ॐ प्रणमामि त्वत्पादपंकजयुग्मं
गुणातीतविद्याप्रभाविश्वरूपं ।
मणिकांचनदिव्यसिंहासनस्थे
फणिर्भूषणे (श्री)चंद्रलांबा नमस्ते ॥1॥
निराकारसाकार ओंकारगम्यं
परब्रह्मवस्तुप्रकाशस्वरूपं ।
परंज्योतिकौमारि कल्याणमूर्तिं
परः शक्ति श्रीचंद्रलांबा नमस्ते ॥2॥
अनध्यासमध्ये मनः ज्ञानशक्ती
सुनाशीर्मुखे मुनिजनास्तोमवंदे ।
मनःकामनासिद्धिकैवल्यदात्रे
घनानंद श्रीचंद्रलांबा नमस्ते ॥3॥
अपारः प्रभा दिव्यलावण्यगात्रे
अपानर्क सोमार्कवह्नित्रिनेत्रे ।
विपत्कर्मविध्वंसिनि विश्वभद्रे
कृपांभोनिधे चंद्रलांबा नमस्ते ॥4॥
गदापांचजन्यं भुजे चक्रपाणी
सदा सुप्रसन्नाश्रित कल्पवल्ली ।
चिदानंदतत्त्वात्मके योगमूर्ते
त्रिधाशक्ति श्रीचंद्रलांबा नमस्ते ॥5॥
जगज्जीवनि सृष्टिनिर्माणकारी
जगद्व्यापिगायत्रि वेदांतवेद्ये ।
अगम्यप्रतापप्रकाशस्वरूपे
अधारान्नि श्रीचंद्रलांबा नमस्ते ॥6॥
महालक्ष्मि कात्यायनि वेदमातः
महत्त्वादि भूतोदरी भूतनाथे ।
महाकालिके दिव्यमांगल्ययुक्ते
महाराज्ञि श्रीचंद्रलांबा नमस्ते ॥7॥
दिशामध्य देवि कुकुर भीमातटाके ?
प्रसन्ने सदा सन्नती ग्राम ईशे ।
प्रसिद्धादि पीठापुरीक्षेत्रवासे
प्रसन्नादि श्रीचंद्रलांबा नमस्ते ॥8॥
इति श्रीचंद्रलांबाष्टकं संपूर्णं ।
अर्थ
श्री चंद्रलांबिका अष्टकं, पीठापुरम में विराजमान आदिशक्ति श्री चंद्रलांबा देवी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह अष्टकं देवी के विभिन्न गुणों, शक्तियों और दिव्य महिमा का स्तुतिगान करता है, भक्तों को उनके दिव्य अस्तित्व की गहरी समझ प्रदान करता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि देवी के सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान स्वरूप का ध्यान है, जो उन्हें परब्रह्म स्वरूपिणी, जगद्रक्षक और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली देवी के रूप में पूजता है।
प्रत्येक श्लोक देवी के अद्वितीय गुणों को उजागर करता है। पहला श्लोक उनके चरणकमलों को नमन करता है, उन्हें गुणातीत विद्यास्वरूपिणी, मणिकांचन सिंहासन पर आसीन और सर्पभूषणधारिणी के रूप में वर्णित करता है। दूसरा श्लोक उन्हें निराकार, साकार ओंकार स्वरूपिणी, परब्रह्मवस्तुप्रकाश, परंज्योति और कल्याणमूर्ति के रूप में पूजता है, जो उनकी दिव्य शक्ति की अखंडता को दर्शाता है। तीसरा श्लोक उनके चंद्रमुखी रूप, मुनिजनों द्वारा स्तुति किए जाने वाले उनके स्वरूप और मनोकामना सिद्धि तथा कैवल्य प्रदान करने वाली आनंदमूर्ति के रूप में उनकी पहचान कराता है।
चौथे श्लोक में, देवी को अपार प्रभा और दिव्य लावण्य से युक्त, सूर्य, चंद्र और अग्नि का प्रतिनिधित्व करने वाली त्रिनेत्री, विपत्कर्मों का नाश करने वाली और करुणासागर के रूप में वर्णित किया गया है। पांचवां श्लोक गदा और चक्र धारण करने वाली उनके शक्तिशाली रूप, भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान सदा प्रसन्न रहने वाली, चिदानंदतत्त्व और योगमूर्ति स्वरूपिणी के रूप में उनकी महिमा का गुणगान करता है। छठा श्लोक उन्हें जगत की सृष्टिकर्ता, जीवनदायिनी, गायत्री स्वरूपिणी और वेदांत के माध्यम से जानने योग्य परम तेज के आधारभूत के रूप में घोषित करता है।
सातवां श्लोक देवी के विभिन्न दिव्य अभिव्यक्तियों को महालक्ष्मी, कात्यायनी, वेदमाता, भूतनाथपत्नी, महाकाली, मंगलमूर्ति और परमरानी के रूप में प्रशंसित करता है, जो उनकी सर्वशक्तिमत्ता को इंगित करता है। अंततः, आठवां श्लोक पीठापुरम के कुकुर भीमातट पर विराजमान, सदा प्रसन्न, करुणामयी और समस्त ग्रामों की आराध्य देवी श्री चंद्रलांबा देवी को नमस्कार अर्पित करता है। इस अष्टकं का पाठ करने से भक्त दिव्य अनुग्रह, ज्ञान, शांति और सुरक्षा प्राप्त करते हैं।
लाभ (Benefits):
- ज्ञान और बुद्धि: देवी विद्यास्वरूपिणी होने के कारण, इस अष्टकं का नियमित पाठ करने से ज्ञान में वृद्धि होती है और बुद्धि तीव्र होती है।
- मन की शांति और आनंद: देवी आनंदमूर्ति और कल्याणरूपिणी होने के कारण, उनकी स्तुति करने से मन को शांति मिलती है और आंतरिक आनंद बढ़ता है।
- समस्याओं से मुक्ति: देवी विपत्कर्मविध्वंसिनी होने के कारण, भक्तों की सभी परेशानियाँ और बाधाएँ दूर होती हैं।
- इच्छित फल और मोक्ष: देवी मनोकामना सिद्धि और कैवल्यदायिनी होने के कारण, भक्तों की सद्भावनापूर्ण इच्छाएं पूरी होती हैं और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- दिव्य सुरक्षा: देवी कृपांबोनिधि और विश्वभद्रे होने के कारण, इस स्तोत्र का पाठ करने वालों को सदैव दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री चंद्रलांबिका अष्टकं क्या है?
श्री चंद्रलांबिका अष्टकं का पाठ कब करना चाहिए?
श्री चंद्रलांबिका अष्टकं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
श्री चंद्रलांबिका अष्टकं का पाठ कौन कर सकता है?
श्री चंद्रलांबिका अष्टकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री चंद्रलांबिका अष्टकं का उद्गम क्या है?
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