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शिव पद मणिमाला

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स्तोत्रशिव
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शिव पद मणिमाला

शिवेति द्वौवर्णौ परपद नयद्धंस गरुतौ
तटौ संसाराब्धेर्निजविषय बोधांकुर दले |
श्रुतेरंतर्गोपायित पररहस्यौ हृदिचरौ
घरट्टग्रावाणौ भव विटपि बीजौघ दलने || 1 ||

शिवेति द्वौवर्णौ जनन विजय स्तंभ कलशौ
दुरंतांतर्ध्वांत प्रमथन शुभाधान चतुरौ |
महायात्राध्वस्य प्रमुख जनता कंचुकिवरौ
मरुज्घंपायौतौ कृतफल नवांभोदमथने || 2 ||

शिवेति द्वौवर्णौ शिवमवदतां चैव वसुधा-
-मुभाभ्यां वर्णाभ्यां रथरथिक यो राज्यकलनात् |
ततः सर्वः शेषः परिकर इहात्यत्किमपि नो
क्व चाऽहं क्व त्वं ना क्व परमिदमूह्यं बुधगणैः || 3 ||

शिवेति द्वौवर्णौ विहपरसुखाधान चतुरौ
क्रमोच्चाराद्धातोर्विनिमयवशादर्थघटने |
रहस्यार्थो ह्येषः प्रकटयति नाम्नि क्षितिरथं
प्रजानामानंदं किमिति न विदुर्मूढधिषणाः || 4 ||

शिवेति द्वौवर्णौ यजुषितु चतुर्थ्येकवचनो
नमः पूर्वो मंत्रः समजनिजनिध्वंस हतये |
तथापि प्रज्ञांधाः जननमृति नक्राहिजटिले
पतंत्येतच्चित्रं भवजलधिपंके शिवशिव || 5 ||

शिवेति द्वौवर्णौ भजत भजदानंदजनके
भुवो भर्ता भूत्वा स तु भवति मुक्तेरपि तथा |
उभाभ्यां वर्णाभ्यामधिगमयतार्तं विनिमयात्
ववर्णो भूभारं दिशति हि शिकारः परपदं || 6 ||

शिवेति द्वौवर्णौ द्विवचन कृत द्वंद्वकलना-
-द्ब्रुवंतौ गूढार्थं भगवदनुबंधान्वित धियः |
न कश्चिन्मंत्रश्च प्रथयति तदर्थानुगमनं
ततोऽयं सर्वासु श्रुतिषु जयघंटा विजयते || 7 ||

शिवेति द्वौवर्णौ प्रथममभिधायानुगुणतः
अथो मे संधानाद्गतिरिति च संधान परथ |
न कालो बध्नाति त्यजति ननु तत्काल इह वः
किमर्थं संसारे पतथ यतथेमं मनुवरं || 8 ||

शिवेति द्वौवर्णौ चरमपद विश्वस्वरयुता
वहं शब्दोच्चाराद्भवति खलु वर्णत्रयमनुः |
इमं प्राणायामैः पठथ हठयोगादिभिरलं
भवेदात्मेशैक्यं करबदरतुल्यं बुधवराः || 9 ||

शिवेति द्वौवर्णौ मम कनकरत्नायुषकथा
सुधाभोगाभोगामनुजपतपोध्यानविधयः |
प्रथा बोधस्मृतिरतिगति प्राप्तिनिधयः
भवेतां प्रारब्ध प्रमथन शुभाधान चतुरौ || 10 ||

शिवेति द्वौवर्णौ प्रति सरधरौ मुक्तिजनने
जनुर्लक्षाकोटि प्रमथन परा नित्यसदृशौ |
कियंतो विस्रस्ता जगति जनका मज्जननतः
स्मृतिं जज्ञे चित्तं शिवशिव कदाप्यस्तुव जनुः || 11 ||

शिवेति द्वौवर्णौ विहजनुषि लब्धौकिलमुया
पुरा गंगा स्नाता ननु किमु कृतं चाध्वरशतं |
जडस्यैवं किं स्याज्जनककृतमाद्यं खलु तपः
कुमारो मे स्यादित्यनुमितमिदं तद्धि परमं || 12 ||

शिवेति द्वौवर्णौ शिवशिव कदा नो पठितवान्
पुरा नो चेत् किंस्वित् जठर पिठरी संस्थितिरियं |
क्व शंभोर्नामोक्तिः क्व जननकथा चंडकिरणे
तपत्यभ्रेऽदभ्र भ्रमणमिह किं स्याद्धि तमसः || 13 ||

शिवेति द्वौवर्णौ निरत दुरित ध्वंसनपरौ
अयत्नाद्यस्यास्तां जगति सकृदास्यांतरगतौ |
न तस्याप्याशास्यः सुरकुलधुरीणस्य निलयः
न धातुस्तस्यासीत्पितुरपि स सर्वस्य जनकः || 14 ||

शिवेति द्वौवर्णौ जगपति समवायस्तदपरं
निमित्तं वर्णानां श्रुतिपथ रहस्यं निगदितं |
न चेदित्थं सृष्टौ परिकर इहान्योस्तियदिकः
शिवे सर्वाद्वैते न किमपि च वस्तुप्रथयति || 15 ||

शिवेति द्वौवर्णौ वचसि मनसि ध्वस्त दुरितौ
प्रहृत्यांतर्ध्वांतं मिहिर शशिनोः शक्तिमघनां |
प्रहस्य व्याख्यातस्तदुचित तमोभेदनपदे
समासे नो षष्ठी विकसति तृतीयैव सुकरा || 16 ||

शिवेति द्वौवर्णौ भुवन भवजातांडघटना
पटिष्ठे चोर्ध्वाथः स्फुटपटुतरे खर्परयुगे |
शिवोलिंगं सर्वं तदुदरगतं स्याद्धि निगमः
तथावादी सत्यं पदति खलु तत्केन भवति || 17 ||

शिवेति द्वौवर्णौ भज यज शिवार्धांग वपुषं
त्यजासंतं मार्गं व्रजशिवपुरीं मुक्तिनिलयां |
न चेदेतौ वरौ भजसि यज दैवास्यममुतः
त्यज श्रौतं मार्गं व्रज निरयमिच्छैव सुखदा || 18 ||

शिवेति द्वौवर्णौ पठति समहान् धातृविषये
पलायध्वं यूयं भवथ भयभीता यमभटाः |
पतंत्या संसार भ्रमण परिताप प्रमथन
प्रचंडास्तस्याग्रे प्रमथपति वीक्षारसझराः || 19 ||

शिवेति द्वौवर्णौ मम विमल जन्मावनिरुहः
फले द्वे तत्रैकं जनयति रुचीः पायसमयीः |
फलत्येकं सर्पिर्द्वयमपि मदग्रग्रसनतः
त्वरत्येकास्वादे नमति रुचितासीद्द्विकलने || 20 ||

शिवेति द्वौवर्णौ पठसि हठयोगादिभिरलं
किमुद्दिश्यात्मानं व्यथयसि वृथा भ्रांतिरफला |
करस्थे श्रीखंडे मृगयसि हि मुस्तां सिकतले
जडादेशः कां कां दिशति विपदं नो शिव शिव || 21 ||

शिवेति द्वौवर्णौ वद यदि शिवं वांछति भवान्
न चेदेतन्नेव श्रुतिसमय सिद्धांतमवदं |
विना हेतोः कार्यं न खलु पटतंतून् घटमृदः
न जानीषे किं वा शिवविरहितो नाप्स्यति शिवं || 22 ||

शिवेति द्वौवर्णौ परमशिव कारुण्यजलधे
स्थिरीकृत्य स्वांते मम विमलभावं कुरु सदा |
चरेयं सर्वं ते निरुपम निरातंक महसां
ज्वलज्ज्वालाजाल ज्वलितमिदमासीज्जगदिति || 23 ||

शिवेति द्वौवर्णौ वद वद रसज्ञे बुधगणाः
भवंतीं तन्नाम्नीमभिदधतु चैनं यदि न चेत् |
न योगं रूढिं वा भजसि खलु डित्थादि तुलना
भवेद्दैवीशक्तिस्त्वयि विफलिता स्याद्धिचिनुहि || 24 ||

शिवेति द्वौवर्णौ जगति खलु नेत्रद्वयमिदं
बहिश्चक्षुर्द्वंद्वं न हि दिशति वस्तु व्यवहितं |
इदं बाह्याभ्यंतः स्फुट विमल विज्ञान विभवं
गरीयस्त्वोच्चाराद्दिशति खलु नेत्रं समधिकं || 25 ||

शिवेति द्वौवर्णौ वदनसदने यस्य महतः
तदीयं पादाब्जं रघुपति पदाब्जं प्रहसति |
न तच्चित्रं तस्मिन् परम पुरुषार्थं प्रदरजो
व्रजालाने मौनेर्दिशति किल संसारपतनं || 26 ||

शिवेति द्वौवर्णौ सकृथवशमुच्चारण बलात्
दिशेतां साम्राज्यं पुरमथन ते मुक्तिनिलयं |
न चेत्तस्यैवांतः किमिव निवसेदांतरगुहा-
-विहारेलोलः सन्निदमुदवहन्मे दृढपदं || 27 ||

शिवेति द्वौवर्णौ क्षितिजलशिखिस्पर्शनवियत्
विवस्वच्छीतांशु प्रथमपुरुषैरष्टभिरिदं |
ततं विश्वं पश्चाद्वदति इति मत्वा सुखमहो
नरः प्रोज्झन् सर्वं किमिति न पिबेत्तन्मथुरसं || 28 ||

शिवेति द्वौवर्णौ प्रकटित निजद्वंद्वविधया
जगन्मातापित्रोर्मिधुनमदधातां श्रुतिपथे |
जनास्तस्माद्यूयं तरत चरतावश्यमवनौ
पितृभ्यां नैवान्यत् परमपद संप्राप्ति विभवे || 29 ||

शिवेति द्वौवर्णौ रसिक रसना रंगचतुरौ
मनोधर्माधर्माभ्यसन गजकंठीरव शिशू |
वपुः कार्याकार्य व्यसन हरिण व्याघ्रकलभौ
विनोदं तन्वाते किमिह मम कालापनयने || 30 ||

शिवेति द्वौवर्णौ जगति वशधातु प्रकटिता
विति प्रोचुः केचिद्ध्रुवमिति तदीयास्त्वचतुराः |
शिवात्सूत्रोद्धारस्तदनुखलु धात्वर्थ विवृतिः
कथं पौर्वापर्यं वदत विबुधाः संशयमिदं || 31 ||

शिवेति द्वौवर्णौ गुरुमुखत येष्यन्नहरहः
जपिष्यत्याशास्यं न खलु तदयं पूर्णहृदयः |
इति प्राचीनास्ते शिवपदमुपेत्य स्थितिमिताः
किमुद्दिश्याजापीस्त्वमिह शिव एवासि भगवान् || 32 ||

शिवेति द्वौवर्णौ मनुरयमभिन्न स्वरहलां
विभेदाश्चत्वारः फलित पुरुषार्थः श्रुतिमताः |
नचैकस्मिन्मंत्रे सकलपुरुषार्थ प्रतिगतिः
किमर्थं भ्रांत्यान्यन्मनु धिषणया बिभ्रथ धुरं || 33 ||

शिवेति द्वौवर्णौ मधुरिम गरिम्णा मधुरसे
पयःपूरे कुत्सां न परमपरं किं जनयतां |
जिहासन्नाहारे सुरपुरि सदा गांग सलिलं
पिबन् को वा लिप्सां भजति सरसः पल्वलजले || 34 ||

शिवेति द्वौवर्णौ परमपद मां पाहि पदयो-
-र्मिळित्वाधावंते युगमभव दष्टाक्षरमनुः |
सकृत्तं यः कोवा पठति तदधीनो गिरिधनुः
परः सर्वाद्वैत प्रथित निजसाम्राज्यविभवैः || 35 ||

शिवेति द्वौवर्णौ मम वपुषि सर्वांग कवचौ
परं सव्यासव्य प्रसरण पटिष्ठांबक वरौ |
उभावंतर्बाह्याहित मथनकोदंडतिलकौ
भृशं स्यात्तां मोक्षश्रियमवसरे दातु मुदितौ || 36 ||

शिवपदादधिको न परो मनुः
शिवपदादधिका न परा गतिः |
शिवपदादधिकं न परं पदं
शिवपदादधिकं न हि शासनं || 37 ||

शिवस्त्राता शिवोदाता शिवो माता शिवः पिता |
शिव एव हि मे सर्वं शिवादन्यं न वेद्म्यहं || 38 ||

शिवपदमणिमालां ये तु कैवल्यमूलां
दधति पठनमात्राद्द्राक्छिवाधीन चित्ताः |
भवति खलु भवानी भर्गयो राजधानी
प्रमथ विहृतिवाटी भानुभूतेश्च पेटी || 39 ||

शिवलिंगमुमैवांग मनया सहितस्तथा |
तयोः संबंध इत्येवं पदत्रयमुपास्महे || 40 ||

इति श्रीशंकराचार्यकृत शिवपदमणिमाला |

अर्थ

"शिव पद मणिमाला" नामक यह पवित्र स्तोत्र भगवान शिव के नाम के अत्यंत दुर्लभ सार को अत्यंत शक्तिशाली ढंग से प्रकट करता है। "शिवेति द्वौ वर्णौ..." इस मंत्राक्षर की पुनरावृत्ति के माध्यम से, यह स्तोत्र भगवान शिव की रक्षात्मक, शुद्धिकारक और मोक्षदायक शक्ति को अद्वितीय रूप से उजागर करता है। प्रत्येक श्लोक 'शिव' नामक दो अक्षरों के महत्व पर जोर देता है, यह बताते हुए कि वे केवल अक्षर नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड के सार, सृष्टि, स्थिति और लय को नियंत्रित करने वाली परम शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह शिव के चरणारविंदों को समर्पित एक गीत है, जो ऋषियों की तपस्या, लोगों की रक्षा, ज्ञानोदय, पापों के निवारण, समय के साथ सामंजस्य और सांसारिक तथा आध्यात्मिक धन के वादों को सूक्ष्मता से प्रतिध्वनित करता है।

यह स्तोत्र इस बात पर जोर देता है कि 'शिव' नाम का स्मरण केवल एक ध्वनि नहीं है, बल्कि परम तत्व, रक्षा और मोक्ष को प्रेरित करने वाली शक्ति है। पहले श्लोक में, 'शिव' के दो अक्षरों को संसार सागर को पार करने के लिए हंस के पंखों के समान, आत्मज्ञान के अंकुर के समान, श्रुतियों में छिपे परम रहस्य के समान और भवबंधन के बीजों को नष्ट करने वाली चक्की के समान वर्णित किया गया है। दूसरा श्लोक इन अक्षरों को सृष्टि के विजय स्तंभ और कलश के रूप में, आंतरिक अंधकार को नष्ट कर मंगल लाने वाले चतुर साधनों के रूप में, महान यात्रा के मार्ग में प्रमुख कवच के रूप में और नए फल देने वाले वर्षा ऋतु के बादलों के रूप में स्तुति करता है। इस प्रकार, प्रत्येक श्लोक 'शिव' नाम के विभिन्न आयामों और उसकी अगाध शक्ति को प्रकट करता है।

यह स्तोत्र तीसरे श्लोक में बताता है कि 'शिव' नाम का उच्चारण कैसे समस्त लोकों के लिए मंगल लाता है और रथ तथा रथिक के आधिपत्य की तरह सभी ऐश्वर्य प्रदान करता है। यह इंगित करता है कि इस नाम के सामने अन्य सभी उपकरण नगण्य हैं। चौथा श्लोक कहता है कि 'शिव' के दो अक्षर लौकिक और पारमार्थिक सुख प्रदान करने में सक्षम हैं। इस नाम के व्यवस्थित उच्चारण से ही समस्त अर्थ और फल प्राप्त होते हैं। इस नाम का रहस्यमय अर्थ पृथ्वी पर आनंद लाता है, लेकिन स्तोत्रकार खेद व्यक्त करते हैं कि मूर्ख इसे नहीं समझते। पांचवां श्लोक इंगित करता है कि यजुर्वेद में "नमः शिवाय" मंत्र जन्म-मृत्यु के चक्र को नष्ट करता है, फिर भी अज्ञानी संसार सागर में डूबते हैं, यह आश्चर्य की बात है।

यह उद्घोषणा की गई है कि यदि इस स्तोत्र को हठयोग, दैनिक जीवन आचरण या नियमित उपासना के साथ जोड़ा जाए, तो शिव के चरणों की अनुभूति, शारीरिक-मानसिक सुरक्षा, बाधाओं का निवारण, पापों का क्षय और आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त होती है। स्तोत्र स्पष्ट रूप से यह आश्वासन देता है कि निरंतर पाठ से शरीर को रक्षा कवच, विद्या साधना में विजय, जन्म के अभीष्टों की सिद्धि, संपत्ति की अमरता और तपस्या के फल प्राप्त होते हैं। अंततः, शिवपद मणिमाला श्री शिव के चरण स्मरण से कैवल्य का मूल प्रदान करती है, इसी गहन भावना पर यह स्तोत्र आधारित है।

लाभ (Benefits):

  • पाप क्षय और हृदय शुद्धि: शिव नाम के स्मरण से सभी पाप नष्ट होते हैं और मन तथा हृदय शुद्ध होता है। यह आंतरिक शांति प्रदान करता है।
  • भौतिक-आध्यात्मिक सुरक्षा: इस स्तोत्र का पाठ शरीर और मन के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।
  • ध्यान शक्ति और ज्ञानोदय: निरंतर पाठ एकाग्रता बढ़ाता है, आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है और साधना में सफलता दिलाता है।
  • सांसारिक और आध्यात्मिक लाभ: धन, संतान, सुरक्षा जैसे भौतिक आशीर्वादों के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
  • मोक्ष प्राप्ति: दृढ़ और निष्ठावान पाठ अंततः मोक्ष और कैवल्य के मार्ग को खोलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव पद मणिमाला स्तोत्र क्या है?
यह 'शिव' नामक दो अक्षरों के महत्व को समझाने वाला एक शक्तिशाली स्तोत्र है। यह नाम स्मरण भगवान शिव की रक्षात्मक, शुद्धिकारक और मोक्षदायक शक्ति को उजागर करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम, स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। नियमित उपासना या ध्यान के साथ इसका पाठ करना उत्तम फल देता है।
शिव पद मणिमाला स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से पापों का क्षय, हृदय की शुद्धि, भौतिक-आध्यात्मिक सुरक्षा, ध्यान शक्ति में वृद्धि, ज्ञानोदय, सांसारिक लाभ और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
शिव भक्त, आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा रखने वाले, पापों से मुक्ति चाहने वाले, और जीवन में सुरक्षा तथा शांति की कामना करने वाले कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन एक, तीन, पांच या ग्यारह बार किया जा सकता है। निरंतर और निष्ठावान पाठ सबसे अच्छे परिणाम देता है।
शिव पद मणिमाला स्तोत्र का उद्गम क्या है?
इस स्तोत्र के विशिष्ट रचयिता के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह वैदिक और आगमिक परंपराओं के आधार पर शिव नाम के सार को समझाने वाला एक प्राचीन भक्ति गीत है।

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