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श्री सोमसुंदर स्तोत्रं (कुलशेखरपांड्य कृतं)

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स्तोत्रशिव
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श्री सोमसुंदर स्तोत्रं (कुलशेखरपांड्य कृतं)

कुलशेखरपांड्य उवाच –
महानीपारण्यांतर कनकपद्माकरतटी
महेंद्रानीताष्टद्विपधृतविमानांतरगतं |
महालीलाभूतप्रकटितविशिष्टात्मविभवं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 1 ||

नमन्नाळीकाक्षांबुज भवसुनाशीर मकुटी
वमन्माणिक्यांशुस्फुरदरुणपादाब्जयुगळं |
अमंदानंदाब्धिं हरिनयनपद्मार्चितपदं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 2 ||

महामातंगासृग्वरवसनमदींद्रतनया
महाभाग्यं मत्तांधककरटिकंठीरववरं |
महाभोगींद्रोद्यत्फणगणिगणालंकृततनुं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 3 ||

समीराहारेंद्रांगदमखिललोकैकजननं
समीराहारात्मा प्रणतजनहृत्पद्मनिलयं |
सुमीनाक्षी वक्त्रांबुज तरुणसूरं सुमनसं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 4 ||

नताघौघारण्यानलमनिलभुङ्नाथवलयं
सुधांशोरर्धांशं शिरसि दधतं जह्नुतनयां |
वदान्यानामाद्यं वरविबुधवंद्यं वरगुणं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 5 ||

महादुग्धांबोधौमथनजवसंभूतमसितं
महाकाळं कंठे सकलभयभंगाय दधतं |
महाकारुण्याब्धिं मधुमथन दृग्दूरचरणं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 6 ||

दशास्याहंकार द्रुम कुलिशितांगुष्ठनखरं
निशानाथ श्रीजिन्निजवदनबिंबं निरवधिं |
विशालाक्षं विश्वप्रभव भरणोपायकरणं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 7 ||

अनाकारंहारिकृतभुजगराजं पुरहरं
सनाथं शर्वाण्या सरसिरुहपत्रायतदृशं |
दिनारंभादित्यायुतशतनिभानंदवपुषं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 8 ||

उमापीनोत्तुंग स्तनतटल सत्कुंकुमरज-
स्समाहारात्यंतारुणविपुलदोरंतरतलं |
रमा वाणींद्राणीरतिविरचिताराधनविधिं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 9 ||

धरापाथस्स्वाहासहचर जगत्प्राणशशभृ-
त्सुराध्वाहर्नादाध्वर करशरीरं शशिधरं |
सुराहारास्वादातिशय निजवाचं सुखकरं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 10 ||

धरापीठं धाराधरकलशमाकाशवपुषं
धराभृद्दोद्दंडं तपन शशि वैश्वानरदृशं |
विराजन्नक्षत्र प्रसवमुदरीभूत जलधिं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 11 ||

सुपर्णांकांभोजासन दृगति दूरांघ्रिमकुटं
सुवर्णाहार स्रक्सुरविटपिशाखायुतभुजं |
अपर्णापादाब्जाहति चलित चंद्रार्थित जटं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 12 ||

मखारातिं मंदस्मित मधुरबिंबाधर लस-
न्मुखांभोजं मुग्धामृतकिरणचूडामणिधरं |
नखाकृष्टेभत्वक्परिवृत शरीरं पशुपतिं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 13 ||

सहस्राब्जैकोने निजनयनमुद्धृत्य जयते
सहस्राख्यापूर्त्यै सरसिजदृशे येन कृपया |
सहस्रारं दत्तं तपन नियुताभं रथपदं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 14 ||

रथावन्याम्नायाश्वमजरथकारं रणपटुं
रथांगादित्येंदुं रथपद धरास्त्रं रथिवरं |
रथाधारेष्वासं रथधर गुणं रम्यफलदं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 15 ||

धराकर्षापास्त प्रचुर भुजकंडूयन जलं
धराहार्यद्वैधी करणहृतलोकत्रयभयं |
स्मराकाराहारावृतचटुल पालानलकणं
महादेवं वंदे मधुरशफराक्षीसहचरं || 16 ||

सोमसुंदरनाथस्य स्तोत्रं भक्त्या पठंति ये |
श्रियापरमया युक्ताश्शिवमंते भजंति ते || 17 ||

इति श्रीहालास्यमहात्म्ये कुलशेखरपांड्यकृता श्रीशिवस्तुतिः |

अर्थ

“श्री सोमसुंदर स्तोत्रम्,” राजा कुलशेखर पांड्य द्वारा रचित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है, जो मदुरै में विराजित भगवान सोमसुंदर (शिव) और देवी मीनाक्षी के दिव्य रूप, महिमा और लीलाओं का गुणगान करता है। यह स्तोत्र शिव की अनुपम सुंदरता, असीम करुणा, ब्रह्मांडीय शक्ति और दिव्य उपस्थिति को काव्यात्मक रूप से चित्रित करता है। कुलशेखर पांड्य ने प्रत्येक श्लोक में भगवान शिव के चंद्रशेखरा, सुंदरेश्वरा, गंगाधरा, उमा-सहचारी, भूतभर्ता और जगत्पालक स्वरूपों का अद्भुत वर्णन किया है, जो उनकी गहन भक्ति को दर्शाता है।

पहले श्लोक में, कवि मदुरै के स्वर्ण कमल वन में प्रकाशित, देवताओं द्वारा पूजित विमान में स्थित, और अपनी महान लीलाओं से ब्रह्मांड को व्याप्त करने वाले सोमसुंदर भगवान को नमन करते हैं। वे देवी मधुरशफराक्षी (मीनाक्षी) के साथ सदा एकाकार रहने वाले महादेव को मंगलमय अर्चना अर्पित करते हैं। दूसरा श्लोक भगवान के कमल जैसे सुंदर मुकुट, माणिक्य की कांति से चमकते चरण कमलों, आनंद के सागर जैसे स्वरूप और हरि (विष्णु) के कमल नेत्रों द्वारा भी पूजित उनके चरणों की स्तुति करता है। तीसरे श्लोक में, उमा देवी के साथ विराजमान, मतवाले अंधकासुर का वध करने वाले, और सर्पराजों के अलंकरणों से सुशोभित शिव के दिव्य शरीर का दुर्लभ चित्रण किया गया है।

चौथे श्लोक में, कवि भगवान शिव को सभी प्राणियों की श्वास के रूप में, भक्तों के हृदय कमल में निवास करने वाले, और मीनाक्षी के मुख कमल में उगते सूर्य के समान चमकने वाले के रूप में पूजते हैं। पाँचवें श्लोक में, शिव को अर्धचंद्रधारी, गंगाधर, महापापों का नाश करने वाला, दयामूर्ति और वरदान प्रदान करने वाला बताया गया है। छठा श्लोक समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हलाहल विष को पीकर ब्रह्मांड की रक्षा करने वाले नीलकंठ शिव को समर्पित है। उनके कंठ का नीला रंग ब्रह्मांड की रक्षा के प्रतीक के रूप में खड़ा है।

सातवें श्लोक में, राक्षसराज रावण के अहंकार का नाश करने वाले शिव की महिमा का बखान किया गया है; उन्हें सूर्य, चंद्र और इंद्र सहित सभी देवताओं द्वारा पूजित महादेव बताया गया है। आठवां श्लोक आकाररहित परब्रह्म शिव को, त्रिपुरों का नाश करने वाले पुरहर को, तेजोमय स्वरूप को और शर्वाणी (पार्वती) के सान्निध्य में राजसी संतोष के साथ खड़े सुंदर स्वरूप को दर्शाता है। नौवां श्लोक सभी देवताओं द्वारा पूजित शिव-पार्वती युगल, उनकी उपासना पद्धतियों, और उनके रूप की कोमलता तथा कांति की स्तुति करता है। दसवें और ग्यारहवें श्लोकों में, शिव को जगन्निवास, तपस्तेजस्वी, आकाशमूर्ति, चंद्रमौलि, अग्निनेत्रधारी, जलधिनिवासी, और नक्षत्रों को प्रभा प्रदान करने वाले के रूप में ब्रह्मांड में व्याप्त बताया गया है। बारहवां श्लोक शिव के दिव्य जटाजूट, सूर्य-चंद्र के समान तेजोमय आकार, और अभिमानी के गर्व का नाश करने की उनकी शक्ति का वर्णन करता है। यह स्तोत्र शिव की अतुलनीय महिमा और दिव्य सौंदर्य को अत्यंत हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करता है।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति और स्थिरता: इस स्तोत्र के पाठ से मन को असीम शांति और आंतरिक स्थिरता मिलती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  • समस्त पापों का निवारण: भगवान सोमसुंदर की भक्तिपूर्वक स्तुति करने से ज्ञात-अज्ञात सभी पापों का नाश होता है और मन शुद्ध होता है।
  • इच्छित फलों की प्राप्ति: कुलशेखर पांड्य द्वारा रचित इस स्तोत्र का नियमित पाठ भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करता है और जीवन में सफलता दिलाता है।
  • स्वास्थ्य और समृद्धि: भगवान सोमसुंदर और देवी मीनाक्षी की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य, धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • दैवीय सुरक्षा: यह स्तोत्र नकारात्मक शक्तियों, बाधाओं और जीवन के भय से मुक्ति दिलाता है, जिससे भक्त सदैव शिव की सुरक्षा में रहते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री सोमसुंदर स्तोत्रं क्या है?
यह राजा कुलशेखर पांड्य द्वारा रचित एक भक्तिमय स्तोत्र है, जो मदुरै में विराजमान भगवान शिव के सोमसुंदर रूप और देवी मीनाक्षी की महिमा का गुणगान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन से, विशेषकर सोमवार को या किसी शुभ दिन पर शिव मंदिर में या घर के पूजा कक्ष में किया जा सकता है।
श्री सोमसुंदर स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से मानसिक शांति, पापों का निवारण, मनोकामनाओं की पूर्ति, उत्तम स्वास्थ्य, धन और दैवीय सुरक्षा प्राप्त होती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान शिव और शक्ति देवी के भक्त, तथा जो भी अपने जीवन में शांति, समृद्धि और सुरक्षा चाहते हैं, वे सभी इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना शुभ माना जाता है। विशेष फलों के लिए 11, 21, 51 या 108 बार पाठ किया जा सकता है।
श्री सोमसुंदर स्तोत्रं का उद्गम क्या है?
यह स्तोत्र प्राचीन पांड्य राजवंश के महाराजा कुलशेखर पांड्य द्वारा मदुरै के सोमसुंदरेश्वर भगवान के प्रति अपनी अगाध भक्ति से रचा गया है।

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