अंतर्गृहे हेमसुवेदिकायां सम्मार्जनालेपनकर्म कृत्वा ।
विधानधूपातुलपंचवर्णं चूर्णप्रयुक्ताद्भुतरंगवल्यां ॥
अगाधसंपूर्णसरस्समाने, गोसर्पिषाऽऽपूरितमध्यदेशे ।
मृणालतंतुकृतवर्त्तियुक्ते पुष्पावतंसे तिलकाभिरामे ॥
परिष्कृतस्थापितरत्नदीपे ज्योतिर्मयीं प्रज्ज्वलयामि देवीं ।
नमाम्यहं मत्कुलवृद्धिदात्रीं, सौदादि सर्वांगणशोभमानां ॥
भो दीपलक्ष्मि प्रथितं यशो मे प्रदेहि मांगल्यममोघशीले ।
भर्तृप्रियां धर्मविशिष्टशीलां, कुरुष्व कल्याण्यनुकंपया मां ॥
यांतर्बहिश्चापि तमोऽपहंत्री, संध्यामुखाराधितपादपद्मा ।
त्रयीसमुद्घोषितवैभवा सा, ह्यनन्यकामे हृदये विभातु ॥
भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं ज्योतिषां प्रभुरव्ययः ।
आरोग्यं देहि पुत्रांश्च अवैधव्यं प्रयच्छ मे ॥
संध्यादीपस्तवमिदं नित्यं नारी पठेत्तु या ।
सर्वसौभाग्ययुक्ता स्याल्लक्ष्म्यनुग्रहतस्सदा ॥
शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयस्सुखं ।
देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभं ॥
इति दीपलक्ष्मी स्तवं संपूर्णं ।
अर्थ
श्री दीपलक्ष्मी स्तवं एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है जो दीपावली और प्रतिदिन की दीपाराधना के महत्व को प्रतिपादित करता है। हिंदू धर्म में दीपक केवल प्रकाश का स्रोत नहीं है, बल्कि इसे साक्षात् देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। यह स्तोत्र दीपक को प्रज्वलित करने की विधि, उसके आध्यात्मिक महत्व और उससे प्राप्त होने वाले लाभों का विस्तार से वर्णन करता है। इसका मुख्य उद्देश्य घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना, अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाना और धन-धान्य की वृद्धि करना है।
स्तोत्र का आरंभ घर के भीतर, स्वर्ण के समान चमकती वेदी पर दीपाराधना की तैयारियों से होता है। इसमें बताया गया है कि स्थान को स्वच्छ कर, धूप, पुष्प और रंगोली से अलंकृत किया जाना चाहिए। फिर, शुद्ध गाय के घी से भरे दीपक को प्रज्वलित करने का आह्वान किया जाता है, जो रत्नों से सुसज्जित हो। भक्त दीपज्योति को देवी का ही स्वरूप मानकर, अपने कुल की वृद्धि और घर की शोभा के लिए दीपलक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं। यह दर्शाता है कि दीपाराधना केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक क्रिया है जहाँ प्रत्येक तैयारी का अपना महत्व होता है।
दीपलक्ष्मी से स्त्रियाँ अपने पति के प्रति प्रेम, सौम्यता और धर्मनिष्ठ जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। ऐसी मान्यता है कि उनकी कृपा से उन्हें मंगल, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। दीपलक्ष्मी हमारे आंतरिक (मन के) और बाह्य (घर और जीवन के) अंधकार को दूर करती हैं। जब संध्याकाल में उनके चरण कमलों की पूजा की जाती है, तो वे वेदों में वर्णित वैभव को प्रदान करती हैं। दीपक को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है; यह स्वास्थ्य, संतान, ऐश्वर्य और सौभाग्य प्रदान करता है। दीपक प्रज्वलित करना वस्तुतः दैवीय ज्योति का साक्षात्कार करना है।
जो स्त्री प्रतिदिन संध्याकाल में इस स्तोत्र का पाठ करती है, वह सर्वसौभाग्यवती होती है और उस पर देवी लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। दीपलक्ष्मी की कृपा से आरोग्य, संपत्ति, शत्रुओं का नाश, सुख-शांति और उत्तम भाग्य की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र दीपाराधना के माध्यम से देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने का एक सरल और शक्तिशाली माध्यम प्रस्तुत करता है। यह मन की शुद्धता और भक्ति के साथ दीपक जलाने के महत्व पर जोर देता है।
लाभ (Benefits):
- स्वास्थ्य और ऐश्वर्य की वृद्धि: दीपलक्ष्मी की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य और अक्षय धन की प्राप्ति होती है।
- मानसिक शांति और सुख: यह आंतरिक अंधकार को दूर कर मन को शांति और जीवन में सुख प्रदान करता है।
- सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि: स्त्रियों को सौभाग्य, पति का प्रेम, उत्तम संतान और परिवार में समृद्धि प्राप्त होती है।
- शत्रु बाधा का निवारण और विजय: दीपलक्ष्मी की कृपा से बाधाएँ दूर होती हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
- दिव्य ज्ञान की प्राप्ति: दीपक को ब्रह्म स्वरूप माना गया है, अतः इसकी आराधना आध्यात्मिक ज्ञान और दिव्य साक्षात्कार की ओर अग्रसर करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दीपलक्ष्मी स्तवं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री दीपलक्ष्मी स्तवं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री दीपलक्ष्मी स्तवं का उद्गम क्या है?
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