रथमध्यामश्वपूर्वां गजनादप्रबोधिनीं ।
साम्राज्यदायिनीं देवीं गजलक्ष्मीं नमाम्यहं ॥1॥
धनमग्निर्धनं वायुः धनं भूतानि पंच च ।
प्रभूतैश्वर्यसंधात्रीं धनलक्ष्मीं नमाम्यहं ॥2॥
पृथ्वीगर्भसमुद्भिन्ननानाव्रीहिस्वरुपिणीं ।
पशुसंपत्स्वरूपां च धान्यलक्ष्मीं नमाम्यहं ॥3॥
न मात्सर्यं न च क्रोधो न भीतिर्न च भेदधीः ।
यद्भक्तानां विनीतानां धैर्यलक्ष्मीं नमाम्यहं ॥4॥
पुत्रपौत्रस्वरूपेण पशुभृत्यात्मना स्वयं ।
संभवंती च संतानलक्ष्मीं देवीं नमाम्यहं ॥5॥
नानाविज्ञानसंधात्रीं बुद्धिशुद्धिप्रदायिनीं ।
अमृतत्वप्रदात्रीं च विद्यालक्ष्मीं नमाम्यहं ॥6॥
नित्यसौभाग्यसौशील्यं वरलक्ष्मीं ददाति या ।
प्रसन्नां स्त्रैणसुलभां आदिलक्ष्मीं नमाम्यहं ॥7॥
सर्वशक्ति स्वरूपां च सर्वसिद्धिप्रदायिनीं ।
सर्वेश्वरीं श्री विजयलक्ष्मीं देवीं नमाम्यहं ॥8॥
अष्टलक्ष्मींसमाहारस्वरुपां तां हरिप्रियां ।
मोक्षलक्ष्मीं महालक्ष्मीं सर्वलक्ष्मीं नमाम्यहं ॥9॥
दारिद्र्यदुःखहरणं समृद्धिमपि संपदां ।
सच्चिदानंदपूर्णत्वं अष्टलक्ष्मीस्तुतेर्भवेत् ॥10॥
इति श्रीदत्तपीठाधीश्वर श्री गणपति सच्चिदानंदयतिवर
विरचिता अष्टलक्ष्मीस्तुतिः समाप्ता ।
अर्थ
श्री अष्टलक्ष्मी स्तुति जगद्गुरु श्री गणपति सच्चिदानंद स्वामीजी द्वारा रचित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह धन, समृद्धि, ज्ञान, साहस, संतान, विजय और मोक्ष प्रदान करने वाली अष्ट लक्ष्मियों के आठ रूपों की स्तुति करता है। यह स्तुति केवल भौतिक धन के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन के सभी क्षेत्रों में पूर्णता और आध्यात्मिक उत्थान के लिए महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का मार्ग दिखाती है।
यह स्तुति महालक्ष्मी के आठ विभिन्न आयामों का आह्वान करती है, जिनमें से प्रत्येक मानव जीवन की एक विशिष्ट आवश्यकता को पूरा करता है। यह गजलक्ष्मी से शुरू होकर राजसी वैभव और प्रभुत्व की कामना करती है, फिर धनलक्ष्मी भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करती है। धान्यलक्ष्मी कृषि समृद्धि और पशुधन सुनिश्चित करती है, जबकि धैर्यलक्ष्मी मन के भय, क्रोध और ईर्ष्या को दूर कर साहस प्रदान करती है। संतानलक्ष्मी संतान सुख प्रदान करती है, जबकि विद्यालक्ष्मी ज्ञान, बुद्धि की शुद्धि और अमरत्व प्रदान करती है। आदिलक्ष्मी शाश्वत सौभाग्य और सौम्यता प्रदान करती है, जबकि विजयलक्ष्मी सभी बाधाओं को दूर कर विजय दिलाती है। अंततः, इन सभी रूपों के समग्र स्वरूप महालक्ष्मी की स्तुति करके मोक्ष और सच्चिदानंद की पूर्णता प्राप्त करने की प्रार्थना की जाती है।
इस स्तोत्र का नियमित पाठ भक्तों के जीवन में समग्र परिवर्तन लाता है। यह केवल बाहरी धन ही नहीं, बल्कि आंतरिक शांति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागृति भी प्रदान करता है। लक्ष्मी का प्रत्येक रूप एक विशिष्ट शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, और उनका संयुक्त आशीर्वाद भक्त को सभी प्रकार के सौभाग्य प्रदान करता है। यह स्तुति मन को शुद्ध करती है, नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करती है और सकारात्मक स्पंदनों को आकर्षित करती है, जिससे भक्त हमेशा खुशी और समृद्धि से भरा रहता है।
लाभ (Benefits):
- दरिद्रता का नाश: इस स्तुति के नियमित पाठ से आर्थिक संकट दूर होते हैं और धन तथा समृद्धि में वृद्धि होती है।
- साहस और आत्मविश्वास: धैर्यलक्ष्मी की कृपा से मन के भय, चिंता, ईर्ष्या और क्रोध दूर होते हैं तथा आत्मविश्वास बढ़ता है।
- ज्ञान और बुद्धि की शुद्धि: विद्यालक्ष्मी की कृपा से उत्तम ज्ञान, स्पष्ट बुद्धि और अमरत्व का बोध प्राप्त होता है।
- संतान और पारिवारिक सुख: संतानलक्ष्मी के आशीर्वाद से पुत्र-पौत्र संतान सुख और परिवार में शांति तथा खुशी बनी रहती है।
- समस्त सिद्धियाँ और विजय: विजयलक्ष्मी के प्रभाव से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता, विजय और उद्देश्यों की पूर्ति संभव होती है।
- आध्यात्मिक उत्थान और मोक्ष: अष्ट लक्ष्मियों के समग्र स्वरूप महालक्ष्मी की कृपा से सच्चिदानंद की पूर्णता और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अष्टलक्ष्मी स्तुति क्या है?
श्री अष्टलक्ष्मी स्तुति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
श्री अष्टलक्ष्मी स्तुति का पाठ कौन कर सकता है?
श्री अष्टलक्ष्मी स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस अष्टलक्ष्मी स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
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