श्री बटुकभैरव कवचं
श्रीभैरव उवाच |
देवेशि देहरक्षार्थं कारणं कथ्यतां ध्रुवं |
म्रियंते साधका येन विना श्मशानभूमिषु ||
रणेषु चातिघोरेषु महावायुजलेषु च |
शृंगिमकरवज्रेषु ज्वरादिव्याधिवह्निषु ||
श्रीदेव्युवाच |
कथयामि शृणु प्राज्ञ बटोस्तु कवचं शुभं |
गोपनीयं प्रयत्नेन मातृजारोपमं यथा ||
तस्य ध्यानं त्रिधा प्रोक्तं सात्त्विकादिप्रभेदतः |
सात्त्विकं राजसं चैव तामसं देव तत् शृणु ||
ध्यानं –
वंदे बालं स्फटिकसदृशं कुंडलोद्भासिवक्त्रं
दिव्याकल्पैर्नवमणिमयैः किंकिणीनूपुराद्यैः |
दीप्ताकारं विशदवदनं सुप्रसन्नं त्रिनेत्रं
हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं शूलखड्गौदधानं || 1 ||
उद्यद्भास्करसन्निभं त्रिनयनं रक्तांगरागस्रजं
स्मेरास्यं वरदं कपालमभयं शूलं दधानं करैः |
नीलग्रीवमुदारभूषणशतं शीतांशुचूडोज्ज्वलं
बंधूकारुणवाससं भयहरं देवं सदा भावये || 2 ||
ध्यायेन्नीलाद्रिकांतं शशिशकलधरं मुंडमालं महेशं
दिग्वस्त्रं पिंगकेशं डमरुमथ सृणिं खड्गशूलाभयानि |
नागं घंटां कपालं करसरसिरुहैर्विभ्रतं भीमदंष्ट्रं
सर्पाकल्पं त्रिनेत्रं मणिमयविलसत्किंकिणी नूपुराढ्यं || 3 ||
अस्य वटुकभैरवकवचस्य महाकाल ऋषिरनुष्टुप्छंदः श्रीवटुकभैरवो देवता बं बीजं ह्रीं शक्तिरापदुद्धारणायेति कीलकं मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे विनियोगः |
कवचं –
ॐ शिरो मे भैरवः पातु ललाटं भीषणस्तथा |
नेत्रे च भूतहननः सारमेयानुगो भ्रुवौ || 1
भूतनाथश्च मे कर्णौ कपोलौ प्रेतवाहनः |
नासापुटौ तथोष्ठौ च भस्मांगः सर्वभूषणः || 2
भीषणास्यो ममास्यं च शक्तिहस्तो गलं मम |
स्कंधौ दैत्यरिपुः पातु बाहू अतुलविक्रमः || 3
पाणी कपाली मे पातु मुंडमालाधरो हृदं |
वक्षःस्थलं तथा शांतः कामचारी स्तनं मम || 4
उदरं च स मे तुष्टः क्षेत्रेशः पार्श्वतस्तथा |
क्षेत्रपालः पृष्ठदेशं क्षेत्राख्यो नाभितस्तथा || 5
कटिं पापौघनाशश्च बटुको लिंगदेशकं |
गुदं रक्षाकरः पातु ऊरू रक्षाकरः सदा || 6
जानू च घुर्घुरारावो जंघे रक्षतु रक्तपः |
गुल्फौ च पादुकासिद्धः पादपृष्ठं सुरेश्वरः || 7
आपादमस्तकं चैव आपदुद्धारणस्तथा |
सहस्रारे महापद्मे कर्पूरधवलो गुरुः || 8
पातु मां वटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु |
पूर्व स्यामसितांगो मे दिशि रक्षतु सर्वदा || 9
आग्नेय्यां च रुरुः पातु दक्षिणे चंडभैरवः |
नैरृत्यां क्रोधनः पातु मामुन्मत्तस्तु पश्चिमे || 10
वायव्यां मे कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः |
भीषणो भैरवः पातूत्तरस्यां दिशि सर्वदा || 11
संहारभैरवः पातु दिश्यैशान्यां महेश्वरः |
ऊर्ध्वे पातु विधाता वै पाताले नंदिको विभुः || 12
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः |
वामदेवोऽवतु प्रीतो रणे घोरे तथावतु || 13
जले तत्पुरुषः पातु स्थले पातु गुरुः सदा |
डाकिनीपुत्रकः पातु दारांस्तु लाकिनीसुतः || 14
पातु साकलको भ्रातॄन् श्रियं मे सततं गिरः |
लाकिनीपुत्रकः पातु पशूनश्वानजांस्तथा || 15
महाकालोऽवतु च्छत्रं सैन्यं वै कालभैरवः |
राज्यं राज्यश्रियं पायात् भैरवो भीतिहारकः || 16
रक्षाहीनंतु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन च |
तत् सर्वं रक्ष मे देव त्वं यतः सर्वरक्षकः || 17
एतत् कवचमीशान तव स्नेहात् प्रकाशितं |
नाख्येयं नरलोकेषु सारभूतं च सुश्रियं || 18
यस्मै कस्मै न दातव्यं कवचेशं सुदुर्लभं |
न देयं परशिष्येभ्यः कृपणेभ्यश्च शंकर || 19
यो ददाति निषिद्धेभ्यः स वै भ्रष्टो भवेद्ध्रुवं |
अनेन कवचेशेन रक्षां कृत्वा द्विजोत्तमः || 20
विचरन् यत्र कुत्रापि विघ्नौघैः प्राप्यते न सः |
मंत्रेण म्रियते योगी कवचं यन्न रक्षितः || 21
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन दुर्लभं पापचेतसां |
भूर्जे रंभात्वचे वापि लिखित्वा विधिवत् प्रभो || 22
धारयेत् पाठयेद्वापि संपठेद्वापि नित्यशः |
संप्राप्नोति प्रभावं वै कवचस्यास्य वर्णितं || 23
नमो भैरवदेवाय सारभूताय वै नमः |
नमस्त्रैलोक्यनाथाय नाथनाथाय वै नमः || 24
इति विश्वसारोद्धारतंत्रे आपदुद्धारकल्पे भैरवभैरवीसंवादे वटुकभैरवकवचं समाप्तं ||
अर्थ
श्री बटुकभैरव कवच भगवान शिव के उग्र रूप बटुकभैरव की पूर्ण कृपा, शक्ति और भयनाशकत्व का वर्णन करने वाला एक महा कवच है। यह साधक को सभी प्रकार के खतरों से बचाने के लिए बनाया गया है। इस कवच की शुरुआत में, देवी भैरव से प्रश्न करती हैं—साधक श्मशान, भयंकर युद्धक्षेत्र, महावायु और जल प्रलय, ज्वर, और भयानक बीमारियों जैसी अनेक आपदाओं में क्यों नष्ट हो जाते हैं? वह इन आपदाओं से रक्षा के लिए एक गोपनीय उपाय बताने का अनुरोध करती हैं। इसके उत्तर में, भगवान भैरव बताते हैं कि अद्भुत शक्ति वाला बटुकभैरव कवच देवी के माध्यम से मनुष्यों को सिखाया जाएगा, जो उन्हें सभी संकटों से बचाएगा।
कवच के ध्यान श्लोकों में बटुकभैरव के तीन रूप वर्णित हैं। पहले रूप में, वे स्फटिक के समान कांतिमान शरीर वाले, त्रिनेत्रधारी, शूल और खड्ग धारण किए हुए एक दयालु बालक के रूप में दिखाई देते हैं। दूसरे रूप में, वे रक्तांबर धारण किए हुए, नीलकंठ वाले, कपाल और अभय मुद्रा धारण किए हुए दर्शन देते हैं। तीसरे रूप में, वे डमरू, खड्ग, शूल, नागों और कपालों को धारण किए हुए एक भयंकर किंतु रक्षक स्वरूप में प्रकट होते हैं। ये तीनों ध्यान सात्त्विक, राजसिक और तामसिक स्वभाव के अनुसार भक्त के अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए कहे गए हैं, जिससे साधक की आध्यात्मिक उन्नति होती है।
कवच शरीर के प्रत्येक भाग को बटुकभैरव के विभिन्न नाम-रूपों से संरक्षित करता है। जैसे, सिर की रक्षा भैरव करते हैं, ललाट की भीषण, नेत्रों की भूतहनन, कानों की भूतनाथ, कपोलों की प्रेतवाहन, और नासिका, ओष्ठ, मुख तथा कंठ की रक्षा भैरव के भिन्न-भिन्न रूप करते हैं। भुजाएँ, हृदय, वक्षस्थल, स्तन, उदर, नाभि, पीठ, कमर, लिंगस्थान, जंघाएँ, पिंडली और पैर—शरीर के प्रत्येक क्षेत्र को बटुकभैरव के विशिष्ट और शक्तिशाली रूप संरक्षक के रूप में नियुक्त होते हैं। यह साधक को हर क्षण 'सर्वांग रक्षा' प्रदान करने वाला एक उत्तम कवच है, जो उसे भीतर और बाहर दोनों ओर से सुरक्षित रखता है।
दिक्पालना के रूप में भी यह कवच रक्षा प्रदान करता है—पूर्व दिशा में असितांगभैरव, आग्नेय में रुरु, दक्षिण में चंडभैरव, पश्चिम में उन्मत्तभैरव, उत्तर में भीषणभैरव और ईशान में संहारभैरव रक्षा करते हैं, जिससे सभी दिशाओं से सुरक्षा सुनिश्चित होती है। पृथ्वी, जल, आकाश और पाताल—प्रत्येक लोक में बटुकभैरव रक्षक के रूप में खड़े रहते हैं। यह ग्रंथ स्पष्ट रूप से कहता है कि यह कवच गोपनीय है और इसे दुर्भावना रखने वालों को नहीं देना चाहिए। इसे गुरु-शिष्य परंपरा में विश्वास के साथ ही साझा किया जाना चाहिए। अंत में, यह महाफल बताया गया है कि जो इस कवच को धारण करते हैं, पाठ करते हैं या नित्य जप करते हैं, उन्हें कहीं भी विघ्न नहीं आते, दुष्ट शक्तियाँ पास नहीं आतीं और युद्ध में भी पराजय नहीं होती।
लाभ (Benefits):
- सर्वांग एवं सर्वदिशा रक्षा: यह कवच शरीर के प्रत्येक अंग और सभी दिशाओं से व्यापक सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे भक्त सभी बाहरी और आंतरिक खतरों से सुरक्षित रहता है।
- दुष्ट शक्तियों और दोषों का निवारण: दुष्ट आत्माओं, भूत-प्रेतों, पिशाचों, शत्रुओं से उत्पन्न बाधाओं और अन्य नकारात्मक प्रभावों को दूर करता है।
- आपदाओं से मुक्ति: युद्ध, बाढ़, अग्नि, ज्वर, घातक बीमारियों, जंगली जानवरों के हमलों और अन्य भयानक आपदाओं से रक्षा प्रदान करता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: सात्त्विक, राजसिक और तामसिक गुणों के माध्यम से मन को शुद्ध करता है, ध्यान में एकाग्रता बढ़ाता है और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।
- संकट निवारण और विजय: जीवन के सभी संकटों को दूर करता है और साधक को उसके सभी प्रयासों में सफलता और विजय दिलाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री बटुकभैरव कवच क्या है?
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री बटुकभैरव कवच के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री बटुकभैरव कवच का पाठ कौन कर सकता है?
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री बटुकभैरव कवच का उद्गम क्या है?
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