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श्री गायत्री नामाष्टाविंशति स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री गायत्री नामाष्टाविंशति स्तोत्रं


श्रीगणेशाय नमः ||

ब्रह्मोवाच |
शताक्षरात्मकं देव्या नामाष्टाविंशतिः शतं |
शृणु वक्ष्याभि तत्सर्वमतिगुह्यं सनातनं || 1||

भूतिदा भुवना वाणी वसुधा सुमना मही |
हरिणी जननी नंदा सविसर्गा तपस्विनी || 2||

पयस्विनी सती त्यागा चैंदवी सत्यवीरसा |
विश्वा तुर्या परा रेच्या निर्घृणी यमिनी भवा || 3||

गोवेद्या च जरिष्ठा च स्कंदिनी धीर्मतिर्हिमा |
भीषणा योगिनी पक्षी नदी प्रज्ञा च चोदिनी || 4||

धनिनी यामिनी पद्मा रोहिणी रमणी ऋषिः |
सेनामुखी सामयी च बकुला दोषवर्जिता || 5||

सर्वकामदुघा सोमोद्भवाऽहंकारवर्जिता |
द्विपदा च चतुष्पादा त्रिपदा चैव षट्पदा || 6||

अष्टापदी नवपदी सा सहस्राक्षरात्मिका |
इदं यः परमं गुह्यं सावित्रीमंत्रगर्भितं || 7||

नामाष्टविंशतिशतं शृणुयाच्छ्रावयेत्पठेत् |
मर्त्यानाममृतत्वाय भीतानामभयाय च || 8||

मोक्षाय च मुमुक्षूणां श्रीकामान् प्राप्तये श्रियः |
विजयाय युयुत्सूनां व्याधितानामरोगकृत् || 9||

वश्याय वश्यकामानां विद्यायै वेदकामिनां |
द्रविणाय दरिद्राणां पापिनां पापशांतये || 10||

वादिनां वादविजये कवीनां कविताप्रदं | वादविषये
अन्नाय क्षुधितानां च स्वर्गाय नाकमिच्छतां || 11|| स्वर्गार्थं

पशुभ्यः पशुकामानां पुत्रेभ्यः पुत्रकांक्षिणां |
क्लेशिनां शोकशांत्यर्थं नृणां शत्रुभयाय च || 12||

राजवश्याय द्रष्टव्यं परमं नृपसेविनां |
भक्त्यर्थं विष्णुभक्तानां विष्णौ सर्वांतरात्मनि || 13||

नायकं विधिसृष्टानां शांतये भवति ध्रुवं |
निःस्पृहाणां नृणां मुक्तिः शाश्वती भवति ध्रुवं || 14||

जप्यं त्रिवर्गसंयुक्तं गृहस्थेन विशेषतः |
मुनीनां ज्ञानसिद्ध्यर्थं यतीनां मोक्षसिद्धये || 15||

उद्यतं चंद्रकिरणमुपस्थाय कृतांजलिः |
कानने वा स्वभवने तिष्ठन् शुद्धो जपेदिदं || 16||

सर्वान् कामानवाप्नोति तथैव शिवसन्निधौ |
मम प्रीतिकरं दिव्यं विष्णुभक्तिविवर्धनं || 17||

ज्वरार्तानां कुशाग्रेण मार्जयेत्कुष्ठरोगिणां |
अंगमंगं यथालिंगं कवचेन तु साधकः || 18||

मंडलेन विशुध्येत सर्वरोगैर्न संशयः |
मृतप्रजा च या नारी जन्मवंध्या तथैव च || 19||

कन्यादिवंध्या या नारी तासामंगं प्रमार्जयेत् |
पुत्रा नरोगिणस्तास्तु लभंते दीर्घजीविनः || 20||

तास्ताः संवत्सरादर्वाक् गर्भं तु दधिरे पुनः |
पतिविद्वेषिणी या स्त्री अंगं तस्याः प्रमार्जयेत् || 21||

तमेव भजते सा स्त्री पतिं कामवशं नयेत् |
अश्वत्थे राजवश्यार्थं बिल्वमूले स्वरूपभाक् || 22||

पालाशमूले विद्यार्थी तेजसोऽभिमुखो रवौ |
कन्यार्थी चंडिकागेहे जपेच्छत्रुभयाय च || 23||

श्रीकामो विष्णुगेहे च उद्याने श्रीर्वशीभवेत् |
आरोग्यार्थे स्वगेहे च मोक्षार्थी शैलमस्तके || 24||

सर्वकामो विष्णुगेहे मोक्षार्थी यत्र कुत्रचित् |
जपारंभे तु हृदयं जपांते कवचं पठेत् || 25||

किमत्र बहुनोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः |
यं यं चिंतयते नित्यं तं तं प्राप्नोति निश्चितं || 26||

इति श्रीमद्वसिष्ठसंहितायां ब्रह्मनारदसंवादे
गायत्रीनामाष्टाविंशतिस्तोत्रं समाप्तं ||

अर्थ

श्री गायत्री नामाष्टाविंशति स्तोत्रं भगवान ब्रह्मा द्वारा उपदेशित एक अत्यंत गुप्त और प्राचीन स्तोत्र है। यह देवी गायत्री के 28 महत्वपूर्ण नामों की स्तुति करता है। ये नाम गायत्री देवी के सर्वव्यापी स्वरूप, उनके दिव्य गुणों और सृष्टि, स्थिति तथा संहार के लिए उनकी मूलभूत शक्ति को उजागर करते हैं। यह स्तोत्र केवल एक नामावली नहीं है, बल्कि गायत्री मंत्र की गर्भित शक्ति को समाहित करने वाला एक श्रेष्ठ प्रार्थना रूप है, जिसमें मनुष्यों को अमरता और अभय प्रदान करने की क्षमता है।

स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोक गायत्री देवी को 'भूतिदा' (समृद्धि देने वाली), 'भुवना' (जगत का स्वरूप), 'वाणी' (वाक् शक्ति), 'जननी' (माता), 'तपस्विनी' (तपस्विनी), 'पयस्विनी' (पोषक शक्ति), 'सत्यवीरसा' (सत्य का सार), 'तुर्या' (चौथी, परम अवस्था), 'धी' (बुद्धि), 'प्रज्ञा' (विवेक) और 'योगिनी' (योग की अधिष्ठात्री) जैसे अनेक विशेषणों से वर्णित करते हैं। ये नाम स्पष्ट करते हैं कि गायत्री केवल एक मंत्र देवता नहीं हैं, बल्कि ब्रह्मांड के समस्त चर-अचर में व्याप्त मूलभूत शक्ति, ज्ञान का स्रोत और सभी जीवों की पोषक हैं। उन्हें गायों की ज्ञाता, नदी, पक्षी और शुभ गुणों का सागर बताया गया है, जो उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाता है।

आगे के भागों में, गायत्री को 'सर्वकामदुघा' (सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली) कहा गया है। वे द्विपदा, चतुष्पादा, त्रिपादा, षट्पदा, अष्टापदी, नवपदी स्वरूपों में अर्थात समस्त जीवराशियों में निवास करती हैं। वे सहस्राक्षरात्मिका हैं, यानी हजारों अक्षरों का सार और सावित्री मंत्र की गर्भित शक्ति के रूप में प्रकाशित होती हैं। भगवान ब्रह्मा बताते हैं कि इन नामों का पाठ करने से मनुष्यों को अमरता, भयभीत लोगों को अभय, मोक्ष चाहने वालों को मुक्ति, धन चाहने वालों को समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त होती है। यह केवल भौतिक लाभ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान को भी इंगित करता है।

यह स्तोत्र केवल व्यक्तिगत लाभों तक सीमित नहीं है। यह वाद-विवाद करने वालों को विजय, कवियों को काव्य शक्ति, पशुधन चाहने वालों को आशीर्वाद, संतानहीन दंपतियों को संतान, और शत्रु भय से मुक्ति प्रदान करता है। राजवशीकरण, विष्णु भक्तों के लिए आंतरिक दिव्य उपस्थिति, और निष्काम भक्तों के लिए स्थिर विमुक्ति प्राप्त होती है। गृहस्थ और यति दोनों को इसका जप करना चाहिए। शुद्ध मन से, निर्मल वातावरण में पाठ करने से बुखार, त्वचा रोग जैसे रोगों का निवारण होता है और परिवार में सुख, शांति, समृद्धि बनी रहती है। कन्याओं को उत्तम वर और बांझ स्त्रियों को संतान प्राप्त होती है। इस प्रकार, यह स्तोत्र समग्र मानव कल्याण के लिए एक शक्तिशाली साधन है।

लाभ (Benefits):

  • भय से मुक्ति: मृत्यु भय, शत्रु भय सहित सभी प्रकार के भयों से पूर्ण मुक्ति मिलती है।
  • मोक्ष और धन: मोक्ष की इच्छा रखने वालों को परम मुक्ति, और धन चाहने वालों को स्थायी समृद्धि तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु: रोगों से मुक्ति, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार, विजय और लंबी आयु प्रदान करता है।
  • ज्ञान और वाक् सिद्धि: विद्या में सफलता, बुद्धि का विकास, कवियों को काव्य शक्ति और वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है।
  • संतान और सुरक्षा: संतानहीन दंपतियों को संतान की प्राप्ति, पशुधन की रक्षा और परिवार में सुख-शांति में सहायक होता है।
  • पाप शांति और शुद्धि: समस्त पापों से मुक्ति, मन की शुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री गायत्री नामाष्टाविंशति स्तोत्रं क्या है?
यह देवी गायत्री के 28 महत्वपूर्ण नामों की स्तुति करने वाला एक प्राचीन और गोपनीय स्तोत्र है। इसे भगवान ब्रह्मा ने उपदेशित किया था और यह गायत्री की सर्वव्यापी शक्ति व गुणों का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर सुबह और शाम को शुद्ध मन से किया जा सकता है। पूजा के समय या किसी भी शुभ अवसर पर इसका पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री गायत्री नामाष्टाविंशति स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से भय से मुक्ति, मोक्ष, धन, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, ज्ञान, संतान प्राप्ति और सभी पापों का शमन होता है। यह आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
मोक्ष की इच्छा रखने वाले, धन और स्वास्थ्य चाहने वाले, ज्ञान और वाक् सिद्धि की कामना करने वाले, संतानहीन दंपत्ति और शत्रु भय से मुक्ति चाहने वाले इसका पाठ कर सकते हैं। यह गृहस्थों और यतियों दोनों के लिए उपयुक्त है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
आमतौर पर, एक माला (108 बार) या अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिदिन इसका पाठ किया जा सकता है। दीर्घकालिक परिणामों के लिए नियमित रूप से पाठ करना उत्तम माना जाता है।
इस स्तोत्र का मूल या स्रोत क्या है?
इस स्तोत्र को भगवान ब्रह्मा ने उपदेशित किया था। इसे अत्यंत गोपनीय और सनातन स्तोत्रों में से एक माना जाता है, जिसमें गायत्री मंत्र की गर्भित शक्ति निहित है।

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