श्री शिव स्तुतिः (इंद्रादि कृतं)
नमामि सर्वे शरणार्थिनो वयं
महेश्वर त्र्यंबक भूतभावन |
उमापते विश्वपते मरुत्पते
जगत्पते शंकर पाहि नस्स्वयं || 1 ||
जटाकलापाग्र शशांकदीधिति
प्रकाशिताशेषजगत्त्रयामल |
त्रिशूलपाणे पुरुषोत्तमाऽच्युत
प्रपाहिनो दैत्यभयादुपस्थितात् || 2 ||
त्वमादिदेवः पुरुषोत्तमो हरि-
र्भवो महेशस्त्रिपुरांतको विभुः |
भगाक्षहा दैत्यरिपुः पुरातनो
वृषध्वजः पाहि सुरोत्तमोत्तम || 3 ||
गिरीशजानाथ गिरिप्रियाप्रिय
प्रभो समस्तामरलोकपूजित |
गणेश भूतेश शिवाक्षयाव्यय
प्रपाहि नो दैत्यवरांतकाऽच्युत || 4 ||
पृथ्व्यादितत्त्वेषु भवान् प्रतिष्ठितो
ध्वनिस्वरूपो गगने विशेषतः |
लिनो द्विधा तेजसि स त्रिधाजले
चतुःक्षितौ पंचगुणप्रधानः || 5 ||
अग्निस्वरूपोसि तरौ तथोपले
सत्त्वस्वरूपोसि तथा तिलेष्वपि |
तैलस्वरूपो भगवान् महेश्वरः
प्रपाहि नो दैत्यगणार्दितान् हर || 6 ||
नासीद्यदाकांडमिदं त्रिलोचन
प्रभाकरेंद्रेंदु विनापि वा कुतः |
तदा भवानेव विरुद्धलोचन
प्रमादबाधादिविवर्जितः स्थितः || 7 ||
कपालमालिन् शशिखंडशेखर
श्मशानवासिन् सितभस्मगुंभित |
फणींद्रसंवीततनोंतकांतक
प्रपाहि नो दक्षधिया सुरेश्वर || 8 ||
भवान् पुमान् शक्तिरियं गिरेस्सुता
सर्वांगरूपा भगवन्-स्तदात्वयि |
त्रिशूलरूपेण जगद्भयंकरे
स्थितं त्रिनेत्रेषु मखाग्नयस्त्रयः || 9 ||
जटास्वरूपेण समस्तसागराः
कुलाचलास्सिंधुवहाश्च सर्वशः |
शरीरजं ज्ञानमिदं त्ववस्थितं
तदेव पश्यंति कुदृष्ट यो जनाः || 10 ||
नारायणस्त्वं जगतां समुद्भव-
स्तथा भवानेव चतुर्मुखो महान् |
सत्त्वादिभेदेन तथाग्निभेदितो
युगादिभेदेन च संस्थितस्त्रिधा || 11 ||
भवंतमेते सुरनायकाः प्रभो
भवार्थिनोऽन्यस्य वदंति तोषयन् |
यतस्ततोनो भव भूतिभूषण
प्रप्राहि विश्वेश्वर रुद्र ते नमः || 12 ||
इति श्री वराहपुराणे इंद्रादिकृत शिवस्तुतिः |
अर्थ
“श्री शिव स्तुतिः (इंद्रादि कृतं)” एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है जहाँ देवराज इंद्र और अन्य देवता भगवान शिव की स्तुति करते हैं। यह स्तोत्र भगवान शिव को सृष्टि, स्थिति और संहार के परम आधार, तीनों लोकों के दिव्य रक्षक और समस्त ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में वर्णित करता है। यह स्तोत्र शिव की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और सर्वकारणता को अत्यंत स्पष्टता और भक्ति-ज्ञान के संगम के साथ प्रस्तुत करता है। जब देवता दैत्यों के भय से काँप रहे थे, तब उन्होंने भगवान शिव की शरण ली और उनकी महिमा का गुणगान किया।
पहले श्लोक में, देवता शिव को 'त्र्यंबक', 'भूतभावन', 'उमापति', 'जगत्पति', 'शंकर' कहकर पुकारते हैं और शरणागत भक्तों के रूप में स्वयं को बचाने की प्रार्थना करते हैं। दूसरे श्लोक में, वे उनके जटाओं में सुशोभित चंद्रकला, तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले उनके तेज, उनके त्रिशूलधारी रूप, पुरुषोत्तम और अच्युत के रूप में उनकी स्तुति करते हैं, और दैत्यों के भय से काँपते हुए अपनी रक्षा की याचना करते हैं। तीसरे श्लोक में, शिव को आदिदेव, पुरुषोत्तम, हरि, भव, महेश, त्रिपुरांतक, भगाक्षहारी, वृषध्वज—इन सभी दिव्य रूपों में विश्व के कर्ता और संहारकर्ता के रूप में वर्णित किया गया है। चौथे श्लोक में, देवता गिरीश, उमापति, गणाधिपति, भूतेश, शाश्वत, अव्यय, समस्त देवताओं द्वारा पूजित और असुरनाशक के रूप में उनकी शरण लेते हैं।
पांचवें श्लोक में, शिव को पंचभूतों में स्थित बताया गया है – वे ध्वनि के रूप में आकाश में, तेज में दो प्रकार से, जल में तीन प्रकार से और पृथ्वी में पांच गुणों के प्रधान रूप में विद्यमान हैं। यह उनकी भौतिक और आध्यात्मिक सभी स्थितियों में उपस्थिति को दर्शाता है। छठे श्लोक में, शिव को अग्नि का स्वरूप, वृक्षों में, पत्थरों में, तिलों में और तेल में भी विद्यमान बताया गया है। यह दर्शाता है कि वे सर्वव्यापी हैं, सर्वज्ञ हैं और देवताओं के रक्षक हैं। सातवें श्लोक में, सृष्टि से पहले के अंधकारमय समय का स्मरण किया गया है, जब सूर्य और चंद्रमा भी नहीं थे, तब शिव का तेज ही आत्मस्वरूप होकर विद्यमान था। आठवें श्लोक में, शिव को कपालमालिनी, श्मशानवासी, भस्माश्रयी, नागाभूषणधारी, अंतकांतक (यम को भी पराजित करने वाले) और असुर विनाशक के रूप में देवताओं की रक्षा करने वाला बताया गया है। नौवें श्लोक में, उमादेवी को शक्ति स्वरूपिणी और शिव को पुरुष तत्व के रूप में वर्णित किया गया है, और त्रिशूल को इस शक्ति-शिव तत्व की एकता का प्रतीक बताया गया है।
दसवें श्लोक में, शिव की जटाओं को समस्त सागरों और नदियों के रूप में विस्तृत बताया गया है, और उनका ज्ञान संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। ग्यारहवें श्लोक में, नारायण और ब्रह्मा दोनों की उत्पत्ति शिव से ही बताई गई है, और यह समझाया गया है कि सत्व, रजस, तमस गुणों के अनुसार उनके विश्वव्यापी रूप होते हैं। अंतिम श्लोक में, देवता अपनी पूर्ण शरणागति व्यक्त करते हुए, शिव की करुणा और दया की प्रार्थना करते हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त भगवान शिव की कृपा प्राप्त करते हैं और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति पाते हैं। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान शिव के प्रति गहरी श्रद्धा और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- समस्त बाधाओं से मुक्ति: इस स्तोत्र के पाठ से दैत्य भय और अन्य सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं, जिससे जीवन में शांति और स्थिरता आती है।
- आध्यात्मिक उन्नति: शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का स्मरण करने से आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।
- शत्रु और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा: जिस प्रकार इंद्र और देवताओं को दैत्यों से मुक्ति मिली, उसी प्रकार भक्त भी अपने शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षित रहते हैं।
- मन की शांति और स्थिरता: भगवान शिव की स्तुति से मन शांत होता है, मानसिक तनाव कम होता है और आंतरिक सुख की अनुभूति होती है।
- स्वास्थ्य और समृद्धि: भगवान शिव की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य, धन-धान्य और समस्त प्रकार की समृद्धि प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इंद्र कृत शिव स्तुति क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इंद्र कृत शिव स्तुति के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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