Bhaktise – भक्ति से

श्री लक्ष्मी चालीसा

चालीसामाँ लक्ष्मीरचना: रामदास

संक्षेप में:लक्ष्मी चालीसा रामदास की रचना है, जिसमें दोहे और सोरठे के बाद चालीस चौपाइयों में सिंधु-सुता लक्ष्मी की स्तुति और पाठ का फल बताया गया है। इसे शुक्रवार, दीपावली और शरद पूर्णिमा पर पढ़ा जाता है।

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पाठ

दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास ।

मनो कामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस ॥

सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार ।

ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार ॥

सोरठा

यही मोर अरदास हाथ जोड़ विनती करुं ।

सब विधि करौ सुवास जय जननि जगदंबिका ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही । ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि ॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी । सब विधि पुरबहु आस हमारी ॥

जै जै जगत जननि जगदम्बा । सबके तुमही हो स्वलम्बा ॥

तुम ही हो घट घट के वासी । विनती यही हमारी खासी ॥

जग जननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी ॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी । कृपा करौ जग जननि भवानी ॥

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी । सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी । जगत जननि विनती सुन मोरी ॥

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता । संकट हरो हमारी माता ॥

क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिंधु में पायो ॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी । सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी ॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा । रूप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥

तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥

अपनायो तोहि अन्तर्यामी । विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥

तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी । कहँ तक महिमा कहौं बखानी ॥

मन क्रम वचन करै सेवकाई । मन-इच्छित वांछित फल पाई ॥

तजि छल कपट और चतुराई । पूजहिं विविध भाँति मन लाई ॥

और हाल मैं कहौं बुझाई । जो यह पाठ करे मन लाई ॥

ताको कोई कष्ट न होई । मन इच्छित फल पावै फल सोई ॥

त्राहि-त्राहि जय दुःख निवारिणी । त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि ॥

जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे । इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै ॥

ताको कोई न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥

पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना । अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना ॥

विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शंका दिल में कभी न लावै ॥

पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै ॥

बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं । उन सम कोई जग में नाहिं ॥

बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई । लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥

करि विश्वास करैं व्रत नेमा । होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा ॥

जय जय जय लक्ष्मी महारानी । सब में व्यापित जो गुण खानी ॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं । तुम सम कोउ दयाल कहूँ नाहीं ॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै । संकट काटि भक्ति मोहि दीजे ॥

भूल चूक करी क्षमा हमारी । दर्शन दीजै दशा निहारी ॥

बिन दरशन व्याकुल अधिकारी । तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी ॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में । सब जानत हो अपने मन में ॥

रूप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥

कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई । ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई ॥

रामदास अब कहै पुकारी । करो दूर तुम विपति हमारी ॥

दोहा

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास ।

जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश ॥

रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर ।

मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर ॥

लक्ष्मी चालीसा की आख़िरी चौपाई और समापन दोहे में कवि रामदास का नाम आता है। इसमें धन से ज़्यादा माँ की कृपा, ज्ञान-बुद्धि और घर के सुख की माँग है। दीपावली की शाम लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद कई घरों में यही चालीसा पढ़ी जाती है।

लक्ष्मी चालीसा का अर्थ

आरंभ का दोहा और सोरठा

हे माता लक्ष्मी, कृपा करके हृदय में वास करो और मेरी मनोकामना पूरी करो। हे सिंधु-सुता, विष्णुप्रिया, ऋद्धि-सिद्धि और मंगल देने वाली, तुम्हें बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम है। सोरठे में भक्त हाथ जोड़कर अरदास करता है कि हे जगदंबिका, हर तरह से घर को सुवासित (सुखी) करो।

चौपाई 1–9: जगत जननी से विनती

भक्त सिंधु-कुमारी से ज्ञान, बुद्धि और विद्या माँगता है। तुम जैसा उपकारी कोई नहीं, तुम घट-घट में रहती हो, दीनों का हित करती हो। मैं किस तरह तुम्हारी स्तुति करूँ, मेरे अपराध भुलाकर कृपा-दृष्टि डालो और संकट हरो।

चौपाई 10–16: समुद्र-मंथन और अवतार

जब क्षीरसागर मथा गया तो चौदह रत्न निकले, और उनमें सुख की राशि तुम थीं, जिसने दासी बनकर प्रभु की सेवा की। जब-जब विष्णु ने जन्म लिया, तुमने रूप बदलकर साथ दिया: राम अवध में आए तो तुम जनकपुर में सीता बनकर प्रकट हुईं। तुम्हारी शक्ति जैसी कोई शक्ति नहीं।

चौपाई 17–31: पाठ का फल

जो छल-कपट छोड़कर मन, कर्म और वचन से सेवा करता है, उसे मनचाहा फल मिलता है। जो यह चालीसा पढ़ता-सुनता है उसे रोग नहीं सताते, संतान और धन-संपत्ति मिलती है। पुत्रहीन, निर्धन या दुखी व्यक्ति भी ब्राह्मण बुलाकर चालीस दिन पाठ कराए तो कृपा होती है। बारह महीने पूजा करने वाला और रोज़ मन में पाठ करने वाला धन्य है, और विश्वास के साथ व्रत-नियम करने से हृदय में प्रेम उपजता है।

चौपाई 32–40: रामदास की पुकार

हे गुणों की खान महारानी, तुम सब में व्याप्त हो, तुम्हारे जैसा दयालु कोई नहीं। मुझ अनाथ की सुधि लो, भूल-चूक क्षमा करो, चतुर्भुज रूप में दर्शन देकर मेरे कष्ट दूर करो। रामदास पुकारकर कहते हैं: मेरी विपत्ति दूर करो।

समापन के दोहे

हे दुख हरने वाली, जल्दी सब डर दूर करो और शत्रुओं का नाश करो। रामदास रोज़ हाथ जोड़कर ध्यान करता है; माँ लक्ष्मी, इस दास पर दया की नज़र रखो।

कब और कैसे पढ़ें

शुक्रवार की शाम घर साफ़ करके, घी का दीपक जलाकर, कमल या लाल फूल और खीर का भोग रखकर लक्ष्मी चालीसा पढ़ें। दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के बाद इसका पाठ होता है, और शरद पूर्णिमा की रात जागरण में भी इसे पढ़ा जाता है। पाठ के बाद ॐ जय लक्ष्मी माता आरती गाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लक्ष्मी चालीसा किसने लिखी?

लक्ष्मी चालीसा की आख़िरी चौपाई और समापन दोहे में रामदास का नाम आता है, इसलिए इसे उन्हीं की रचना माना जाता है।

लक्ष्मी चालीसा किस दिन पढ़नी चाहिए?

शुक्रवार को इसका पाठ सबसे प्रचलित है। दीपावली, धनतेरस और शरद पूर्णिमा पर भी इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है।

लक्ष्मी चालीसा में सोरठा क्या है?

आरंभ के दोहे के बाद "यही मोर अरदास" वाला सोरठा आता है। कुछ पुस्तकों में यह छपा होता है और कुछ में नहीं, पर ज़्यादातर पाठ में इसे गाया जाता है।

क्या चालीस दिन तक लक्ष्मी चालीसा पढ़नी चाहिए?

चालीसा में ही चालीस दिन पाठ कराने का फल बताया गया है, इसलिए कई लोग चालीस दिन का संकल्प लेते हैं। रोज़ या हर शुक्रवार एक पाठ भी किया जा सकता है।