दशश्लोकी स्तुति
सांबो नः कुलदैवतं पशुपते सांब त्वदीया वयं
सांबं स्तौमि सुरासुरोरगगणाः सांबेन संतारिताः |
सांबायास्तु नमो मया विरचितं सांबात्परं नो भजे
सांबस्यानुचरोऽस्म्यहं मम रतिः सांबे परब्रह्मणि || 1 ||
विष्ण्वाद्याश्च पुरत्रयं सुरगणा जेतुं न शक्ताः स्वयं
यं शंभुं भगवन्वयं तु पशवोऽस्माकं त्वमेवेश्वरः |
स्वस्वस्थाननियोजिताः सुमनसः स्वस्था बभूवुस्तत-
-स्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 2 ||
क्षोणी यस्य रथो रथांगयुगळं चंद्रार्कबिंबद्वयं
कोदंडः कनकाचलो हरिरभूद्बाणो विधिः सारथिः |
तूणीरो जलधिर्हयाः श्रुतिचयो मौर्वी भुजंगाधिप-
-स्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 3 ||
येनापादितमंगजांगभसितं दिव्यांगरागैः समं
येन स्वीकृतमब्जसंभवशिरः सौवर्णपात्रैः समं |
येनांगीकृतमच्युतस्य नयनं पूजारविंदैः समं
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 4 ||
गोविंदादधिकं न दैवतमिति प्रोच्चार्य हस्तावुभा-
-वुद्धृत्याथ शिवस्य संनिधिगतो व्यासो मुनीनां वरः |
यस्य स्तंभितपाणिरानतिकृता नंदीश्वरेणाभव-
-त्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 5 ||
आकाशश्चिकुरायते दशदिशाभोगो दुकूलायते
शीतांशुः प्रसवायते स्थिरतरानंदः स्वरूपायते |
वेदांतो निलयायते सुविनयो यस्य स्वभावायते
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 6 ||
विष्णुर्यस्य सहस्रनामनियमादंभोरुहाण्यर्चय-
-न्नेकोनोपचितेषु नेत्रकमलं नैजं पदाब्जद्वये |
संपूज्यासुरसंहतिं विदलयंस्त्रैलोक्यपालोऽभव-
-त्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 7 ||
शौरिं सत्यगिरं वराहवपुषं पादांबुजादर्शने
चक्रे यो दयया समस्तजगतां नाथं शिरोदर्शने |
मिथ्यावाचमपूज्यमेव सततं हंसस्वरूपं विधिं
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 8 ||
यस्यासंधरणीजलाग्निपवनव्योमार्कचंद्रादयो
विख्यातास्तनवोऽष्टधा परिणता नान्यत्ततो वर्तते |
ओंकारार्थविवेचनी श्रुतिरियं चाचष्ट तुर्यं शिवं
तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 9 ||
विष्णुब्रह्मसुराधिपप्रभृतयः सर्वेऽपि देवा यदा
संभूताज्जलधेर्विषात्परिभवं प्राप्तास्तदा सत्वरं |
तानार्तांशरणागतानिति सुरान्योऽरक्षदर्धक्षणा-
-त्तस्मिन्मे हृदयं सुखेन रमतां सांबे परब्रह्मणि || 10 ||
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविंदभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ दशश्लोकीस्तुतिः संपूर्णा ||
अर्थ
दशश्लोकी स्तुति, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित, भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह साम्ब सदाशिव को परमब्रह्म स्वरूप, ब्रह्मांड के कारण, पालक और संहारक, ज्ञान के प्रतीक और भक्तों के प्रति अत्यंत दयालु के रूप में वर्णित करता है। यह स्तुति शिव के अद्वितीय स्वरूप, उनकी मायावी लीलाओं और उनकी दिव्य सुरक्षा को समझने का एक असाधारण ग्रंथ है। यह भक्त को शिव के साथ एक गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में मदद करती है।
पहले श्लोक में, शंकराचार्य 'सांबो नः कुलदैवतं' कहकर दृढ़ता से घोषित करते हैं – साम्ब सदाशिव ही हमारे कुल देवता हैं, उनके अतिरिक्त हमारा कोई अन्य देवता नहीं है। मेरी भक्ति, मेरा जीवन, मेरा प्रेम सब साम्ब में ही निहित है। इस श्लोक में यह भाव व्यक्त होता है कि देवताओं, असुरों और भूत-प्रेतों की रक्षा केवल शिव के स्तोत्र से ही हुई है। दूसरे श्लोक में बताया गया है कि विष्णु जैसे महान देवता भी स्वयं त्रिपुरासुरों को जीतने में असमर्थ थे, लेकिन शिव ने पशुपति के रूप में उन्हें सहजता से संहार कर दिया। शिव की उपस्थिति देवताओं को उनके उचित स्थानों पर स्थिर रखती है। ऐसी प्रार्थना की जाती है कि मेरा मन उस महादेव में आनंदपूर्वक लीन हो जाए। तीसरे श्लोक में, संपूर्ण ब्रह्मांड को शिव के रथ के रूप में चित्रित किया गया है – पृथ्वी रथ है, सूर्य और चंद्रमा दो पहिए हैं, पर्वत धनुष हैं, विष्णु बाण हैं और ब्रह्मा सारथी हैं। इस काव्यात्मक चित्रण में शिव ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में प्रकट होते हैं, और भक्त कामना करता है कि उसका हृदय सदैव इस परमेश्वर में ध्यानमग्न रहे।
चौथा श्लोक शिव की असीम करुणा का वर्णन करता है – गजासुर वध के समय शिव ने जो गजचर्म धारण किया था, उसे दिव्य अंगराग के समान माना गया। ब्रह्मा के सिर को भी उन्होंने ब्रह्मकमलों के समान स्वीकार किया। विष्णु के नेत्र को भी पूजा के कमल के समान उन्होंने ग्रहण किया। ये सभी शिव के समभाव और उनकी अगाध उदारता को दर्शाते हैं। पाँचवाँ श्लोक वेदव्यास की महानता और शिव की उपस्थिति में उनके नमस्कार के महत्व को दर्शाता है। यह नंदीश्वर द्वारा बिना हाथ हिलाए, नमस्कार के साथ अभिवादन किए जाने के प्रसंग को प्रस्तुत करता है, जिससे शिव की महिमा की विशालता ज्ञात होती है। छठा श्लोक शिव के विश्वरूप का चित्रण करता है – आकाश उनकी जटाएँ हैं, दसों दिशाएँ उनके वस्त्र हैं, चंद्रमा उनका आभूषण है, और अनंत आनंद ही उनका स्वरूप है। यह बताता है कि वेदांत उनमें निवास करता है और विनम्रता उनका स्वाभाविक गुण है। सातवें श्लोक में विष्णु द्वारा सहस्रनाम अर्चना में अपने नेत्र-कमल को शिव के चरण-कमलों में अर्पित करने का वर्णन है। यह बताया गया है कि शिव देवताओं और लोकों के रक्षक तथा असुरों के संहारक हैं। आठवाँ श्लोक वराह, विष्णु, शौरि और ब्रह्मा जैसे देवताओं के शिव के दर्शन की अनुभूति के लिए उनके लालसा का वर्णन करता है, जो शिव की सर्वोच्चता को और भी पुष्ट करता है।
यह स्तुति भक्तों को शिव की अलौकिक शक्ति, सार्वभौमिक प्रभुत्व और करुणा का बोध कराती है। इसे पढ़ने से मन को शांति, आध्यात्मिक ज्ञान और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। यह केवल शिव का गुणगान नहीं है, बल्कि परमब्रह्म तत्व का गहरा दर्शन है।
लाभ (Benefits):
- आध्यात्मिक उत्थान: इस स्तुति के निरंतर पाठ से भक्त शिव के वास्तविक स्वरूप को समझकर आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है।
- भय निवारण: शिव की अलौकिक शक्ति का स्मरण करने से मन के भय और चिंताएँ दूर होती हैं, तथा साहस बढ़ता है।
- संकट निवारण: जीवन में आने वाली कठिनाइयों, बाधाओं और आसुरी शक्तियों से शिव की कृपा से रक्षा मिलती है।
- ज्ञान प्राप्ति: शिव को ज्ञानमूर्ति के रूप में स्तुति करने से बुद्धि का विकास होता है और सत्य का बोध होता है।
- मोक्ष प्राप्ति: साम्ब सदाशिव को परमब्रह्म स्वरूप में ध्यान करने से अंततः जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दशश्लोकी स्तुति क्या है?
दशश्लोकी स्तुति का पाठ कब करना चाहिए?
दशश्लोकी स्तुति का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
दशश्लोकी स्तुति का पाठ कौन कर सकता है?
दशश्लोकी स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
दशश्लोकी स्तुति का उद्गम क्या है?
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