- ॐ ज्योतिर्लिंगस्वरूपाय नमः
- ॐ सौराफ्टेसु संस्थिताय नमः
- ॐ शिवाय नमः
- ॐ सोमनाथनिलयाय नमः
- ॐ सोमराधिताय नमः
- ॐ शंभवे नमः
- ॐ श्रीहरायं नमः
- ॐ श्रीशैलाधिनाथाय नमः
- ॐ श्रीभ्रमरांबपतये नमः
- ॐ भवाय नमः
- ॐ त्रिलोकाधिनाथाय नमः
- ॐ नित्याय नमः
- ॐ सर्वलक्षण लक्षितायनमः
- ॐ सोमसूर्याग्निलोचनायनमः
- ॐ देवासुरगणाश्रयाय नमः
- ॐ सर्वबंधविमोचनाय नमः
- ॐ जितकामाय नमः
- ॐ तेजस्कराय नमः
- ॐ भक्तानुग्रहकारकाय नमः
- ॐ वरदाय नमः
- ॐ मल्लिकार्जुनाय नमः
- ॐ उज्जयिनी पुरपतये नमः
- ॐ महाकालय नमः
- ॐ महेश्वराय नमः
- ॐ विश्वरूपाय नमः
- ॐ विरूपाक्षाय नमः
- ॐ देवासुरवरप्रदाय नमः
- ॐ वृषभारूढाय नमः
- ॐ त्रिनेत्राय नमः
- ॐ त्रिपुरांतकाय नमः
- ॐ सर्वज्ञाय नमः
- ॐ महाकाळीनाथाय नमः
- ॐ अवंतीपुराधिपतये नमः
- ॐ विमुक्ताय नमः
- ॐ दूषणासुरमर्धनाय नमः
- ॐ मोक्षप्रदाय नमः
- ॐ वेदप्रियाय नमः
- । ॐ। ओंकारपुरवासायनमः
- ॐ विंध्याद्रिबलगर्वापहराय नमः
- ॐ मांधातृपुरनिवासायनमः
- ॐ अन्नपूर्णापतये नमः
- ॐ ईश्वराय नमः
- ॐ बदरिकाश्रमनिवासाय नमः
- ॐ देवासुरसं सेविताय नमः
- ॐ गौरीनाथाय नमः
- ॐ केदारेश्वराय नमः
- ॐ अक्षयभाग्यप्रदाय नमः
- ॐ सर्वशुभंकराय नमः
- ॐ अव्ययाय नमः
- ॐ अनंतरूपाय नमः
- ॐ व्योमकेशाय नमः
- ॐ वारणासीपुरपतये नमः
- ॐ विश्वनाथाय नमः
- ॐ सर्वाश्रयाय नमः
- ॐ सर्वदेवमुनिवंदिताय नमः
- ॐ यज्ञसमाहिताय नमः
- ॐ मणिकर्णिका तीर्थनिलयायनमः
- ॐ मरणान्मुक्तिदाय नमः
- ॐ गौतमाराधिताय नमः
- ॐ शिवाय नमः
- ॐ गौतमीजन्मकारणाय नमः
- ॐ ब्रह्महत्यापापहरायनमः
- ॐ त्र्यंबकाय नमः
- ॐ सुतीर्थायओं शर्वाय नमः
- ॐ देवासुरवरप्रदाय नमः
- ॐ यज्ञरूपाय नमः
- ॐ मृत्युंजयाय नमः
- ॐ चिताभूमिष्ठितावासायनमः
- ॐ वैद्यनाथप्रकीर्तिताय नमः
- ॐ सर्वबाधानिवाकराय नमः
- ॐ रावणगर्वमर्धनाय नमः
- ॐ सर्वभूतहराय नमः
- ॐ रुद्राय नमः
- ॐ सर्वकामदाय नमः
- ॐ शाश्वताय नमः
- ॐ द्वारका प्रांतनिवासाय नमः
- ॐ नागनाथाख्य वर्णिताय नमः
- ॐ दारकादि राक्षसांतकाय नमः
- ॐ भक्तजनरक्षकाय नमः
- ॐ ढाकिनीवासाय नमः
- ॐ शंकराय नमः
- ॐ भीमासुर विमर्धनाय नमः
- ॐ माणिक्यांबाप्रियनाथाय नमः
- ॐ दक्षारामनिवासिने नमः
- ॐ अमृताय नमः
- ॐ सर्वपूजिताय नमः
- ॐ चंद्रशेखराय नमः
- ॐ सुमुखाय नमः
- ॐ अव्यक्ताय नमः
- ॐ त्रिपुरांतकाय नमः
- ॐ गिरिजाप्रियाय नमः
- ॐ विमुकाय नमः
- ॐ शितिकंठाय नमः
- ॐ शूलपाणये नमः
- ॐ महाक्रोथाय नमः
- ॐ महेश्वराय नमः
- ॐ देवासुरमुनिवंदिताय नमः
- ॐ श्रीरामप्रतिष्ठिताय नमः
- ॐ धनुष्कोटि प्रांतवासाय नमः
- ॐ सीतारमसं सेवितायनमः
- ॐ हनुमत्सेविताय नमः
- ॐ सोमाय नमः
- ॐ सर्वपापनिवारकाय नमः
- ॐ देवगिरिदुर्गवासाय नमः
- । ओंघश्मलाराधिताय नमः
- ॐ सांबाय नमः
- ॐ अपमृत्यु निवारकाय नमः
- ॐ ज्योतिर्लिंगाध्यक्षाय नमः
|| इति श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग अष्टोत्तर शतनामावलि भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों की महिमा का गुणगान करने वाले 108 पवित्र नामों का एक संग्रह है। यह नामावलि शिव के विभिन्न रूपों, गुणों और लीलाओं का वर्णन करती है, जिससे भक्तों को परमेश्वर की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करने का अवसर मिलता है। ज्योतिर्लिंग वे स्थान हैं जहाँ भगवान शिव स्वयं प्रकाशमान ज्योति के रूप में प्रकट हुए थे, और यह नामावलि उन पवित्र स्थलों के सार को भक्तिभाव से आमंत्रित करती है। यह भक्तों को आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान प्रदान करने वाला एक शक्तिशाली स्तोत्र है।
इस अष्टोत्तर शतनामावलि का पाठ केवल शिव के नामों का उच्चारण करना ही नहीं, बल्कि शिव की अनंत शक्ति, करुणा और आशीर्वाद को आमंत्रित करने का एक माध्यम है। प्रत्येक नाम शिव के एक अद्वितीय गुण को दर्शाता है, जो भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान, मन की शांति और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। ज्योतिर्लिंगों के नामों का स्मरण करने से, ऐसा माना जाता है कि भक्तों को वास्तव में उन पवित्र स्थानों पर जाने के समान ही पुण्य प्राप्त होता है। यह मन को शुद्ध करता है, सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायता करता है।
'ओम ज्योतिर्लिंगस्वरूपाय नमः' नाम यह घोषित करता है कि शिव स्वयं प्रकाशमान लिंग स्वरूप हैं, जो उनके अनादि और अनंत स्वरूप को दर्शाता है। 'ओम सौराफ्टेसु संस्थिताय नमः' सौराष्ट्र (गुजरात) में निवास करने वाले शिव की स्तुति करता है, जो सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का प्रतीक है। 'ओम सोमनाथनिलयाय नमः' गुजरात के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में निवास करने वाले शिव की स्तुति करता है, जहाँ चंद्र देव ने शिव की आराधना कर शाप से मुक्ति पाई थी। 'ओम श्रीशैलाधिनाथाय नमः' और 'ओम मल्लिकार्जुन नमः' नाम आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में स्थित मल्लिकार्जुन स्वामी की याद दिलाते हैं, जहाँ शिव देवी भ्रमराम्बा के साथ विराजमान हैं। 'ओम उज्जैनी पुरपतये नमः' और 'ओम महाकालाय नमः' नाम उज्जैन के महाकालेश्वर की प्रशंसा करते हैं, जो काल के नियंत्रक हैं, और शिव की संहारक शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये नाम शिव की सर्वव्यापकता, संरक्षक गुणों और भक्तों के प्रति उनके अपार प्रेम को उजागर करते हैं।
'ओम देवासुरगणाश्रयाय नमः' इंगित करता है कि शिव देवताओं और असुरों दोनों के आश्रयदाता हैं, जो उनकी समदृष्टि और सर्वव्यापकता को दर्शाता है। 'ओम सर्वबन्धविमोचनाय नमः' नाम यह घोषणा करता है कि शिव सभी सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाने वाले हैं, मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाते हैं। 'ओम जितकामाय नमः' बताता है कि शिव ने काम पर विजय प्राप्त की है, जो इंद्रिय संयम और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है। 'ओम वृषभारूढ़ाय नमः' नंदी पर आरूढ़ शिव को संदर्भित करता है, जो धर्म और न्याय का प्रतीक है। यह नामावलि शिव के विभिन्न पहलुओं, उनकी सृष्टि, स्थिति और संहार की शक्ति, और उनके अनंत कल्याणकारी गुणों का वर्णन करती है। यह मन को एकाग्र करता है और भक्तों को परमात्मा से जोड़ता है, जिससे उन्हें परम शक्ति का अनुभव होता है।
लाभ (Benefits):
- शिव का दिव्य आशीर्वाद: इस नामावलि का निष्ठापूर्वक पाठ करने से भक्त भगवान शिव की असीम करुणा और आशीर्वाद के पात्र बनते हैं, जिससे उनके जीवन में सभी शुभ कार्य होते हैं।
- आध्यात्मिक शुद्धि और शांति: शिव के 108 पवित्र नामों का जाप मन को शुद्ध करता है, आंतरिक शांति प्रदान करता है और नकारात्मक विचारों तथा भावनाओं को दूर करता है।
- सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: ऐसा माना जाता है कि भक्तों की सभी नेक इच्छाएं और न्यायोचित मनोकामनाएं शिव की कृपा से पूरी होती हैं, जिससे उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में सफलता आती है।
- बाधाओं से मुक्ति: यह जीवन की कठिनाइयों, बाधाओं, रोगों और शत्रु बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे जीवन में स्थिरता, समृद्धि और सुरक्षा आती है।
- मोक्ष की प्राप्ति: निरंतर भक्ति और श्रद्धा के साथ इस नामावलि का पाठ करने से, भक्त अंततः मोक्ष, यानी जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त करते हैं और परमात्मा में लीन हो जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग अष्टोत्तर शतनामावलि क्या है?
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
कौन इस नामावलि का पाठ कर सकता है?
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस नामावलि का मूल क्या है?
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