श्री गायत्री मंजरी
एकदा तु महादेवं कैलाशगिरिसंस्थितं |
पप्रच्छ देवी वंद्या विबुधमंडलैः || 1||
कतमं योगमासीनो योगेश त्वमुपाससे |
येन हि परमां सिद्धिं प्राप्नुवान् जगदीश्वर || 2||
श्रुत्वा तु पार्वती वाचं मधुसिक्तां श्रुतिप्रियां |
समुवाच महादेवो विश्वकल्याणकारकः || 3||
महद्रहस्यं तद्गुप्तं यत्तु पृष्टं त्वया प्रिये |
तथापि कथयिष्यामि स्नेहात्तत्त्वामहं समं || 4||
गायत्री वेद मातास्ति साद्या शक्तिर्मता भुवि |
जगतां जननी चैव तामुपासेऽहमेव हि || 5||
यौगिकानां समस्तानां साधनानां तु हे प्रिये |
गायत्र्येव मता लोके मूलाधारो विदांवरैः || 6||
अति रहस्यमय्येषा गायत्री तु दश भुजा |
लोकेऽति राजते पंच धारयंति मुखानि तु || 7||
अति गूढानि संश्रुत्य वचनानि शिवस्य च |
अति संवृद्ध जिज्ञासा शिवमूचे तु पार्वती || 8||
पंचास्य दशबाहूनामेतेषां प्राणवल्लभ |
कृत्वा कृपां कृपालो त्वं किं रहस्यं तु मे वद || 9||
श्रुत्वा त्वेतन्महादेवः पार्वतीवचनं मृदु |
तस्याः शंकामपाकुर्वन् प्रत्युवाच निजां प्रियां || 10||
गायत्र्यास्तु महाशक्तिर्विद्यते या हि भूतले |
अनन्य भावतो ह्यस्मिन्नोतप्रोतोऽस्ति चात्मनि || 11||
बिभर्ति पंचावरणान् जीवः कोशास्तु ते मताः |
मुखानि पंच गायत्र्यास्तानेव वेद पार्वति || 12||
विज्ञानमयान्नमय-प्राणमय-मनोमयाः |
तथानंदमयश्चैव पंच कोशाः प्रकीर्तिताः || 13||
एष्वेव कोशकोशेषु ह्यनंता ऋद्धि सिद्धयः |
गुप्ता आसाद्य या जीवो धन्यत्वमधिगच्छति || 14||
यस्तु योगीश्वरो ह्येतान् पंच कोशान्नु वेधते |
स भवसागरं तीर्त्वा बंधनेभ्यो विमुच्यते || 15||
गुप्तं रहस्यमेतेषां कोषाणां योऽवगच्छति |
परमां गतिमाप्नोति स एव नात्र संशयः || 16||
लोकानां तु शरीराणि ह्यन्नादेव भवंति नु |
उपत्यकासु स्वास्थ्यं च निर्भरं वर्तते सदा || 17||
आसनेनोपवासेन तत्त्व शुद्ध्या तपस्यया |
चैवान्नमयकोशस्य संशुद्धिरभिजायते || 18||
ऐश्वर्यं पुरुषार्थश्च तेज ओजो यशस्तथा |
प्राणशक्त्या तु वर्धंते लोकानामित्यसंशयं || 19||
पंचभिस्तु महाप्राणैर्लघुप्राणैश्च पंचभिः |
एतैः प्राणमयः कोशो जातो दशभिरुत्तमः || 20||
बंधेन मुद्रया चैव प्राणायामेन चैव हि |
एष प्राणमयः कोशो यतमानं तु सिद्ध्यति || 21||
चेतनाया हि केंद्रंतु मनुष्याणां मनोमतं |
जायते महतीत्वंतः शक्तिस्तस्मिन् वशंगते || 22||
ध्यान-त्राटक-तन्मात्रा जपानां साधनैर्ननु |
भवत्युज्ज्वलः कोशः पार्वत्येष मनोमयः || 23||
यथावत् पूर्णतो ज्ञानं संसारस्य च स्वस्य च |
नूनमित्येव विज्ञानं प्रोक्तं विज्ञानवेत्तृभिः || 24||
साधना सोऽहमित्येषा तथा वात्मानुभूतयः |
स्वराणां संयमश्चैव ग्रंथिभेदस्तथैव च || 25||
एषां संसिद्धिभिर्नूनं यतमानस्य ह्यात्मनि |
नु विज्ञानमयः कोशः प्रिये याति प्रबुद्धतां || 26||
आनंदावरणोन्नत्यात्यंतशांति-प्रदायिका |
तुरीयावस्थितिर्लोके साधकं त्वधिगच्छति || 27||
नाद बिंदु कलानां तु पूर्ण साधनया खलु |
नन्वानंदमयः कोशः साधके हि प्रबुद्ध्यते || 28||
भूलोकस्यास्य गायत्री कामधेनुर्मता बुधैः |
लोक आश्रयणेनामूं सर्वमेवाधिगच्छति || 29||
पंचास्या यास्तु गायत्र्याः विद्यां यस्त्ववगच्छति |
पंचतत्त्व प्रपंचात्तु स नूनं हि प्रमुच्यते || 30||
दशभुजास्तु गायत्र्याः प्रसिद्धा भुवनेषु याः |
पंच शूल महाशूलान्येताः संकेतयंति हि || 31||
दशभुजान्नामेतासां यो रहस्यं तु वेत्ति यं सः |
त्रासं शूलमहाशूलानां ना नैवावगच्छति || 32||
दृष्टिस्तु दोषसंयुक्ता परेषामवलंबनं |
भयं च क्षुद्रताऽसावधानता स्वार्थयुक्तता || 33||
अविवेकस्तथावेशस्तृष्णालस्यं तथैव च
एतानि दश शूलानि शूलदानि भवंति हि || 34||
निजैर्दशभुजैर्नूनं शूलान्येतानि तु दश |
संहरते हि गायत्री लोककल्याणकारिणी || 35||
कलौ युगे मनुष्याणां शरीराणीति पार्वति |
पृथ्वी तत्त्व प्रधानानि जानास्येव भवंति हि || 36||
सूक्ष्मतत्त्व प्रधानान्ययुगोद्भूत नृणामतः |
सिद्धीनां तपसामेते न भवंत्यधिकारिणः || 37||
पंचांग योग संसिद्ध्या गायत्र्यास्तु तथापि ते |
तद्युगानां सर्वश्रेष्ठां सिद्धिं संप्राप्नुवंति हि || 38||
गायत्र्या वाममार्गीयं ज्ञेयमत्युच्चसाधकैः |
उग्रं प्रचंडमत्यंतं वर्तते तंत्र साधनं || 39||
अत एव तु तद्गुप्तं रक्षितं हि विचक्षणैः |
स्याद्यतो दुरुपयोगो न कुपात्रैः कथंचन || 40||
गुरुणैव प्रिये विद्या तत्त्वं हृदि प्रकाश्यते |
गुरुं विना तु सा विद्या सर्वथा निष्फला भवेत् || 41||
गायत्री तु पराविद्या तत्फलावाप्तये गुरुः |
साधकेन विधातव्यो गायत्री-तत्त्व पंडितः || 42||
गायत्रीं यो विजानाति सर्वं जानाति स ननु |
जानातीमां न यस्तस्य सर्वा विद्यास्तु निष्फलाः || 43||
गायत्र्येवतपो योगः साधनं ध्यानमुच्यते |
सिद्धीनां सा मता माता नातः किंचित् बृहत्तरं || 44||
गायत्री साधना लोके न कस्यापि कदापि हि |
याति निष्फलतामेतत् ध्रुवं सत्यं हि भूतले || 45||
गुप्तमुक्तं रहस्यं यत् पार्वति त्वां पतिव्रतां |
प्राप्स्यंति परमां सिद्धिं ज्ञास्यंत्येतत् तु ये जनाः || 46 ||इति श्री गायत्री मंजरी संपूर्णं||
अर्थ
श्री गायत्री मंजरी स्तोत्र एक अत्यंत पवित्र और गहन आध्यात्मिक पाठ है, जो भगवान शिव और देवी पार्वती के बीच हुए संवाद के माध्यम से गायत्री देवी की महिमा और सर्वोच्चता को उजागर करता है। कैलाश पर्वत पर स्थित महादेव से देवी पार्वती ने प्रश्न किया, 'हे योगेश्वर, आप किस योग का अभ्यास करते हैं, जिससे आपको परम सिद्धि प्राप्त हुई है?' यह प्रश्न समस्त जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने वाले एक गहरे रहस्य को उद्घाटित करने का आधार बनता है। पार्वती के मधुर और श्रुतिप्रिय वचनों को सुनकर, महादेव विश्वकल्याणकारी रहस्य को प्रकट करने के लिए तैयार होते हैं।
भगवान शिव पार्वती से अत्यंत स्नेहपूर्वक कहते हैं, 'प्रिय, तुमने जो प्रश्न पूछा है, वह एक अत्यंत गोपनीय रहस्य है। फिर भी, मैं तुम्हें अपने प्रेम के कारण इसे बताऊंगा।' शिव स्पष्ट करते हैं कि गायत्री देवी वेदमाता हैं, आदि शक्ति हैं और समस्त जगत की जननी हैं। वे स्वयं भी उन्हीं की उपासना करते हैं। सभी यौगिक साधनाओं में, विद्वानों द्वारा गायत्री को ही मूलाधार माना गया है। यह गायत्री देवी अत्यंत रहस्यमयी हैं, दस भुजाओं वाली हैं और अपने पांच मुखों से पूरे लोक में सुशोभित होती हैं। शिव के इन अत्यंत गूढ़ वचनों को सुनकर पार्वती की जिज्ञासा और भी बढ़ जाती है। वे शिव से पूछती हैं, 'हे कृपालु, इन पांच मुखों और दस भुजाओं का क्या रहस्य है? कृपा करके मुझे बताएं।'
पार्वती के प्रश्न का उत्तर देते हुए, शिव गायत्री देवी के करुणामयी स्वरूप का विस्तार से वर्णन करते हैं। गायत्री देवी पृथ्वी पर एक महान शक्ति के रूप में प्रकट हुई हैं और सच्चे साधकों के लिए आंतरिक रूप से फलदायी हैं। हमारे शरीर में स्थित पांच कोश - अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश - सभी का मूल स्रोत गायत्री ही हैं। ये कोश जीवों के अस्तित्व के विभिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। गायत्री देवी अपनी मूल शक्ति से इन सभी कोशों को समाहित करती हैं। जो योगी इन पंचकोशों को समझ लेता है और उन पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, वह अनेक सिद्धियों और समृद्धि को प्राप्त करता है। शिव बताते हैं कि जो योगी इन पांच कोशों को गहराई से जानता है, वह भवसागर को पार कर परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
गायत्री मंजरी केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह गायत्री महामंत्र के गहरे आध्यात्मिक अर्थ और उसकी शक्ति को समझाने वाला एक ज्ञान भंडार है। इस स्तोत्र का पाठ साधकों को गायत्री देवी का अनुग्रह प्राप्त करने, पंचकोशों के रहस्य को समझने और अंततः मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायक होता है। यह गायत्री देवी की सर्वव्यापकता और सर्वोच्च शक्ति को हृदयंगम कराता है, जिससे साधक आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है और जीवन में पूर्णता प्राप्त करता है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि समस्त सृष्टि का मूल गायत्री में ही निहित है और उनकी उपासना से ही परम सत्य का साक्षात्कार संभव है।
लाभ (Benefits):
- ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि: गायत्री देवी वेदमाता हैं, इसलिए इस स्तोत्र के पाठ से ज्ञान, बुद्धि और विवेक शक्ति बढ़ती है। यह आध्यात्मिक और लौकिक ज्ञान के विकास में सहायक है।
- आत्म-शुद्धि और आंतरिक शांति: गायत्री देवी की महिमा को जानने और उनकी उपासना करने से मन और आत्मा शुद्ध होती है, जिससे साधक को गहरी आंतरिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
- संसार बंधन से मुक्ति: पंचकोशों के रहस्य को समझने और गायत्री देवी के अनुग्रह से, साधक भवसागर को पार कर मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है।
- सिद्धियों की प्राप्ति: गायत्री देवी की उपासना अष्ट सिद्धियों और नव निधियों को प्रदान करने की क्षमता रखती है, जिससे जीवन में समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।
- समस्त कल्याण: इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ विश्व कल्याण का भी कारण बनता है, क्योंकि गायत्री देवी समस्त जगत की जननी हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री गायत्री मंजरी स्तोत्र क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री गायत्री मंजरी स्तोत्र पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
श्री गायत्री मंजरी स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री गायत्री मंजरी स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
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