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श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रलक्ष्मी देवी
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दीपस्त्वमेव जगतां दयिता रुचिस्ते,
दीर्घं तमः प्रतिनिवृत्यमितं युवाभ्यां।
स्तव्यं स्तवप्रियमतः शरणोक्तिवश्यं
स्तोतुं भवंतमभिलष्यति जंतुरेषः ॥

दीपः पापहरो नॄणां दीप आपन्निवारकः
दीपो विधत्ते सुकृतिं दीपस्संपत्प्रदायकः।
देवानां तुष्टिदो दीपः पितॄणां प्रीतिदायकः
दीपज्योतिः परंब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ॥

दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते ॥

फलश्रुतिः
या स्त्री पतिव्रता लोके गृहे दीपं तु पूरयेत्।
दीपप्रदक्षिणं कुर्यात् सा भवेद्वै सुमंगला ॥

इति श्रीदीपलक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णं।

अर्थ

श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रम्, दीपक की दिव्य महिमा और उसके आध्यात्मिक महत्व का गुणगान करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है। हिंदू धर्म में दीपक को अत्यधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि यह अंधकार को दूर कर ज्ञान, शुभता और समृद्धि का प्रतीक है। यह स्तोत्र दीपक को केवल एक भौतिक वस्तु के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे देवताओं और परब्रह्म के स्वरूप के रूप में, विशेषकर देवी लक्ष्मी के प्रकाशमान रूप के रूप में पूजता है। यह दीपार्चना के माध्यम से पापों का निवारण कर, सुख-शांति-ऐश्वर्य प्राप्त करने का मार्ग बताता है।

स्तोत्र के प्रथम भाग में, 'दीपस्त्वमेव जगतां दयिता रुचिस्ते' कहकर दीपलक्ष्मी को जगत को प्रिय प्रकाश देने वाली कहा गया है। उनका प्रकाश अज्ञान के अंधकार को दूर करता है और भक्तों को ज्ञान का मार्ग दिखाता है। मनुष्य अपने पापों को दूर करने, कष्टों का निवारण करने और शुभ फल प्राप्त करने के लिए दीपलक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने हेतु स्तोत्रों द्वारा उनका स्मरण करते हैं। दीपक की ज्योति केवल प्रकाश नहीं, बल्कि यह दिव्य शक्ति और चेतना का प्रतीक है।

'दीपः पापहरो नृणां' नामक भाग दीपक के अत्यंत महत्वपूर्ण गुणों का वर्णन करता है। दीपक मनुष्यों के पापों को नष्ट करता है, आपदाओं का निवारण करता है और शुभ कर्मों को प्रेरित करता है। यह धन और समृद्धि प्रदान करता है। दीपक की ज्योति धर्म, सत्संकल्प और सद्गुणों को बढ़ाती है। दीपक देवताओं को संतुष्टि देता है और पितरों को आनंद प्रदान करता है। दीपक की ज्योति को परब्रह्म स्वरूप और साक्षात् जनार्दन (श्री महाविष्णु) के रूप में वर्णित किया गया है, जो दीपार्चना की आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है।

स्तोत्र की अंतिम पंक्ति, 'दीपो हरतु मे पापं संध्या दीप नमोऽस्तु ते' कहती है कि संध्या के समय दीपक जलाकर, “हे दीपक, मेरे पापों का निवारण करो” ऐसी प्रार्थना करने का महत्व बताया गया है। यह प्रार्थना पापों के नाश और मंगल प्राप्ति के लिए अत्यंत शक्तिशाली है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो पतिव्रता स्त्री अपने घर में प्रतिदिन दीपक जलाकर दीपक की परिक्रमा करती है, वह हमेशा सौभाग्यशाली रहती है और शुभ फलों से परिपूर्ण होती है। दीपार्चना केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह दिव्य ऊर्जा का आह्वान करने और जीवन को प्रचुरता, आनंद और शांति से भरने का एक पवित्र कार्य है।

लाभ (Benefits):

  • पाप निवारण: दीपार्चना अनजाने में किए गए पापों को नष्ट करती है और मन को शुद्ध करती है।
  • आपत्ति निवारण: दीपक का प्रकाश जीवन में आने वाली बाधाओं और कठिनाइयों को दूर करता है, जिससे सुगम मार्ग प्रशस्त होता है।
  • धन और समृद्धि: इस स्तोत्र का पाठ करने और दीपार्चना करने से धन, ऐश्वर्य और आर्थिक लाभ होता है।
  • देवता प्रसन्नता: दीपक की ज्योति देवताओं और पितरों को प्रसन्न करती है, जिससे उनका आशीर्वाद सदैव प्राप्त होता है।
  • सौभाग्य और शुभ फल: पतिव्रता स्त्रियां प्रतिदिन दीपार्चना और परिक्रमा करने से सदा सौभाग्यशाली रहती हैं और शुभ फल प्राप्त करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रं क्या है?
श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रं दीपक की महिमा और दीपक को लक्ष्मी देवी तथा परमात्मा का स्वरूप मानने वाला एक पवित्र प्रार्थना पाठ है। यह दीपक के माध्यम से पापों के निवारण और धन की प्राप्ति का वर्णन करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ सामान्यतः संध्या के समय दीपक जलाने के बाद करना उत्तम होता है। दीपक जलाकर, दीपलक्ष्मी का ध्यान करते हुए शुद्ध मन से स्तोत्र का पाठ करें और यदि संभव हो तो दीपक की परिक्रमा भी करें।
श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से पापों का निवारण होता है, कष्ट दूर होते हैं, धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही, देवता और पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रं का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति, विशेषकर जो अपने जीवन में शुभता चाहते हैं, पापों से मुक्ति पाना चाहते हैं और आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं, वे इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। पतिव्रता स्त्रियों के लिए यह विशेष रूप से फलदायी है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन कम से कम एक बार या तीन बार करना शुभ होता है। भक्ति और एकाग्रता के साथ पाठ करना महत्वपूर्ण है। संध्या के समय नियमित रूप से पाठ करने से उत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं।
श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रं का उद्गम क्या है?
श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रं प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित दीपार्चना के महत्व को प्रतिपादित करने वाला एक भाग है। इसका विशिष्ट ग्रंथ संदर्भ भिन्न हो सकता है, लेकिन दीपार्चना की प्रथा वैदिक काल से चली आ रही है।

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