॥ध्यानं ॥
चक्राकारं महत्तेजः तन्मध्ये परमेश्वरी ।
जगन्माता जीवदात्री नारायणी परमेश्वरी ॥1॥
व्यूहतेजोमयी ब्रह्मानंदिनी हरिसुंदरी ।
पाशांकुशेक्षुकोदंड पद्ममालालसत्करा ॥2॥
दृष्ट्वा तां मुमुहुर्देवाः प्रणेमुर्विगतज्वराः ।
तुष्टुवुः श्रीमहालक्ष्मीं ललितां वैष्णवीं परां ॥3॥
॥श्रीदेवाः ऊचुः ॥
जय लक्ष्मि जगन्मातः जय लक्ष्मि परात्परे ।
जय कल्याणनिलये जय सर्वकलात्मिके ॥1॥
जय ब्राह्मि महालक्ष्मि ब्रह्मात्मिके परात्मिके ।
जय नारायणि शांते जय श्रीललिते रमे ॥2॥
जय श्रीविजये देवीश्वरि श्रीदे जयर्द्धिदे ।
नमः सहस्र शीर्षायै सहस्रानन लोचने ॥3॥
नमः सहस्रहस्ताब्जपादपंकजशोभिते ।
अणोरणुतरे लक्ष्मि महतोऽपि महीयसि ॥4॥
अतलं ते स्मृतौ पादौ वितलं जानुनी तव ।
रसातलं कटिस्ते च कुक्षिस्ते पृथिवी मता ॥5॥
हृदयं भुवः स्वस्तेऽस्तु मुखं सत्यं शिरो मतं ।
दृशश्चंद्रार्कदहना दिशः कर्णा भुजः सुराः ॥6॥
मरुतस्तु तवोच्छ्वासा वाचस्ते श्रुतयो मताः ।
क्रिडा ते लोकरचना सखा ते परमेश्वरः ॥7॥
आहारस्ते सदानंदो वासस्ते हृदयो हरेः ।
दृश्यादृश्यस्वरूपाणि रूपाणि भुवनानि ते ॥8॥
शिरोरुहा घनास्ते वै तारकाः कुसुमानि ते ।
धर्माद्या बाहवस्ते च कालाद्या हेतयस्तव ॥9॥
यमाश्च नियमाश्चापि करपादनखास्तव ।
स्तनौ स्वाहास्वधाकारौ सर्वजीवनदुग्धदौ ॥10॥
प्राणायामस्तव श्वासो रसना ते सरस्वती ।
महीरुहास्तेऽङ्गरुहाः प्रभातं वसनं तव ॥11॥
आदौ दया धर्मपत्नी ससर्ज निखिलाः प्रजाः ।
हृत्स्था त्वं व्यापिनी लक्ष्मीः मोहिनी त्वं तथा परा ॥12॥
इदानीं दृश्यसे ब्राह्मी नारायणी प्रियशंकरी ।
नमस्तस्यै महालक्ष्म्यै गजमुख्यै नमो नमः ॥13॥
सर्वशक्त्यै सर्वधात्र्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः ।
या ससर्ज विराजं च ततोऽजं विष्णुमीश्वरं ॥14॥
रुदं तथा सुराग्रयाँश्च तस्यै लक्ष्म्यै नमो नमः ।
त्रिगुणायै निर्गुणायै हरिण्यै ते नमो नमः ॥15॥
यंत्रतंत्रात्मिकायै ते जगन्मात्रे नमो नमः ।
वाग्विभूत्यै गुरुतन्व्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः ॥16॥
कंभरायै सर्वविद्याभरायै ते नमो नमः ।
जयाललितापांचाली रमातन्वै नमो नमः ॥17॥
पद्मावतीरमाहंसी सुगुणाऽऽज्ञाश्रियै नमः ।
नमः स्तुता प्रसनैवंछंदयामास सव्दरैः ॥18॥
॥फलश्रुतिः ॥
श्रीलक्ष्मी उवाच ।
स्तावका मे भविश्यंति श्रीयशोधर्मसंभृताः ।
विद्याविनयसंपन्ना निरोगा दीर्घजीविनः ॥1॥
पुत्रमित्रकलत्राढ्या भविष्यंति सुसंपदः ।
पठनाच्छ्रवणादस्य शत्रुभीतिर्विनश्यति ॥2॥
राजभीतिः कदनानि विनश्यंति न संशयः ।
भुक्तिं मुक्तिं भाग्यवृद्धिमुत्तमां च लभेन्नरः ॥3॥
॥ श्रीलक्ष्मीनारायणसंहितायां देवसंघकृता श्रीमहालक्ष्मीललितास्तोत्रं ॥
अर्थ
श्री महालक्ष्मी ललिता स्तोत्रम देवी महालक्ष्मी की महिमा और सर्वव्यापकता का बखान करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिमय स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवताओं द्वारा रचित माना जाता है, जिसमें महालक्ष्मी को सृष्टि, स्थिति और संहार की अधिष्ठात्री, ब्रह्मांड की जननी, भगवान नारायण की पत्नी और सभी जीवों को जीवन प्रदान करने वाली परम शक्ति के रूप में स्तुति की जाती है। यह उन्हें केवल धन की देवी के रूप में ही नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान, शक्ति, सौंदर्य और सद्गुणों के स्रोत के रूप में भी चित्रित करता है। स्तोत्र के प्रारंभ में, देवी का ध्यान चक्राकार, महान तेज के रूप में, ब्रह्मांड के मध्य में स्थित परमेश्वरी के रूप में किया जाता है।
यह स्तोत्र महालक्ष्मी के दिव्य स्वरूप का अत्यंत विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है। उन्हें अणु से भी सूक्ष्म और ब्रह्मांड से भी विशाल बताया गया है। देवी के शरीर का प्रत्येक अंग ब्रह्मांड के विभिन्न लोकों का प्रतिनिधित्व करता है – उनके चरण अतल लोक हैं, घुटने वितल, कटि रसातल और कुक्षि पृथ्वी है। उनका हृदय भुवः लोक, मुख सत्यलोक और शिरोभाग महर्लोक का प्रतीक है। देवी की आँखें सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के समान हैं, दिशाएँ उनके कान हैं और देवता उनकी भुजाएँ हैं। उनकी श्वास वायु है, वाणी वेद हैं; उनका खेल लोकों की सृष्टि है और भगवान परमेश्वर उनके सखा हैं। उनका भोजन आनंद है, हरि का हृदय उनका निवास स्थान है, और समस्त भुवन उनके ही रूप हैं। ऐसे विश्वव्यापी स्वरूप का ध्यान भक्तों को दिव्य शक्ति से जुड़ने में सहायता करता है।
यह स्तोत्र महालक्ष्मी के विभिन्न गुणों और कार्यों को उजागर करता है। उनके केश (बाल) तारे हैं, धर्म और अन्य सद्गुण उनके हाथ हैं, और कालचक्र उनकी शक्ति है। यम और नियम उनके पैरों के नाखून हैं, स्वाहा और स्वधा के रूप में उनके स्तन जीवों को पोषण प्रदान करते हैं। उनकी श्वास प्राणायाम है, जिह्वा सरस्वती है, और उगते सूर्य की कांति उनके वस्त्र हैं। देवी ने सर्वप्रथम दया के रूप में सृष्टि का आरंभ किया, और बाद में मोहिनी के रूप में माया का सृजन किया। ब्राह्मी, नारायणी, शांकरी – सभी देवियों के रूप महालक्ष्मी में ही समाहित हैं। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं, यह स्तोत्र उनकी सर्वोच्च स्थिति को पुनः पुष्टि करता है।
अंत में, स्तोत्र महालक्ष्मी को पद्मावती, हंसवाहिनी, सुगुणमयी, दयामयी के रूप में पूजता है। वह भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली माँ हैं। इस स्तोत्र का पाठ केवल भौतिक धन ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है। यह भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को प्रेरित करता है, भक्तों को भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि की ओर ले जाता है। महालक्ष्मी का यह ललिता स्तोत्र भक्तों के लिए दिव्य अनुग्रह प्राप्त करने, भय, शत्रुओं और दुखों का नाश करने और अंततः भुक्ति (भौतिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों को प्राप्त करने का एक उत्कृष्ट साधन है।
लाभ (Benefits):
- धन और समृद्धि: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, आर्थिक स्थिति सुधरती है और जीवन में समृद्धि आती है।
- स्वास्थ्य और दीर्घायु: स्तोत्र पाठ से उत्तम स्वास्थ्य, रोगों से मुक्ति और दीर्घायु प्राप्त होती है।
- ज्ञान और विद्या: महालक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं, बल्कि ज्ञान की भी देवी हैं, अतः यह स्तोत्र ज्ञान और विद्या प्राप्ति में सहायक होता है।
- भय और शत्रुओं का नाश: स्तोत्र का पाठ भय, चिंता, शत्रुओं से होने वाली बाधाओं को दूर कर मन को शांति और साहस प्रदान करता है।
- भुक्ति और मुक्ति: यह स्तोत्र भौतिक जीवन में सुख-समृद्धि (भुक्ति) और आध्यात्मिक रूप से मोक्ष (मुक्ति) दोनों को प्राप्त करने में मदद करता है।
- सद्गुण और धर्मनिष्ठा: स्तोत्र का पाठ करने वाले धर्मनिष्ठ और सद्गुणी बनते हैं, जिससे समाज में सम्मान प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री महालक्ष्मी ललिता स्तोत्रम क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री महालक्ष्मी ललिता स्तोत्रम के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या इतिहास क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
