हरतालिका तीज पूजा विधि और सामग्री

हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को महिलाएँ निर्जला रखती हैं; शाम को प्रदोष काल में बालू या मिट्टी से बने शिव-पार्वती और गणेश की पूजा होती है, कथा सुनी जाती है, रात भर जागरण होता है और अगली सुबह पूजा-विसर्जन के बाद पारण किया जाता है।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखन: · वेद पण्डित, लेखकअद्यतन · 5 मिनट का पाठ
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हरतालिका तीज भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखा जाने वाला कठिन व्रत है। सुहागिन महिलाएँ पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य के लिए, और कुंवारी लड़कियाँ मनचाहे वर के लिए यह व्रत रखती हैं। ज़्यादातर घरों में यह निर्जला होता है: शाम को बालू या मिट्टी के शिव-पार्वती बनाकर पूजा, रात भर जागरण और अगली सुबह पारण। इस साल की तिथि और पूजा मुहूर्त हरतालिका तीज पृष्ठ पर देखें।

हरतालिका तीज पूजा सामग्री

व्रत के दिन भूख-प्यास में दौड़ना मुश्किल होता है, इसलिए सामान एक दिन पहले जुटा लें।

पूजा के लिए

  • शुद्ध बालू (नदी की रेत) या काली/पीली मिट्टी, मूर्ति बनाने के लिए
  • चौकी, लाल या पीला कपड़ा, केले के पत्ते या केले के खंभे (फुलेरा/मंडप के लिए)
  • कलश, आम के पत्ते, नारियल, गंगाजल
  • बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, आक के फूल, भांग की पत्ती (शिव जी के लिए)
  • दूर्वा (गणेश जी के लिए), कई तरह के फूल और माला
  • रोली, चंदन, अक्षत, हल्दी, जनेऊ, कपूर, धूप, घी का दीपक
  • फल, मिठाई, पंचामृत, पान-सुपारी, लौंग-इलायची

सुहाग सामग्री (माता पार्वती के लिए)

  • चुनरी या साड़ी, चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, बिछिया, महावर, कंघी, शीशा

सोलह श्रृंगार की पूरी सूची और हर चीज़ का अर्थ सोलह श्रृंगार लेख में देखें। अगर कोई चीज़ न मिले, जैसे धतूरा या आक, तो जो उपलब्ध है उसी से पूजा करें। बेलपत्र और जल शिव पूजा के लिए काफ़ी हैं।

बालू या मिट्टी के शिव-पार्वती कैसे बनाएँ

इस व्रत की ख़ास बात यह है कि भगवान की मूर्ति ख़ुद अपने हाथों से बनाई जाती है। मान्यता है कि माता पार्वती ने वन में नदी किनारे बालू का शिवलिंग बनाकर ही तप किया था। इसलिए कई जगह इसे "बालू के शिवलिंग" की पूजा भी कहते हैं।

  • बालू या मिट्टी को छानकर कंकड़ निकाल दें और गंगाजल मिलाकर गूंथ लें।
  • बीच में शिवलिंग, उसके बाईं ओर पार्वती जी और सामने छोटे गणेश जी बनाएँ। कुछ घरों में नंदी भी बनाते हैं।
  • मूर्ति बहुत सुंदर न बने तो चिंता न करें। एक गोल पिंडी भी शिवलिंग मानी जाती है।
  • मूर्तियों को केले के पत्ते पर रखें और ऊपर फूलों का छोटा मंडप बनाएँ, जिसे यूपी-बिहार में फुलेरा कहते हैं।

हरतालिका तीज पूजा विधि

पूजा आम तौर पर शाम को प्रदोष काल में, यानी सूर्यास्त के बाद लगभग डेढ़ घंटे के भीतर की जाती है। कई महिलाएँ रात के चारों प्रहर में भी पूजा करती हैं।

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। बहुत से घरों में तीज से एक दिन पहले हाथों में मेहंदी लगाई जाती है।
  2. दिन में आराम करें, पर सोने से बचें। शाम से पहले फिर स्नान करके नए कपड़े और पूरा श्रृंगार करें।
  3. फुलेरा के नीचे चौकी पर बालू के शिव-पार्वती और गणेश स्थापित करें, कलश रखें।
  4. पहले गणेश जी की पूजा करें: जल, रोली, अक्षत, दूर्वा, मोदक या लड्डू।
  5. शिव जी पर जल और पंचामृत के छींटे दें, फिर बेलपत्र, शमी, धतूरा, आक, भांग, जनेऊ और सफ़ेद फूल चढ़ाएँ।
  6. माता पार्वती को चुनरी ओढ़ाएँ और सुहाग की सारी चीज़ें अर्पित करें।
  7. फल-मिठाई का भोग लगाएँ, धूप-दीप दिखाएँ।
  8. सब महिलाएँ मिलकर बैठें और हरतालिका तीज व्रत कथा सुनें। कथा में पार्वती जी की सखियाँ (आलि) उन्हें चुपके से हरकर वन ले गई थीं, ताकि उनका विवाह विष्णु जी से न हो जाए; हरत और आलिका से ही नाम बना हरतालिका।
  9. कपूर से ॐ जय शिव ओंकारा आरती करें और सुहाग की लंबी उम्र की प्रार्थना करें।
  10. सास या घर की बड़ी महिला को सुहाग की पिटारी, कपड़े या मिठाई देकर पैर छुएँ।

व्रत में क्या न करें

  • दिन में सोना, किसी पर ग़ुस्सा करना या कटु बोलना टालें।
  • पूजा के लिए काले या नीले कपड़े की जगह लाल, हरे, पीले रंग पहनें।
  • एक बार यह व्रत शुरू करने पर हर साल रखने की परंपरा है; बीच में छोड़ना पड़े तो घर की कोई सदस्य आपकी ओर से पूजा कर सकती है या उद्यापन करके व्रत पूरा किया जाता है।
  • दवा लेने वाली महिलाएँ डॉक्टर की सलाह से ही निर्जल रहें।

रात्रि जागरण

हरतालिका में रात को सोना वर्जित माना जाता है। महिलाएँ एक साथ बैठकर भजन, शिव-पार्वती के गीत और लोकगीत गाती हैं। कई मोहल्लों में मंदिर या किसी एक घर में सामूहिक जागरण होता है। हर प्रहर में एक बार आरती करने का रिवाज़ भी है। जो महिलाएँ बीमार हैं या जिनका स्वास्थ्य निर्जल रहने लायक़ नहीं, वे फलाहार या जल लेकर व्रत कर सकती हैं। शास्त्र भी सामर्थ्य के अनुसार व्रत की बात कहते हैं।

पारण

अगली सुबह यानी चतुर्थी को सूर्योदय के बाद स्नान करें और बालू के शिव-पार्वती की फिर से पूजा-आरती करें। इसके बाद मूर्तियों और पूजा के फूल-पत्तों को किसी नदी, तालाब या घर के गमले/पेड़ की जड़ में सम्मान से विसर्जित कर दें। सुहाग की सामग्री किसी सुहागिन या ब्राह्मणी को दान करें। फिर प्रसाद और पानी लेकर व्रत खोलें। कई घरों में पारण खीरे, दही या ठेकुआ-गुजिया से किया जाता है। चतुर्थी का समय आज के पंचांग में देख लें।

बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश और राजस्थान के रिवाज़

क्षेत्रक्या ख़ास होता है
बिहार, झारखंडइसे बस "तीज" कहते हैं। एक दिन पहले नहाय-खाय जैसा सात्विक भोजन, पूजा में ठेकुआ और पिड़ुकिया (गुजिया), सास को "तीज का भार" भेजने का रिवाज़।
पूर्वांचल (वाराणसी, गोरखपुर)फुलेरा सजाना, बालू के शिव-पार्वती, रात भर कजरी और शिव भजन।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़"तीजा" कहलाता है। बेटियाँ मायके आती हैं, एक रात पहले करू भात (करेले की सब्ज़ी-चावल) खाने की परंपरा।
राजस्थानयहाँ हरियाली और कजली तीज ज़्यादा बड़े पर्व हैं; हरतालिका कुछ समुदायों में रखी जाती है।

आपके घर की जो रीत है, वही सबसे सही है। सास-ननद या माँ से एक बार पूछ लें कि आपके परिवार में पूजा का क्रम क्या रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरतालिका तीज की पूजा किस समय करें?

मुख्य पूजा शाम को प्रदोष काल में, सूर्यास्त के बाद की जाती है। कई महिलाएँ रात के चारों प्रहर में भी पूजा करती हैं। सटीक मुहूर्त पंचांग में देखें।

हरतालिका तीज में बालू के शिवलिंग क्यों बनाते हैं?

मान्यता है कि माता पार्वती ने वन में नदी किनारे बालू का शिवलिंग बनाकर तप किया था। उसी की याद में महिलाएँ अपने हाथों से बालू या मिट्टी के शिव-पार्वती बनाकर पूजती हैं।

क्या हरतालिका तीज में पानी पी सकते हैं?

परंपरा में यह निर्जला व्रत है, पर बीमार, गर्भवती या कमज़ोर स्वास्थ्य वाली महिलाएँ फलाहार या जल लेकर व्रत रख सकती हैं। सामर्थ्य के अनुसार व्रत करना ही उचित माना गया है।

हरतालिका तीज का पारण कब और कैसे करें?

अगली सुबह सूर्योदय के बाद स्नान, पूजा और मूर्तियों के विसर्जन के बाद प्रसाद और जल लेकर पारण किया जाता है।

क्या कुंवारी लड़कियाँ हरतालिका तीज रख सकती हैं?

हाँ, कुंवारी लड़कियाँ भी मनचाहे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं, क्योंकि कथा में पार्वती जी ने विवाह से पहले ही यह तप किया था।

N. R. Sharma (Nutalapati Rajeshwara Sharma)
लेखक के बारे में

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा

वेद पण्डित, लेखक

नूतलपाटि राजेश्वर शर्मा जी वेद पण्डित और लेखक हैं। अनेक वर्षों से वे दुर्गा देवी की आराधना का अध्ययन और आचरण करते आ रहे हैं। पूजा विधि, मंत्रों और स्तोत्रों को सामान्य भक्तों के लिए सरलता से समझाना उनका लक्ष्य है। वे “श्री दुर्गा नित्याराधना” ग्रंथ के लेखक हैं। इस साइट के लेख उनकी रचनाएँ हैं, या उनके ग्रंथों पर आधारित हैं।

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