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श्री मृत्युंजय मानसिक पूजा स्तोत्रं

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स्तोत्रशिव
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श्री मृत्युंजय मानसिक पूजा स्तोत्रं

कैलासे कमनीयरत्नखचिते कल्पद्रुमूले स्थितं
कर्पूरस्फटिकेंदुसुंदरतनुं कात्यायनीसेवितं |
गंगातुंगतरंगरंजितजटाभारं कृपासागरं
कंठालंकृतशेषभूषणममुं मृत्युंजयं भावये || 1 ||

आगत्य मृत्युंजय चंद्रमौळे
व्याघ्राजिनालंकृत शूलपाणे |
स्वभक्तसंरक्षणकामधेनो
प्रसीद विश्वेश्वर पार्वतीश || 2 ||

भास्वन्मौक्तिकतोरणे मरकतस्तंभायुतालंकृते
सौधे धूपसुवासिते मणिमये माणिक्यदीपांचिते |
ब्रह्मेंद्रामरयोगिपुंगवगणैर्युक्ते च कल्पद्रुमैः
श्रीमृत्युंजय सुस्थिरो भव विभो माणिक्यसिंहासने || 3 ||

मंदारमल्लीकरवीरमाधवी-
-पुन्नागनीलोत्पलचंपकान्वितैः |
कर्पूरपाटीरसुवासितैर्जलै-
-राधत्स्व मृत्युंजय पाद्यमुत्तमं || 4 ||

सुगंधपुष्पप्रकरैः सुवासितै-
-र्वियन्नदीशीतलवारिभिः शुभैः |
त्रिलोकनाथार्तिहरार्घ्यमादरा-
-द्गृहाण मृत्युंजय सर्ववंदित || 5 ||

हिमांबुवासितैस्तोयैः शीतलैरतिपावनैः |
मृत्युंजय महादेव शुद्धाचमनमाचर || 6 ||

गुडदधिसहितं मधुप्रकीर्णं
सुघृतसमन्वितधेनुदुग्धयुक्तं |
शुभकर मधुपर्कमाहर त्वं
त्रिनयन मृत्युहर त्रिलोकवंद्य || 7 ||

पंचास्त्र शांत पंचास्य पंचपातकसंहर |
पंचामृतस्नानमिदं कुरु मृत्युंजय प्रभो || 8 ||

जगत्त्रयीख्यात समस्ततीर्थ-
-समाहृतैः कल्मषहारिभिश्च |
स्नानं सुतोयैः समुदाचर त्वं
मृत्युंजयानंतगुणाभिराम || 9 ||

आनीतेनातिशुभ्रेण कौशेयेनामरद्रुमात् |
मार्जयामि जटाभारं शिव मृत्युंजय प्रभो || 10 ||

नानाहेमविचित्राणि चीरचीनांबराणि च |
विविधानि च दिव्यानि मृत्युंजय सुधारय || 11 ||

विशुद्धमुक्ताफलजालरम्यं
मनोहरं कांचनहेमसूत्रं |
यज्ञोपवीतं परमं पवित्र-
-माधत्स्व मृत्युंजय भक्तिगम्य || 12 ||

श्रीगंधं घनसारकुंकुमयुतं कस्तूरिकापूरितं
कालेयेन हिमांबुना विरचितं मंदारसंवासितं |
दिव्यं देवमनोहरं मणिमये पात्रे समारोपितं
सर्वांगेषु विलेपयामि सततं मृत्युंजय श्रीविभो || 13 ||

अक्षतैर्धवलैर्दिव्यैः सम्यक्तिलसमन्वितैः |
मृत्युंजय महादेव पूजयामि वृषध्वज || 14 ||

चंपकपंकजकुरवककुंदैः करवीरमल्लिकाकुसुमैः |
विस्तारय निजमकुटं मृत्युंजय पुंडरीकनयनाप्त || 15 ||

माणिक्यपादुकाद्वंद्वे मौनिहृत्पद्ममंदिरे |
पादौ सत्पद्मसदृशौ मृत्युंजय निवेशय || 16 ||

माणिक्यकेयूरकिरीटहारैः
कांचीमणिस्थापितकुंडलैश्च |
मंजीरमुख्याभरणैर्मनोज्ञै-
-रंगानि मृत्युंजय भूषयामि || 17 ||

गजवदनस्कंदधृते-
-नातिस्वच्छेन चामरयुगेन |
गलदलकाननपद्मं
मृत्युंजय भावयामि हृत्पद्मे || 18 ||

मुक्तातपत्रं शशिकोटिशुभ्रं
शुभप्रदं कांचनदंडयुक्तं |
माणिक्यसंस्थापितहेमकुंभं
सुरेश मृत्युंजय तेऽर्पयामि || 19 ||

मणिमुकुरे निष्पटले
त्रिजगद्गाढांधकारसप्ताश्वे |
कंदर्पकोटिसदृशं
मृत्युंजय पश्य वदनमात्मीयं || 20 ||

कर्पूरचूर्णं कपिलाज्यपूतं
दास्यामि कालेयसमान्वितैश्च |
समुद्भवं पावनगंधधूपितं
मृत्युंजयांगं परिकल्पयामि || 21 ||

वर्तित्रयोपेतमखंडदीप्त्या
तमोहरं बाह्यमथांतरं च |
साज्यं समस्तामरवर्गहृद्यं
सुरेश मृत्युंजय वंशदीपं || 22 ||

राजान्नं मधुरान्वितं च मृदुलं माणिक्यपात्रे स्थितं
हिंगूजीरकसन्मरीचिमिलितैः शाकैरनेकैः शुभैः |
शाकं सम्यगपूपसूपसहितं सद्योघृतेनाप्लुतं
श्रीमृत्युंजय पार्वतीप्रिय विभो सापोशनं भुज्यतां || 23 ||

कूश्मांडवार्ताकपटोलिकानां
फलानि रम्याणि च कारवल्ल्या |
सुपाकयुक्तानि ससौरभाणि
श्रीकंठ मृत्युंजय भक्षयेश || 24 ||

शीतलं मधुरं स्वच्छं पावनं वासितं लघु |
मध्ये स्वीकुरु पानीयं शिव मृत्युंजय प्रभो || 25 ||

शर्करामिलितं स्निग्धं दुग्धान्नं गोघृतान्वितं |
कदलीफलसंमिश्रं भुज्यतां मृत्युसंहर || 26 ||

केवलमतिमाधुर्यं
दुग्धैः स्निग्धैश्च शर्करामिलितैः |
एलामरीचमिलितं
मृत्युंजय देव भुंक्ष्व परमान्नं || 27 ||

रंभाचूतकपित्थकंठकफलैर्द्राक्षारसस्वादुम-
-त्खर्जूरैर्मधुरेक्षुखंडशकलैः सन्नारिकेलांबुभिः |
कर्पूरेण सुवासितैर्गुडजलैर्माधुर्ययुक्तैर्विभो
श्रीमृत्युंजय पूरय त्रिभुवनाधारं विशालोदरं || 28 ||

मनोज्ञरंभावनखंडखंडिता-
-न्रुचिप्रदान्सर्षपजीरकांश्च |
ससौरभान्सैंधवसेवितांश्च
गृहाण मृत्युंजय लोकवंद्य || 29 ||

हिंगूजीरकसहितं
विमलामलकं कपित्थमतिमधुरं |
बिसखंडाँल्लवणयुता-
-न्मृत्युंजय तेऽर्पयामि जगदीश || 30 ||

एलाशुंठीसहीतं
दध्यन्नं चारुहेमपात्रस्थं |
अमृतप्रतिनिधिमाढ्यं
मृत्युंजय भुज्यतां त्रिलोकेश || 31 ||

जंबीरनीरांचितशृंगबेरं
मनोहरानम्लशलाटुखंडान् |
मृदूपदंशान्सहसोपभुंक्ष्व
मृत्युंजय श्रीकरुणासमुद्र || 32 ||

नागररामठयुक्तं
सुललितजंबीरनीरसंपूर्णं |
मथितं सैंधवसहितं
पिब हर मृत्युंजय क्रतुध्वंसिन् || 33 ||

मंदारहेमांबुजगंधयुक्तै-
-र्मंदाकिनीनिर्मलपुण्यतोयैः |
गृहाण मृत्युंजय पूर्णकाम
श्रीमत्परापोशनमभ्रकेश || 34 ||

गगनधुनीविमलजलै-
-र्मृत्युंजय पद्मरागपात्रगतैः |
मृगमदचंदनपूर्णं
प्रक्षालय चारु हस्तपदयुग्मं || 35 ||

पुंनागमल्लिकाकुंदवासितैर्जाह्नवीजलैः |
मृत्युंजय महादेव पुनराचमनं कुरु || 36 ||

मौक्तिकचूर्णसमेतै-
-र्मृगमदघनसारवासितैः पूगैः |
पर्णैः स्वर्णसमानै-
-र्मृत्युंजय तेऽर्पयामि तांबूलं || 37 ||

नीराजनं निर्मलदीप्तिमद्भि-
-र्दीपांकुरैरुज्ज्वलमुच्छ्रितैश्च |
घंटानिनादेन समर्पयामि
मृत्युंजयाय त्रिपुरांतकाय || 38 ||

विरिंचिमुख्यामरबृंदवंदिते
सरोजमत्स्यांकितचक्रचिह्निते |
ददामि मृत्युंजय पादपंकजे
फणींद्रभूषे पुनरर्घ्यमीश्वर || 39 ||

पुंनागनीलोत्पलकुंदजाजी-
-मंदारमल्लीकरवीरपंकजैः |
पुष्पांजलिं बिल्वदलैस्तुलस्या
मृत्युंजयांघ्रौ विनिवेशयामि || 40 ||

पदे पदे सर्वतमोनिकृंतनं
पदे पदे सर्वशुभप्रदायकं |
प्रदक्षिणं भक्तियुतेन चेतसा
करोमि मृत्युंजय रक्ष रक्ष मां || 41 ||

नमो गौरीशाय स्फटिकधवळांगाय च नमो
नमो लोकेशाय स्तुतविबुधलोकाय च नमः |
नमः श्रीकंठाय क्षपितपुरदैत्याय च नमो
नमः फालाक्षाय स्मरमदविनाशाय च नमः || 42 ||

संसारे जनितापरोगसहिते तापत्रयाक्रंदिते
नित्यं पुत्रकलत्रवित्तविलसत्पाशैर्निबद्धं दृढं |
गर्वांधं बहुपापवर्गसहितं कारुण्यदृष्ट्या विभो
श्रीमृत्युंजय पार्वतीप्रिय सदा मां पाहि सर्वेश्वर || 43 ||

सौधे रत्नमये नवोत्पलदलाकीर्णे च तल्पांतरे
कौशेयेन मनोहरेण धवलेनाच्छादिते सर्वशः |
कर्पूरांचितदीपदीप्तिमिलिते रम्योपधानद्वये
पार्वत्याः करपद्मलालितपदं मृत्युंजयं भावये || 44 ||

चतुश्चत्वारिंशद्विलसदुपचारैरभिमतै-
-र्मनः पद्मे भक्त्या बहिरपि च पूजां शुभकरीं |
करोति प्रत्यूषे निशि दिवसमध्येऽपि च पुमा-
-न्प्रयाति श्रीमृत्युंजयपदमनेकाद्भुतपदं || 45 ||

प्रातर्लिंगमुमापतेरहरहः संदर्शनात्स्वर्गदं
मध्याह्ने हयमेधतुल्यफलदं सायंतने मोक्षदं |
भानोरस्तमये प्रदोषसमये पंचाक्षराराधनं
तत्कालत्रयतुल्यमिष्टफलदं सद्योऽनवद्यं दृढं || 46 ||

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमृत्युंजय मानसिकपूजा स्तोत्रं संपूर्णं ||

अर्थ

श्री मृत्युंजय मानसिक पूजा स्तोत्रं भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत विशिष्ट स्तोत्र है, जो भक्त को अपने मन में ही भगवान महामृत्युंजय की पूर्ण "मानसिक पूजा" करने का मार्गदर्शन करता है। आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक परंपरा में रचित यह स्तोत्र भगवान के साथ एक गहरा आंतरिक संबंध स्थापित करने में सहायक है। इस स्तोत्र में भक्त अपने मन में ही महामृत्युंजय के चरणों में संकल्पपूर्वक अलंकरण, स्नान, धूप, अर्चना और भोजन सहित 44 से अधिक उपचारों को अर्पित करता है, जिससे उसकी गहरी भक्ति और आंतरिक संबंध विकसित होता है।

स्तोत्र के प्रारंभ में, भक्त को कैलाश पर्वत पर स्थित, रत्नों से जड़े कल्पवृक्ष के नीचे विराजमान मृत्युंजय का ध्यान करने का निर्देश दिया जाता है। उनका शरीर कपूर और स्फटिक के समान सुंदर है, जटाएं गंगा की ऊँची लहरों से सुशोभित हैं, और वे देवी पार्वती के साथ विराजमान हैं। कंठ में शेषनाग को आभूषण के रूप में धारण किए हुए, कृपासागर शिव का ध्यान किया जाता है और भक्त अपनी अभय की कामना करते हुए पूर्ण भक्ति उनके चरणों में समर्पित करता है। यह मानसिक ध्यान भगवान के दिव्य स्वरूप का हृदय से अनुभव करने में सहायता करता है।

बाद के श्लोकों में, भक्त अपने हृदय में ही महेश्वर को सभी उपचार अर्पित करता है। रत्नमय सिंहासन, स्वच्छ जल से पाद्य, अर्घ्य और आचमन; कपूर मिश्रित पंचामृत स्नान; व्याघ्रचर्म के वस्त्र, रत्नमय आभूषण; सुगंधित चंदन, बिल्वपत्र और मंदार आदि पुष्पों की मालाएं; धूप-दीप और दिव्य नैवेद्य—ये सभी उपचार एक-एक करके मानसिक रूप से शिव को अर्पित किए जाते हैं। पेय पदार्थ, फल, मिष्ठान, भोजन, पान, सुगंध—ये सभी भक्ति भाव को बढ़ाने के लिए सुझाए गए उपचार हैं। इसके अतिरिक्त, पादतीर्थ, नमस्कार, तांबूल, नीराजन (आरती), छत्र, चामर, दर्पण और प्रदक्षिणा सहित 44 से अधिक उपचारों की दैनिक पूजा विधि का सुंदर वर्णन किया गया है।

अंत में, भक्त शिव की शरण में आता है और संसार के दुःखों से मुक्ति, त्रिविध तापों का नाश, रोगों से निवारण, मृत्युभय से मुक्ति और भगवान की करुणा की भिक्षा मांगते हुए स्तोत्र का समापन करता है। यह पूजा दिन के किसी भी समय की जाए, शुभ फलदायी होती है, लेकिन 46वें श्लोक में यह आश्वासन दिया गया है कि शास्त्रों में वर्णित प्रातः, मध्याह्न और सायंकालीन पूजा के विशेष परिणाम प्राप्त होते हैं। यह स्तोत्र बिना किसी बाहरी पूजा सामग्री के, केवल मन से भगवान की आराधना करने का श्रेष्ठ मार्ग दर्शाता है।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक स्थिरता और ध्यान शक्ति: इस स्तोत्र का निरंतर पाठ और मानसिक पूजा मन की चंचलता को कम करके एकाग्रता और मानसिक स्थिरता को बढ़ाती है। यह मृत्युभय को दूर कर धैर्य प्रदान करती है।
  • शिवानुग्रह और शांति: महामृत्युंजय को मानसिक रूप से अर्पित की गई भक्ति भगवान की असीम कृपा को आकर्षित करती है। इससे जीवन में शांति, संतोष और दैवीय सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • रोग निवारण और आयु वृद्धि: मृत्युंजय भगवान रोगों और अकाल मृत्यु को दूर करने वाले देवता हैं। इस पूजा से स्वास्थ्य में सुधार होता है और दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • संसार बंधन से मुक्ति: संसार के दुःख, ताप और कर्मबंधनों से मुक्ति पाने के लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली है। यह मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
  • दैवीय अनुभूति और आंतरिक शुद्धि: मानसिक पूजा का अभ्यास बाहरी अनुष्ठानों की तुलना में गहरी आंतरिक शुद्धि और दैवीय अनुभूति प्रदान करता है। यह भक्त और भगवान के बीच सीधा संबंध स्थापित करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री मृत्युंजय मानसिक पूजा स्तोत्रं क्या है?
श्री मृत्युंजय मानसिक पूजा स्तोत्रं भगवान शिव को समर्पित एक भक्तिमय स्तोत्र है। यह भक्त को अपने मन में ही भगवान शिव की पूर्ण पूजा करने का मार्गदर्शन करता है, जिससे बाहरी सामग्री के बिना आंतरिक भक्ति विकसित होती है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ दिन के किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन प्रातःकाल, मध्याह्न या सायंकाल में पाठ करने से विशेष फल मिलते हैं। मन को एकाग्र करके, भगवान के स्वरूप का ध्यान करते हुए, प्रत्येक उपचार को मानसिक रूप से अर्पित करना चाहिए।
श्री मृत्युंजय मानसिक पूजा स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से मानसिक स्थिरता, शांति, रोगों से मुक्ति, मृत्युभय का निवारण और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह सांसारिक दुःखों से मुक्ति और आंतरिक शुद्धि में सहायक है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
शिव भक्त, मानसिक शांति और सुरक्षा चाहने वाले, रोगों से पीड़ित व्यक्ति और आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा रखने वाले इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। बिना किसी बंधन के कोई भी इसका पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का प्रतिदिन कम से कम एक बार पाठ करना उत्तम माना जाता है। अधिक फल प्राप्त करने के लिए, अपनी सुविधा और भक्ति के अनुसार कई बार, विशेषकर मंगलवार या सोमवार को पाठ किया जा सकता है।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति या स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक परंपरा से संबंधित है और मानसिक पूजा पद्धति का एक हिस्सा है। यह शिव की आंतरिक रूप से पूजा करने का श्रेष्ठ मार्ग बताता है।

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