॥

करधृतशुक्लसुमावलिनिर्मितहारगजीवृतपार्श्वतले
    कमलनिवासिनि शोकविनाशिनि दैवसुवासिनि लक्ष्म्यभिदे ।
निजरमणारुणचंदनचर्चितचंपकहारसुचारुगले
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥14॥

अनघमनंतपदान्वितरामसुदीक्षितसत्कृतपद्यमिदं
    पठति शृणोति च भक्तियुतो यदि भाग्यसमृद्धिमथो लभते ।
द्विजवरदेशिकसन्नुतितुष्टरमे परिपालय लोकमिमं
    जय जय हे मधुसूदनमोहिनि मोदविधायिनि वेदनुते ॥15॥

इति श्री अनंतरामदीक्षितेन विरचितः श्रीमहालक्ष्मीस्तवः संपूर्णः ।

अर्थ

श्री अनंतराम दीक्षित द्वारा रचित यह अद्भुत श्री महालक्ष्मी स्तव, देवी महालक्ष्मी की महिमा का गुणगान करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है। इस स्तव में देवी महालक्ष्मी के विभिन्न दिव्य गुणों, उनकी करुणा, मधुरता, सौंदर्य, ऐश्वर्य और दयालु स्वरूप का अत्यंत भक्तिभाव से वर्णन किया गया है। देवी महालक्ष्मी भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी, कमलासन पर विराजमान और मधुरता की मूर्ति हैं। इस स्तव के माध्यम से भक्त अपने जीवन से दरिद्रता, दुःख और अशुभ को दूर कर सौभाग्य, ऐश्वर्य, धन, सुख, भक्ति और मोक्ष प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक “जय जय हे मधुसूदनमोहिनी मोदविधायिनी वेदनुते” इस पल्लवी के साथ समाप्त होता है। यह पल्लवी देवी के मधुर रूप और हरि भक्ति योग के संगम का प्रतीक है, जो उन्हें भगवान मधुसूदन (विष्णु) को मोहित करने वाली, आनंद प्रदान करने वाली और वेदों द्वारा प्रशंसित देवी के रूप में दर्शाता है। भक्त जब शांत मन से देवी की प्रार्थना करते हैं, तो वे सभी दुःखों को दूर कर आंतरिक शांति और संतोष प्रदान करती हैं।

स्तोत्र में देवी को मंगल प्रदान करने वाली, मन के मैल को हरने वाली, मधुर भाषी, मुनिजनों की रक्षा करने वाली, मोतियों की माला धारण करने वाली, सद्गुणों की वर्षा करने वाली और साधुजनों द्वारा पूजित बताया गया है। देवी को कलियुग के पापों को हरने वाली, कामनाओं को पूर्ण करने वाली, कमल दल के समान सुंदर चरणों में नूपुरों की ध्वनि से युक्त, सोने का हार धारण करने वाली और लोक के सुख की कामना करने वाली के रूप में सराहा गया है। उन्हें कमल के समान नेत्रों से कृपापूर्वक भक्तों का पालन करने वाली, भगवान शंकर द्वारा स्तुति की गई और स्वर्णमय आमलक धारण करने वाली भी कहा गया है।

यह स्तोत्र भक्तों को अपने अहंकार को त्याग कर, देवी की सन्निधि में वास्तविक आनंद खोजने का मार्गदर्शन करता है। इस स्तव का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भक्तों को धन, धान्य, संतान, विद्या, स्वास्थ्य और सभी प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। यह न केवल भौतिक समृद्धि प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और जीवन में सभी प्रकार के शुभ फल भी लाता है। विशेष रूप से शुक्रवार, पूर्णिमा के दिन या दीपा आराधना और वैभव लक्ष्मी व्रत के दौरान इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

लाभ (Benefits):

  • दरिद्रता का नाश और धन प्राप्ति: इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन से दरिद्रता दूर होती है और अपार धन तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  • दुःख निवारण और मन की शांति: देवी की कृपा से सभी प्रकार के दुःख दूर होते हैं और हृदय में अचल शांति तथा संतोष स्थापित होता है।
  • स्वास्थ्य और सौभाग्य वृद्धि: इस स्तव का पाठ उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और जीवन में सभी प्रकार के सौभाग्य को आकर्षित करता है।
  • विद्या प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति: यह ज्ञान और बुद्धि को बढ़ाता है, जिससे आध्यात्मिक रूप से उच्च स्थान प्राप्त करने में मदद मिलती है।
  • संतान और पारिवारिक सुख: जिन लोगों को संतान की इच्छा है, उन्हें संतान की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री महालक्ष्मी स्तव क्या है?
यह श्री अनंतराम दीक्षित द्वारा रचित एक भक्तिमय स्तोत्र है, जो धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और शांति प्रदान करने वाली देवी महालक्ष्मी की स्तुति करता है। यह स्तोत्र देवी के विभिन्न दिव्य गुणों और उनके करुणामयी स्वरूप का वर्णन करता है।
इस स्तव का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तव का पाठ शुक्रवार, पूर्णिमा के दिन, दीपा आराधना के समय या वैभव लक्ष्मी व्रत के दौरान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे प्रतिदिन भक्तिभाव से भी पढ़ा जा सकता है।
श्री महालक्ष्मी स्तव के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तव का पाठ करने से दरिद्रता दूर होती है और धन, ऐश्वर्य, संतान, स्वास्थ्य तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और जीवन में सभी प्रकार के शुभ फल प्रदान करता है।
इस स्तव का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी भक्त जो धन, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए देवी महालक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है, इस स्तव का पाठ कर सकता है। श्रद्धा और भक्ति से पाठ करना महत्वपूर्ण है।
इस स्तव का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, प्रतिदिन एक बार पाठ करना शुभ होता है। विशेष फलों के लिए 11, 21, 54 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। अपनी सुविधा और भक्ति के अनुसार पाठ करें।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति कहाँ से हुई?
इस श्री महालक्ष्मी स्तव की रचना श्रद्धेय श्री अनंतराम दीक्षित ने की है। यह उनकी असाधारण भक्ति और साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण है।

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