श्री हनुमदष्टकं
श्रीरघुराजपदाब्जनिकेतन पंकजलोचन मंगळराशे
चंडमहाभुजदंड सुरारिविखंडनपंडित पाहि दयाळो |
पातकिनं च समुद्धर मां महतां हि सतामपि मानमुदारं
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 1 ||
संसृतितापमहानलदग्धतनूरुहमर्मतनोरतिवेलं
पुत्रधनस्वजनात्मगृहादिषु सक्तमतेरतिकिल्बिषमूर्तेः |
केनचिदप्यमलेन पुराकृतपुण्यसुपुंजलवेन विभो वै
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 2 ||
संसृतिकूपमनल्पमघोरनिदाघनिदानमजस्रमशेषं
प्राप्य सुदुःखसहस्रभुजंगविषैकसमाकुलसर्वतनोर्मे |
घोरमहाकृपणापदमेव गतस्य हरे पतितस्य भवाब्धौ
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 3 ||
संसृतिसिंधुविशालकरालमहाबलकालझषग्रसनार्तं
व्यग्रसमग्रधियं कृपणं च महामदनक्रसुचक्रहृतासुं |
कालमहारसनोर्मिनिपीडितमुद्धर दीनमनन्यगतिं मां
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 4 ||
संसृतिघोरमहागहने चरतो मणिरंजितपुण्यसुमूर्तेः
मन्मथभीकरघोरमहोग्रमृगप्रवरार्दितगात्रसुसंधेः |
मत्सरतापविशेषनिपीडितबाह्यमतेश्च कथं चिदमेयं
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 5 ||
संसृतिवृक्षमनेकशताघनिदानमनंतविकर्मसुशाखं
दुःखफलं करणादिपलाशमनंगसुपुष्पमचिंत्यसुमूलं |
तं ह्यधिरुह्य हरे पतितं शरणागतमेव विमोचय मूढं
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 6 ||
संसृतिपन्नगवक्त्रभयंकरदंष्ट्रमहाविषदग्धशरीरं
प्राणविनिर्गमभीतिसमाकुलमंदमनाथमतीव विषण्णं |
मोहमहाकुहरे पतितं दययोद्धर मामजितेंद्रियकामं
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 7 ||
इंद्रियनामकचोरगणैर्हृततत्त्वविवेकमहाधनराशिं
संसृतिजालनिपातितमेव महाबलिभिश्च विखंडितकायं |
त्वत्पदपद्ममनुत्तममाश्रितमाशु कपीश्वर पाहि कृपाळो
त्वां भजतो मम देहि दयाघन हे हनुमन् स्वपदांबुजदास्यं || 8 ||
ब्रह्ममरुद्गणरुद्रमहेंद्रकिरीटसुकोटिलसत्पदपीठं
दाशरथिं जपति क्षितिमंडल एष निधाय सदैव हृदब्जे |
तस्य हनूमत एव शिवंकरमष्टकमेतदनिष्टहरं वै
यः सततं हि पठेत्स नरो लभतेऽच्युतरामपदाब्जनिवासं || 9 ||
इति श्री मधुसूदनाश्रम शिष्याऽच्युतविरचितं श्रीमद्दनुमदष्टकं |
अर्थ
श्री हनुमदष्टकं भक्त के हृदय में छिपे कष्टों, भय, अज्ञान, पापबंधनों और संसार चक्र को पार करने के लिए श्री हनुमान जी की कृपा की याचना करने वाला अत्यंत हृदयस्पर्शी स्तोत्र है। प्रत्येक श्लोक मनुष्य के जीवन में अनुभव किए जाने वाले दुःख के सागर का वर्णन करता है और बताता है कि उन सभी पीड़ाओं को दूर करने वाले एकमात्र शरण हनुमान जी ही हैं। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त अपनी दुर्बलताओं को स्वीकार करते हुए, बलशाली और दयालु हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना करता है। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि संकट में फँसी आत्मा की गहरी पुकार है।
प्रथम श्लोक में, भक्त श्री रघुराज (श्री राम) के चरण कमलों में नित्य निवास करने वाले, कमल नयनों वाले, महाबली से दुष्टों का संहार करने वाले, दयालु हनुमान जी की शरण लेता है। वह उनसे अपनी रक्षा करने और अपने चरणों की सेवा प्रदान करने की प्रार्थना करता है। दूसरा श्लोक संसार रूपी अग्नि में जल रही जीवात्मा की दुर्दशा को दर्शाता है। परिवार, धन, संतान, घर जैसे बंधनों में फँसा हुआ, पापमय मन दुख पाता है। भक्त कहता है कि पिछले जन्मों में किए गए अल्प पुण्य के कारण ही वह हनुमान जी का स्मरण कर पाया है, और उनकी करुणा की याचना करता है। तीसरा श्लोक संसार सागर को खतरनाक सर्पों से भरा हुआ, और हर मार्ग पर दुखों को लाने वाला बताता है। ऐसी दयनीय स्थिति में फँसे हुए जीव को केवल हनुमान जी ही बचा सकते हैं।
चौथा श्लोक काल रूपी संसार सागर में भयानक लहरों से जूझ रहे जीव को, काम और क्रोध रूपी भयंकर चक्रवातों से पीड़ित बताता है। अत्यंत दुर्बल अवस्था में पड़ा भक्त हनुमान जी से अपनी रक्षा की गुहार लगाता है। पाँचवें श्लोक में कहा गया है कि धर्म के वन में भटकने वाला मनुष्य काम, ईर्ष्या, मोह और अहंकार जैसे हिंसक पशुओं से घायल हो जाता है। ऐसे जंगल में रास्ता भटके जीव को हनुमान जी के अलावा कोई और नहीं बचा सकता। छठा श्लोक संसार वृक्ष को अनंत कर्म-शाखाओं, दुःख के फलों और काम के फूलों से भरा हुआ बताता है, जिसकी जड़ें भी अचिंत्य हैं। ऐसे वृक्ष पर चढ़कर गिरे हुए मूर्ख भक्त हनुमान जी की शरण मांगता है।
सातवें श्लोक में संसार को विषैले सर्प के समान वर्णित किया गया है, जिसके दाँतों से शरीर ही नष्ट हो जाता है। मोह के अंधकार में भटक रहा जीव हनुमान जी की दया की याचना करता है। आठवें श्लोक में बताया गया है कि इंद्रियाँ रूपी चोर हमारी ज्ञान रूपी संपत्ति को लूट लेते हैं। संसार रूपी पाश शरीर को नष्ट कर देता है। इस दुर्दशा से बचाने वाली एकमात्र शरण हनुमान जी के चरण कमल ही हैं, यह स्पष्ट करता है। अष्टक को समाप्त करने वाला अंतिम श्लोक कहता है कि जो कोई भी इस हनुमदष्टकं का नित्य पाठ करता है, वह अच्युत (विष्णु) और रामचंद्र के चरण कमलों में अचल भक्ति प्राप्त करता है, सभी दुखों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
लाभ (Benefits):
- संकट निवारण: इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में आने वाले भय, चिंता, दुख और कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। हनुमान जी संकटमोचक के रूप में भक्तों की रक्षा करते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: यह संसार के बंधनों से मुक्ति और अज्ञान के निवारण में सहायता करता है। यह आत्मा को शुद्ध कर, आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
- शक्ति और साहस: हनुमान जी बल और साहस के प्रतीक हैं। इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से भक्तों में आंतरिक शक्ति, आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है।
- पाप मुक्ति: यह माना जाता है कि पिछले जन्मों और वर्तमान जन्म के पापों से मुक्ति मिलती है, जिससे शुद्ध जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है।
- मोक्ष प्राप्ति: अंततः, श्री राम और विष्णु के चरण कमलों में अचल भक्ति प्राप्त कर, जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाकर मोक्ष प्राप्त करने में यह स्तोत्र सहायक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री हनुमदष्टकं क्या है?
हनुमदष्टकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
हनुमदष्टकं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
हनुमदष्टकं का पाठ कितनी बार करना उचित है?
इस स्तोत्र का मूल या इतिहास क्या है?
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