- ॐ देवदेवाय नमः
- ॐ महादेवाय नमः
- ॐ महादेव प्रियंकराय नमः
- ॐ देवर्षिसन्नुताय नमः
- ॐ सर्वदेवताबृंदवंदिताय नमः
- ॐ विकाररहिताय नमः
- ॐ शंभवे नमः
- ॐ सिकतालिंगरूपधृते नमः
- ॐ विश्वेश्वराय नमः
- ॐ विरूपाक्षाय नमः
- ॐ विश्ववंद्याय नमः
- ॐ विमुक्तिदाय नमः
- ॐ रामप्रतिष्ठिताय नमः
- ॐ रामवंदिताय नमः
- ॐ रामपूजिताय नमः
- ॐ रामेशाय नमः
- ॐ वामदेवाय नमः
- ॐ कामितव्याय नमः
- ॐ उमापतये नमः
- ॐ धर्मगोप्त्रे नमः
- ॐ धर्मात्मने नमः
- ॐ धार्मिकावनतत्पराय नमः
- ॐ धराधरेंद्रतनया नमः
- ॐ हृदयां भोजषट्पदाय नमः
- ॐ कंठेकालाय नमः
- ॐ काशीशाय नमः
- ॐ कैलासाचलवासकृते नमः
- ॐ कालज्ञाय नमः
- ॐ कल्मषध्वंसिने नमः
- ॐ कामाद्यरिविनाशनाय नमः
- ॐ पंचाक्षरमहामंत्रगम्याय नमः
- ॐ नम्याय नमः
- ॐ पिनाकधृते नमः
- ॐ प्रमथाधिपतये नमः
- ॐ प्रार्ध्याय नमः
- ॐ सर्वेषु सर्वसु पूज्याय नमः
- ॐ भस्मोद्धूळित सर्वांगाय नमः
- ॐ त्र्यंबकाय नमः
- ॐ त्रिपुरांतकाय नमः
- ॐ कपर्दिने नमः
- ॐ कृत्तिवाससे नमः
- ॐ करुणावरुणालयाय नमः
- ॐ कंदर्पदर्पहरणाय नमः
- ॐ सर्वाभरण भूषिताय नमः
- ॐ मृत्युंजयाय नमः
- ॐ अनिशंस्तुत्याय नमः
- ॐ नित्याय नमः
- ॐ तांडवनृत्यकृते नमः
- ॐ चंद्राद्रशेखराय नमः
- ॐ चंडाय नमः
- ॐ चंद्रसूर्याग्निलोचनाय नमः
- ॐ अनुत्तमाय नमः
- ॐ अर्धनारीशाय नमः
- ॐ अभिषेकप्रीतिमते नमः
- ॐ वशिने नमः
- ॐ जन्ममृत्युजराहारिणे नमः
- ॐ जटिलाय नमः
- ॐ अकुटिलाय नमः
- ॐ मृडाय नमः
- ॐ शंकराय नमः
- ॐ संकटहराय नमः
- ॐ शोकघ्ने नमः
- ॐ लोकरक्षकाय नमः
- ॐ भवाय नमः
- ॐ आभवाय नमः
- ॐ अनुभवज्ञाय नमः
- ॐ भाग्यदाय नमः
- ॐ भवरोगनुदे नमः
- ॐ स्मरारातये नमः
- ॐ पुरारातये नमः
- ॐ मखध्वंसिने नमः
- ॐ अंतकांतकाय नमः
- ॐ वंदारुवत्सलाय नमः
- ॐ वंद्याय नमः
- ॐ अमंदानंदप्रदायकाय नमः
- ॐ वृषारूढाय नमः
- ॐ विषाहारिणे नमः
- ॐ दोषघ्ने नमः
- ॐ रोषवर्जिताय नमः
- ॐ आनंदमूर्तये नमः
- ॐ अव्यग्राय नमः
- ॐ नंदीशपरिसेविताय नमः
- ॐ ध्येयाय नमः
- ॐ अज्ञेयतत्त्वाय नमः
- ॐ ज्ञानदाय नमः
- ॐ अज्ञाननाशकृते नमः
- ॐ कुरंगपाणये नमः
- ॐ श्रीकंठाय नमः
- ॐ डमरूवादनप्रियाय नमः
- ॐ महातपसे नमः
- ॐ महायोगिने नमः
- ॐ महातेजसे नमः
- ॐ महायशसे नमः
- ॐ प्रेम भक्तिप्रदाय नमः
- ॐ प्रेमिणे नमः
- ॐ प्रेम वश्या य नमः
- ॐ प्रियंकराय नमः
- ॐ सर्वगर्वापहरणाय नमः
- ॐ शर्वाय नमः
- ॐ अखर्वपराक्रमाय नमः
- ॐ अपवर्गप्रदाय नमः
- ॐ भर्गाय नमः
- ॐ स्वर्गंगाधराय नमः
- ॐ इष्टदाय नमः
- ॐ भीतिहारिणे नमः
- ॐ विभूतीशाय नमः
- ॐ भूतेशाय नमः
- ॐ अष्टविभूतिदाय नमः
|| इति श्री रामेश्वर अष्टोत्तर शतनामावळि
अर्थ
श्री रामेश्वर अष्टोत्तर शतनामावलि भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जिसमें भक्त भगवान शिव के 108 दिव्य नामों का स्मरण करके उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। यह नामावलि विशेष रूप से उस रामेश्वर लिंग को समर्पित है, जिसकी स्थापना स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने की थी। लंकापति रावण का वध करने के पश्चात, श्रीराम ने ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने और अपनी विजय के प्रतीक के रूप में समुद्र तट पर एक शिवलिंग स्थापित करने का निश्चय किया। जब हनुमान जी को कैलाश से शिवलिंग लाने के लिए भेजा गया, तो शुभ मुहूर्त निकट आने के कारण माता सीता ने बालू से ही एक शिवलिंग का निर्माण कर उसकी पूजा की। यही लिंग रामेश्वर कहलाया, और बाद में हनुमान जी द्वारा लाए गए लिंग को विश्वेश्वर नाम दिया गया। यह नामावलि उसी रामेश्वर शिव का विभिन्न रूपों, गुणों और भंगिमाओं में स्तुतिगान करती है।
'ॐ देवदेवाय नमः' से प्रारंभ होकर, यह नामावलि शिव को देवताओं का देव, महादेव, महादेव के प्रिय, देवर्षियों द्वारा पूजित, सभी देवताओं द्वारा वंदित और विकारों से रहित 'शंभु' के रूप में वर्णित करती है। 'सिकतालिङ्गरूपधृते नमः' नाम श्रीराम द्वारा बालू से स्थापित रामेश्वर लिंग की उत्पत्ति का स्मरण कराता है। 'रामप्रतिष्ठिताय नमः', 'रामवंदिताय नमः', 'रामपूजिताय नमः' और 'रामेशाय नमः' जैसे नाम रामेश्वर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को रेखांकित करते हैं, यह बताते हुए कि स्वयं श्रीराम ने इस लिंग की स्थापना और पूजा की थी। यह नामावलि शिव के प्रति श्रीराम की अगाध श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक भी है।
'विरूपाक्षाय नमः' (अनोखी आँखों वाले), 'कण्ठेकालाय नमः' (कंठ में विष धारण करने वाले – नीलकंठ), 'कैलासाचलवासकृते नमः' (कैलाश पर्वत पर निवास करने वाले) जैसे नाम शिव के प्रसिद्ध गुणों और निवास स्थानों का वर्णन करते हैं। 'धर्मगोप्त्रे नमः' (धर्म की रक्षा करने वाले), 'कल्मषध्वंसिने नमः' (पापों का नाश करने वाले), 'कामाद्यरिविनाशनाय नमः' (काम आदि शत्रुओं का नाश करने वाले) जैसे नाम यह दर्शाते हैं कि शिव भक्तों के अज्ञान, पाप और दुष्ट शक्तियों का नाश कर उनकी रक्षा करने वाले भक्तवत्सल हैं। यह नामावलि शिव को 'पंचाक्षरमहामंत्रगम्याय नमः' अर्थात पंचाक्षर महामंत्र (ॐ नमः शिवाय) द्वारा प्राप्त होने वाला बताती है, जो शिव के ज्ञान और तत्व को गहराई से समझने में मदद करता है।
इस स्तोत्र का नियमित पाठ भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और सभी मनोकामनाओं की सिद्धि प्रदान करता है। शिव के नामों का स्मरण करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। रामेश्वर लिंग स्वयं श्रीराम की भक्ति का प्रतीक है, अतः इस नामावलि का पाठ करने से रामेश्वर की दिव्य शक्ति और श्रीराम का आशीर्वाद दोनों प्राप्त होते हैं। यह केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि शिव की दिव्य शक्ति और कल्याणकारी गुणों का गहरा प्रतिबिंब है। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका पाठ करते हैं, उनके सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
लाभ (Benefits):
- पाप मुक्ति: इस नामावलि के पाठ से सभी पापों का नाश होता है, मन शुद्ध होता है और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
- मनोकामना पूर्ति: श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले भक्तों की सभी सद्भावनापूर्ण इच्छाएँ पूरी होती हैं और शुभ फल प्राप्त होते हैं।
- रोग निवारण और स्वास्थ्य: भगवान शिव की कृपा से शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते हैं, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त होती है।
- मानसिक शांति: शिव के नामों का जप करने से मन की चिंताएँ, तनाव दूर होते हैं और आंतरिक शांति तथा संतोष की प्राप्ति होती है।
- मोक्ष प्राप्ति: नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करने से मोक्ष का मार्ग सुगम होता है और अंततः जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री रामेश्वर अष्टोत्तर शतनामावलि क्या है?
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री रामेश्वर अष्टोत्तर शतनामावलि के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस नामावलि का पाठ कौन कर सकता है?
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस नामावलि का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
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