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श्री भास्कर स्तुतिः (युधिष्ठिर कृतं)

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श्री भास्कर स्तुतिः (युधिष्ठिर कृतं)

त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनां |
त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावतां || 1 ||

त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणं |
अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षतां || 2 ||

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते |
त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया || 3 ||

त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः |
स्वशाखाविहितैर्मंत्रैरर्चंत्यृषिगणार्चितं || 4 ||

तव दिव्यं रथं यांतमनुयांति वरार्थिनः |
सिद्धचारणगंधर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः || 5 ||

त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः |
सोपेंद्राः समहेंद्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः || 6 ||

उपयांत्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः |
दिव्यमंदारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः || 7 ||

गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः |
ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छंत्याशु प्रधानतां || 8 ||

वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः |
वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः || 9 ||

सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च |
न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते || 10 ||

संति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवंति महांति च |
न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव || 11 ||

ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः |
त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वेभावाश्च सात्त्विकाः || 12 ||

त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा |
देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना || 13 ||

त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनां |
सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुंचसि || 14 ||

तपंत्यन्ये दहंत्यन्ये गर्जंत्यन्ये तथा घनाः |
विद्योतंते प्रवर्षंति तव प्रावृषि रश्मयः || 15 ||

न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कंबलाः |
शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः || 16 ||

त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीं |
त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे || 17 ||

तव यद्युदयो न स्यादंधं जगदिदं भवेत् |
न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन्मनीषिणः || 18 ||

आधानपशुबंधेष्टिमंत्रयज्ञतपःक्रियाः |
त्वत्प्रसादादवाप्यंते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः || 19 ||

यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितं |
तस्य त्वमादिरंतश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः || 20 ||

मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च |
मन्वंतराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः || 21 ||

संहारकाले संप्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः |
संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते || 22 ||

त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः |
सैरावताः साशनयः कुर्वंत्याभूतसंप्लवं || 23 ||

कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः |
संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः || 24 ||

त्वामिंद्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः |
त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतं || 25 ||

त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः |
विवस्वान् मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च || 26 ||

सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवां पतिः |
मार्तंडोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत्तथा || 27 ||

दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः |
आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वच्च कीर्त्यसे || 28 ||

सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः |
अनिर्विण्णोऽनहंकारी तं लक्ष्मीर्भजते नरं || 29 ||

न तेषामापदः संति नाधयो व्याधयस्तथा |
ये तवानन्यमनसः कुर्वंत्यर्चनवंदनं || 30 ||

सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः |
त्वद्भावभक्याः सुखिनो भवंति चिरजीविनः || 31 ||

त्वं ममापन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः |
अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयाऽर्हसि || 32 ||

ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपांतं समाश्रिताः |
माठरारुणदंडाद्यास्तांस्तान् वंदेऽशनिक्षुभान् || 33 ||

क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः |
ताश्च सर्वा नमस्यामि पातुं मां शरणागतं || 34 ||

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि तृतीयोऽध्याये युधिष्ठिरकृत भास्कर स्तुतिः ||

अर्थ

महाभारत के अरण्य पर्व में महाराज युधिष्ठिर द्वारा भगवान सूर्यदेव को समर्पित यह अद्भुत स्तुति, सूर्य को ब्रह्मांड की आँख, सभी प्राणियों की आत्मा और सृष्टि के परम साक्षी के रूप में महिमामंडित करती है। सूर्य सभी जीवित प्राणियों का मूल स्रोत हैं, सभी कर्मों के शुद्धिकर्ता हैं, और योगियों तथा मुक्ति के इच्छुक लोगों के लिए अंतिम आश्रय हैं। उनके तेज से ही लोक स्थिर रहते हैं, प्रकाशित होते हैं, पवित्र होते हैं और असीमित रूप से सुरक्षित रहते हैं। सूर्य की चमक के बराबर ब्रह्मांड में कोई अन्य दीप्ति नहीं है। वे ज्योतिर्मय हैं, सत्य, सत्त्व और श्रेयस के अधिष्ठाता हैं। उनकी रश्मियाँ विश्वकर्मा द्वारा निर्मित ब्रह्मांडीय चक्र को शक्ति प्रदान करती हैं और राम के बाणों को असुरों का नाश करने की शक्ति देती हैं।

वेदपारंगत ब्राह्मण और ऋषि-मुनि नियत समय पर वैदिक मंत्रों से सूर्यदेव की आराधना करते हैं, उन्हें आध्यात्मिक योग्यता और दिव्य अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाले देवता के रूप में पहचानते हैं। सिद्ध, चारण, गंधर्व, यक्ष, नाग और तैंतीस करोड़ देवताओं सहित सभी स्वर्गीय प्राणी आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके रथ का अनुसरण करते हैं। ब्रह्मा, इंद्र, विष्णु और रुद्र जैसे देवता भी उनका सम्मान करते हैं। सप्त पितृगण, दिव्य प्राणी, वसु, मरुत, रुद्र, साध्य और मरीचिपुत्र भी सूर्य की पूजा करके उच्च पद प्राप्त करते हैं। ब्रह्मलोक तक कोई भी लोक सूर्य के प्रभाव से अछूता नहीं है।

सूर्यदेव कालचक्र के स्वामी हैं। दिन, युग, मन्वंतर – ये सभी उनके नियंत्रण में हैं। वे ग्रीष्मकाल में नमी को सोखते हैं और वर्षाकाल में जीवनदायिनी वर्षा के रूप में उसे पुनः छोड़ते हैं। उनकी किरणें गर्जना, बिजली, बादल और वर्षा उत्पन्न करती हैं, जिससे जैव विविधता बनी रहती है। अग्नि या वस्त्र भी उतनी सुरक्षा प्रदान नहीं करते जितनी सूर्य की किरणों की उष्णता करती है। वे पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं और तीनों लोकों के कार्यकलापों को संभव बनाते हैं। सूर्योदय के बिना संसार अंधकार में डूब जाएगा और कोई भी धर्म, अर्थ या काम सिद्ध नहीं हो पाएगा। सभी यज्ञ, तपस्या और हवन सूर्य की कृपा से ही सफल होते हैं।

सूर्य सभी देवताओं का स्वरूप हैं; वे इंद्र, रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा और अग्नि के रूप में विद्यमान हैं। उन्हें हंस, सविता, भानु, मित्र और धर्म भी कहा जाता है। प्रलयकाल में, उनकी क्रोधाग्नि – संवर्तकाग्नि – तीनों लोकों का संहार करती है। वे अपनी रश्मियों के माध्यम से द्वादशादित्य के रूप में काल को नियंत्रित करते हैं। सूर्यदेव पूर्ण तेज स्वरूप, सत्य स्वरूप और शरणागतों के आश्रयदाता हैं। इस स्तुति में बताया गया है कि सप्तमी या षष्ठी तिथि पर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करने वालों पर स्वयं देवी लक्ष्मी की कृपा होती है।

लाभ (Benefits):

  • समस्त पापों का नाश: सूर्यदेव की स्तुति करने से सभी पापों का शमन होता है और मन शुद्ध होता है।
  • उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु: सूर्य स्वास्थ्य के देवता हैं। इस स्तुति के पाठ से उत्तम स्वास्थ्य, रोगों से मुक्ति और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  • धन और समृद्धि: सूर्य की पूजा करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे धन, समृद्धि और सफलता मिलती है।
  • ज्ञान और विवेक: सूर्य ज्ञान के प्रतीक हैं। उनकी कृपा से अज्ञान दूर होता है, ज्ञानोदय होता है और सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • सुरक्षा और निर्भयता: सूर्य का प्रकाश सभी अंधकार और नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है, जिससे पाठ करने वाले को सुरक्षा और निर्भयता प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री भास्कर स्तुतिः (युधिष्ठिर कृतं) क्या है?
यह महाभारत के अरण्य पर्व में महाराज युधिष्ठिर द्वारा सूर्यदेव की स्तुति में रचित एक शक्तिशाली प्रार्थना है। यह सूर्य को जगत की आँख और सभी प्राणियों की आत्मा के रूप में वर्णित करती है।
इस स्तुति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तुति का पाठ प्रतिदिन सूर्योदय के समय, स्नान करके और सूर्य को नमस्कार करते हुए करना अत्यंत शुभ होता है। रविवार को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
श्री भास्कर स्तुतिः का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तुति के पाठ से सभी पाप दूर होते हैं, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, धन, समृद्धि, ज्ञान और सभी प्रकार की सुरक्षा प्राप्त होती है। देवी लक्ष्मी की कृपा भी मिलती है।
कौन इस स्तुति का पाठ कर सकता है?
सूर्यदेव में श्रद्धा और भक्ति रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तुति का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जो उत्तम स्वास्थ्य, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं, उन्हें इसका पाठ करना चाहिए।
इस स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
कम से कम एक या तीन बार पाठ करना उत्तम है। प्रतिदिन 108 बार पाठ करना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।
इस स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
यह स्तुति महाभारत के अरण्य पर्व से ली गई है। पांडवों के वनवास के दौरान, युधिष्ठिर ने सूर्यदेव से प्रार्थना करके अक्षयपात्र प्राप्त किया था, उसी संदर्भ में उन्होंने इस स्तुति की रचना की थी।

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