मंदारमालांचितकेशभारां मंदाकिनीनिर्झरगौरहारां ।
वृंदारिकावंदितकीर्तिपारां वंदामहे मां कृतसद्विहारां ॥1॥
जय दुग्धाब्धितनये जय नारायणप्रिये ।
जय हैरण्यवलये जय वेलापुराश्रये ॥2॥
जय जय जनयित्रि वेलापुराभ्यंतरप्रस्फुरत्स्फार-
सौधांचितोदारसालांतरागारखेलन्मुरारातिपार्श्वस्थिते ।
क्लृप्तविश्वस्थिते ।
चित्ररत्नज्वलद्रत्नसानूपमप्रत्नसौवर्ण
कोटीरकांतिच्छटाचित्रिताच्छांबरे । देवि दिव्यांबरे ।
फुल्लसन्मल्लिकामालिकाप्रोल्लसन्नीलभोगीशभोगप्रतीकाश-
वेण्यर्धचंद्रालिके । वल्गुनीलालके । केशसौरभ्यलोभ-
भ्रमत्स्थूलजंबूफलाभालिमालासमाकर्षणेहोत्पतन्मौलि-
वैडूर्यसंदर्श नत्रस्तलीलाशुकालोकजातस्मिते । देवजातस्तुते ।
ईश्वरीशेखरीभूतसोमस्मयोत्सादनाभ्युत्सुकत्वच्छिरःसंश्रित-
प्राप्तनित्योदयब्रघ्नशंकाकरस्वर्णकोटीरसंदर्शनानंदितस्वीय-
तातांककारोहणाभीप्सुलब्धांतिकार्कात्म-
जानिर्झराशंकनीयांतकस्तूरिकाचित्रके । वार्धिराट्पुत्रिके ।
मान्मथश्यामलेक्ष्वात्मधन्वाकृतिस्निग्धमुग्धाद्भुत-
भ्रूलता चालनारब्धलोकालिनिर्माणरक्षिण्यसंहारलीलेऽमले ।
सर्वदे कोमले । स्वप्रभान्यक्कृते स्वानुगश्रुत्यधःकारिणीकांति-
नीलोत्पले बाधितुं वागताभ्यां श्रवःसन्निधिं लोचनाभ्यां
भृशं भूषिते । मंजुसंभाषिते । किंचिदुद्बुद्धचांपेय-
पुष्पप्रतीकाशनासास्थितस्थूलमुक्ताफले ।
दत्तभक्तौघवांछाफले । शोणबिंबप्रवालाधरद्योतविद्योत-
मानोल्लसद्दाडिमीबीजराजिप्रतीकाशदंतावले ।
गत्यधः क्लृप्तदंतावले ।
त्वत्पतिप्रेरितत्वष्टसृष्टाद्भुतातीद्धभस्मासुरत्रस्त
दुर्गाशिवत्राणसंतुष्टतद्दत्तशीतांशुरेखायुगात्मत्वसंभावना-
योग्यमुक्तामयप्रोल्लसत्कुंडले । पालिताखंडले ॥1॥
अयि सुरुचिरनव्यदूर्वादलभ्रांतिनिष्पादकप्रोल्लसत्कंठ-
भूषानिबद्धायतानर्घ्यगारुत्मतांशुप्रजापात्यसारंग-
नारीस्थिरस्थापकाश्चर्यकृद्दिव्यमाधुर्यगीतोज्ज्वले । मंजुमुक्तावले ।
अंगदप्रोतदेवेंद्रनीलोपलत्विट्छटाश्यामलीभूतचोलोज्ज्वलस्थूल-
हेमार्गलाकारदोर्वल्लिके । फुल्लसन्मल्लिके । ऊर्मिकासंचयस्यूत
शोणोपलश्रीप्रवृद्धारुणच्छायमृद्वंगुलीपल्लवे ।
लालितानंदकृत्सल्लवे । दिव्यरेखांकुशांभोजचक्रध्व-
जाद्यंकराजत्करे । संपदेकाकरे ।
कंकणश्रेणिकाबद्धरत्नप्रभाजालचित्रीभवत्पद्मयुग्म-
स्फुरत्पंचशाखद्वये । गूढपुण्याशये । मत्पदाब्जोपकंठे
चतुःपूरुषार्था वसंत्यत्र मामाश्रयं कुर्वते तान् प्रदास्यामि
दासाय चेत्यर्थकं त्वन्मनोनिष्ठभावं जगन्मंगलं सूचयद् वा
वराभीतिमुद्राद्वया व्यंजयस्यंगपाणिद्वयेनांबिके । पद्मपत्रांबके ।
चारुगंभीरकंदर्पकेल्यर्थनाभीसरस्तीरसौवर्ण-
सोपानरेखागतोत्तुंगवक्षोजनामांकितस्वर्णशैल-
द्वयारोहणार्थेंद्रनीलोपलाबद्धसूक्ष्माध्व-
संभावनायोग्यसद्रोमराज्याढ्यदेहे रमे । का गतिः श्रीरमे ।
निष्कनक्षत्रमालासदृक्षाभनक्षत्रमालाप्रवालस्रगेकावली-
मुख्यभूषाविशेषप्रभाचित्रिताच्छोत्तरासंगसंछिन्नवक्षोरुहे
। चंचलागौरि हे ।
केलिकालक्वणत्किंकिणीश्रेणिकायुक्तसौवर्णकांचीनिबद्ध-
स्फुरत्स्पष्टनीव्याढ्यशुक्लांबरे । भासिताशांबरे ।
पुंडरीकाक्षवक्षःस्थलीचर्चितानर्घ्यपाटीरपंकांकितानंग-
निक्षेपकुंभस्तने । प्रस्फुरद्गोस्तने ॥2॥
गुरुनिबिडनितंबबिंबाकृतिद्राविताशीतरुक्स्यंदनप्रोतचंद्रावले-
पोत्करे । स्वर्णविद्युत्करे । भोः प्रयच्छामि ते चित्ररत्नोर्मिकां
मामिकां सादरादेह्यदो मध्यमं भूषयाद्यैतया द्रष्टुमिच्छाम्यहं
साध्विति त्वत्पतिप्रेरितायां मुदा पाणिनादाय धृत्वा रहः
केशवं लीलयानंदयः सप्तकीवास्ति ते । सप्तलोकीस्तुते ।
चित्ररोचिर्महामेखलामंडितानंतरत्नस्फुरत्तोरणालंकृत-
श्लक्ष्णकंदर्पकांताररंभातरुद्वंद्वसंभावनीयोरुयुग्मे रमे ।
संपदं देहि मे । पद्मरागोपलादर्शबिंबप्रभाच्छायसुस्निग्धजानु
॥॥ द्वये शोभने चंद्रबिंबानने ।
शंबरारातिजैत्रप्रयाणोत्सवारंभजृंभन्महा-
काहलीडंबरस्वर्णतूणीरजंघे शुभे । शारदार्कप्रमे ।
हंसराजक्वणद्धंसबिंबस्फुरद्धंसकालंकृतस्पष्ट-
लेखांकुशांभोजचक्रध्वज-व्यंजनालंकृतश्रीपदे ।
त्वां भजे संपदे । नम्रवृंदारिकाशेखरीभूतसौवर्ण-
कोटीररत्नावलीदीपिकाराजिनीराजितोत्तुंगगांगेय-
सिंहासनास्तीर्णसौवर्णबिंद्वंकसौरभ्यसंपन्नतल्पस्थिते ।
संततस्वःस्थिते । चेटिकादत्तकर्पूरखंडान्वितश्वेतवीटीदरादान-
लीलाचलद्दोर्लते । दैवतैरर्चिते । रत्नताटंककेयूरहारावली-
मुख्यभूषाच्छटारंजितानेकदासीसभावेष्टिते । देवताभिष्टुते ।
पार्श्वयुग्मोल्लसच्चामरग्राहिणीपंचशाखांबुजाधूत-
जृंभद्रणत्कंकणाभिष्टुताभीशुसच्चामराभ्यां मुदा चीज्यसे ।
कर्मठैरिज्यसे । मंजुमंजीरकांच्युर्मिकाकंकणश्रेणि-
केयूरहारावली- कुंडलीमौलिनासामणिद्योतिते । भक्तसंजीविते ॥3॥
जलधरगतशीतवातार्दिता चारुनीरंध्रदेवालयांतर्गता विद्युदेषा
हि किं भूतलेऽपि स्वमाहाल्यसंदर्शनार्थं क्षमामास्थिता
कल्पवल्येव किं घस्रमात्रोल्लसंतं रविं रात्रिमात्रोल्लसंतं विधुं
संविधाय स्वतो वेघसातुष्टचित्तेन सृष्टा सदाप्युल्लसंती
महादिव्यतेजोमयी दिव्यपांचालिका वेति सद्भिः सदा तवर्यसे । त्वां
भजे मे भव श्रेयसे । पूर्वकद्वारनिष्ठेन नृत्यद्वराकाररंभा-
दिवारांगनाश्रेणिगीतामृताकर्णनायत्त-
चित्तामराराधितेनोच्चकैर्भार्गवींद्रेण संभाविते । नो समा
देवता देवि ते । दक्षिणद्वारनिष्ठेन सच्चित्रगुप्तादियुक्तेन
वैवस्वतेनार्च्यसे । योगिभिर्भाव्यसे । पश्चिमद्वारभाजा भृशं
पाशिना स्वर्णेदी- मुख्यनद्यन्वितेनेड्यसे । सादरं पूज्यसे ।
उत्तरद्वारनिष्ठेन यक्षोत्तमैर्नम्रकोटीरजूटैर्मनोहारिभी
राजराजेन भक्तेन संभाव्यसे । योगिभिः पूज्यसे । लक्ष्मि
पद्मालये भार्गवि श्रीरमे लोकमातः समुद्रेशकन्येऽच्युतप्रेयसि
॥॥। स्वर्णशोभे च मे चेंदिरे विष्णुवक्षः स्थिते
पाहि पाहीति यः प्रातरुत्थाय भक्त्या युतो नौति सोऽयं नरः
संपदं प्राप्य विद्योतते । भूषणद्योतिते । दिव्य
कारुण्यदृष्ट्याशु मां पश्य मे दिव्यकारुण्यदृष्ट्याशु
मां पश्य मे दिव्यकारुण्यदृष्ट्याशु मां पश्य मे । मां किमर्थं
सदोपेक्षसे नेक्षसे त्वत्पदाब्जं विना नास्ति मेऽन्या गतिः संपदं देहि
मे संपदं देहि मे संपदं देहि मे । त्वत्पदाब्जं प्रपन्नोऽस्म्यहं
सर्वदा त्वं प्रसन्ना सती पाहि मां पाहि मां पाहि मां पद्महस्ते
त्रिलोकेश्वरिं प्रार्थये त्वामहं देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमो
देवि तुभ्यं नमः ॥सत्रिषष्ट्युत्तरशतरगणाढ्यश्चतुर्दलः ।
महालक्ष्मीदंडकोऽयं कृतः केशवसूरिणा ॥
इति केशवसूरिकृतः महालक्ष्मीदंडकः संपूर्णः ।
स्तोत्रसमुच्चयः 2 (85)
अर्थ
श्री महालक्ष्मी दंडकं धन, समृद्धि, सौभाग्य और आध्यात्मिक उत्थान की देवी महालक्ष्मी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और विस्तृत स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवी के दिव्य स्वरूप, उनके आभूषणों, गुणों और उनकी कृपा का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है, जिससे भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की समृद्धि प्राप्त होती है। यह भक्ति की पराकाष्ठा को व्यक्त करने वाला एक अनुपम काव्य है।
यह स्तोत्र 'मन्दारमालाञ्चितकेशभारां मन्दाकिनीनिर्झरगौरहारां । वृन्दारिकावन्दितकीर्तिपारां वन्दामहे मां कृतसद्विहारां ॥' से आरंभ होता है। इसमें देवी को मंदार पुष्पों की मालाओं से सुशोभित केशभार वाली, मंदाकिनी नदी के झरने के समान उज्ज्वल और पवित्र हार धारण करने वाली, तथा देवताओं द्वारा भी वंदित अनंत कीर्ति वाली बताया गया है। भक्त ऐसी महालक्ष्मी को प्रणाम करते हैं, जो उनके जीवन में सद्गुणों को स्थापित करती हैं और उन्हें शुभ मार्ग पर ले जाती हैं।
दूसरा श्लोक 'जय दुग्धाब्धितनये जय नारायणप्रिये । जय हैरण्यवलये जय वेलापुराश्रये ॥' देवी के दिव्य जन्म और संबंधों को दर्शाता है। हे क्षीरसागर की पुत्री, हे नारायण (विष्णु) की प्रियतमा, हे स्वर्ण-आभूषणों से सुशोभित, हे वेलापुर में निवास करने वाली देवी, आपकी जय हो! इस श्लोक में देवी के उद्भव, उनके पति और उनके निवास स्थान को दर्शाया गया है, जिससे उनकी दिव्यता और महत्व पर प्रकाश पड़ता है।
इसके विस्तृत खंडों में, कवि महालक्ष्मी के अत्यंत भव्य और तेजोमय रूप का वर्णन करता है। उनके दिव्य आभूषणों, कमल जैसे नेत्रों और मुकुट की छटा का विस्तृत चित्रण किया गया है, जो भक्तों को उनकी ओर आकर्षित करता है और उन्हें भौतिक समृद्धि तथा आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। देवी के प्रत्येक अंग का वर्णन उनकी अलौकिक शक्ति और सौंदर्य को दर्शाता है। देवी की सुगंध, आभूषण, गीत और पुष्पांजलि - ये सभी वे माध्यम हैं जिनके द्वारा देवी अपनी प्रचुरता प्रदान करती हैं। भक्त विनम्रतापूर्वक इन कृपाओं का अनुरोध करते हैं। अंत में, 'जलधरगतशीतवातार्र्दिता…' जैसी पंक्तियों के माध्यम से, भक्त सागरों और लोकों पर चमकने वाली देवी के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करते हैं, उनसे दयापूर्ण दृष्टि डालने और प्रचुरता प्रदान करने का निवेदन करते हैं। दंडक देवी के चरण कमलों में पूर्ण शरणागति के साथ समाप्त होता है।
यह श्री महालक्ष्मी दंडकं केवल देवी के बाहरी सौंदर्य का ही नहीं, बल्कि उनकी आंतरिक शक्ति और ब्रह्मांडीय भूमिका का भी वर्णन करता है। महालक्ष्मी समस्त ऐश्वर्यों की स्रोत हैं और उनकी भक्तिपूर्वक स्तुति करने से भक्तों को अज्ञान से मुक्ति, ज्ञान, धन, शांति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त देवी के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित कर पाते हैं और जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करते हैं।
लाभ (Benefits):
- धन-धान्य की प्राप्ति: इस दंडक का निष्ठापूर्वक पाठ करने से महालक्ष्मी की कृपा से धन, ऐश्वर्य और समृद्धि में वृद्धि होती है।
- मानसिक शांति और संतोष: देवी के दिव्य स्वरूप का ध्यान और स्तोत्र पाठ मन को शांति, संतोष और आंतरिक सुख प्रदान करता है।
- रोगों और बाधाओं से मुक्ति: महालक्ष्मी के अनुग्रह से भक्त रोगों और जीवन की विभिन्न बाधाओं से मुक्ति पाते हैं।
- ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि: महालक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, वे ज्ञान और बुद्धि भी प्रदान करती हैं, जिससे भक्तों की बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होती है।
- आध्यात्मिक उत्थान और मोक्ष: इस दंडक का भक्तिपूर्वक पाठ भक्तों को आध्यात्मिक प्रगति की ओर ले जाता है और अंततः मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
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