वं

वंशवृद्धिकरं (वंशाख्यं) दुर्गा कवचं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रदुर्गा देवी
0 व्यूज़

वंशवृद्धिकरं (वंशाख्यं) दुर्गा कवचं

शनैश्चर उवाच |
भगवन् देवदेवेश कृपया त्वं जगत्प्रभो |
वंशाख्यं कवचं ब्रूहि मह्यं शिष्याय तेऽनघ |
यस्य प्रभावाद्देवेश वंशो वृद्धिर्हि जायते |

सूर्य उवाच |
शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि वंशाख्यं कवचं शुभं |
संतानवृद्धिर्यत्पाठाद्गर्भरक्षा सदा नृणां ||

वंध्याऽपि लभते पुत्रं काकवंध्या सुतैर्युता |
मृतवत्सा सपुत्रास्यात् स्रवद्गर्भा स्थिरप्रजा ||

अपुष्पा पुष्पिणी यस्य धारणाच्च सुखप्रसूः |
कन्या प्रजा पुत्रिणी स्यादेतत् स्तोत्र प्रभावतः |

भूतप्रेतादिजा बाधा या बाधा कलिदोषजा |
ग्रहबाधा देवबाधा बाधा शत्रुकृता च या ||

भस्मी भवंति सर्वास्ताः कवचस्य प्रभावतः |
सर्वे रोगाः विनश्यंति सर्वे बालग्रहाश्च ये ||अथ कवचं||
पूर्वे रक्षतु वाराही चाग्नेय्यामंबिका स्वयं |
दक्षिणे चंडिका रक्षेत् नैरृत्यां शववाहिनी ||

वाराही पश्चिमे रक्षेद्वायव्यां च महेश्वरी |
उत्तरे वैष्णवी रक्षेत् ऐशान्यां सिंहवाहिनी ||

ऊर्ध्वं तु शारदा रक्षेदधो रक्षतु पार्वती |
शाकंभरी शिरो रक्षेन्मुखं रक्षतु भैरवी ||

कंठं रक्षतु चामुंडा हृदयं रक्षताच्छिवा |
ईशानी च भुजौ रक्षेत्कुक्षिं नाभिं च काळिका ||

अपर्णा ह्युदरं रक्षेत्कटिं बस्तिं शिवप्रिया |
ऊरू रक्षतु कौमारी जया जानुद्वयं तथा ||

गुल्फौ पादौ सदा रक्षेत् ब्रह्माणी परमेश्वरी |
सर्वांगानि सदा रक्षेत् दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी ||

नमो देव्यै महादेव्यै दुर्गायै सततं नमः |
पुत्रसौख्यं देहि देहि गर्भरक्षां कुरुष्व नः ||मूलमंत्रः||
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं ऐं ऐं ऐं महाकाळी महालक्ष्मी महासरस्वती रूपायै नवकोटिमूर्त्यै दुर्गायै नमः ||

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं दुर्गार्तिनाशिनी संतानसौख्यं देहि देहि वंध्यत्वं मृतवत्सत्वं च हर हर गर्भरक्षां कुरु कुरु सकलां बाधां कुलजां बाह्यजां कृतां अकृतां च नाशय नाशय सर्वगात्राणि रक्ष रक्ष गर्भं पोषय पोषय सर्वोपद्रवं शोषय शोषय स्वाहा ||फलशृतिः||
अनेन कवचेनांगं सप्तवाराभिमंत्रितं |
ऋतुस्नात जलं पीत्वा भवेत् गर्भवती ध्रुवं |

गर्भपातभये पीत्वा दृढगर्भा प्रजायते |
अनेन कवचेनाथ मार्जिता या निशागमे ||

सर्वबाधाविनिर्मुक्ता गर्भिणी स्यान्न संशयः |
अनेन कवचेनेह ग्रंथितं रक्तदोरकं |

कटि देशे धारयंती सुपुत्रसुखभागिनी |
असूतपुत्रमिंद्राणां जयंतं यत्प्रभावतः ||

गुरूपदिष्टं वंशाख्यं कवचं तदिदं सदा |
गुह्यात् गुह्यतरं चेदं न प्रकाश्यं हि सर्वतः |
धारणात् पठनादस्य वंशच्छेदो न जायते ||

इति वंशवृद्धिकरं दुर्गा कवचं |

अर्थ

वंशवृद्धिकरं (वंशाख्यं) दुर्गा कवचम् एक अत्यंत श्रेष्ठ और प्रभावी गर्भ-रक्षा कवच है। भगवान शनिदेव द्वारा पूछे जाने पर, भगवान सूर्य ने इस कवच को वंश वृद्धि, संतान सुख और गर्भ रक्षा के लिए अत्यंत शक्तिशाली बताया। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि दैवीय सुरक्षा का एक अभेद्य कवच है, जिसे विशेष रूप से परिवार की संतति को बढ़ाने और गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।

इस कवच के पाठ से बांझ महिलाओं को संतान प्राप्त होती है, जिनके गर्भ ठहरते नहीं या जो मृतवत्सा हैं, वे स्थिर गर्भधारण करती हैं, गर्भपात का भय दूर होता है, और जिन्हें पुष्पाभाव की समस्या है, उन्हें सुखद प्रसव प्राप्त होता है। स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कन्या संतान की इच्छा रखने वालों को कन्या और पुत्र संतान की इच्छा रखने वालों को पुत्र की प्राप्ति होती है। यह केवल शारीरिक समस्याओं का समाधान ही नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक सुरक्षा और आशीर्वाद भी प्रदान करता है। यह गर्भधारण में बाधा डालने वाली सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है।

यह कवच रक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत प्रबल है। कलयुग के दोष, ग्रह बाधाएँ, शत्रु बाधाएँ, भूत-प्रेत बाधाएँ, बाहरी हानियाँ और दृष्टि दोष – ये सभी इस कवच के प्रभाव से भस्म हो जाते हैं, ऐसा भगवान सूर्य कहते हैं। यह गर्भवती महिलाओं और उनके गर्भ में पल रहे शिशु को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। किसी भी प्रकार की बुरी शक्तियाँ या नकारात्मक प्रभाव गर्भधारण या शिशु के विकास में बाधा नहीं डाल पाते।

इस कवच में दिगपालों के रूप में देवताओं की रक्षा प्रणाली का निर्माण विशिष्ट है। वाराही, अंबिका, चंडिका, कौमारी, कालिका, पार्वती, शाकंभरी, भैरवी जैसे शक्ति स्वरूप सभी दिशाओं और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा करते हैं। अंततः, दुर्गा देवी स्वयं भक्त के सर्वांग की रक्षा का भार उठाती हैं। मूल मंत्र महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के सिद्धांत को व्यक्त करता है, और नवकोटि मूर्तियों से युक्त दुर्गा देवी से वरदान की याचना करता है। यह मंत्र गर्भ रक्षा, संतान प्राप्ति, बांझपन, मृत गर्भ और गर्भपात जैसी पीड़ाओं को दूर करने की शक्ति रखता है।

फलश्रुति में कहा गया है कि इस कवच को सात सप्ताह तक जल पर अभिमंत्रित करके पीने से स्थिर गर्भधारण निश्चित होता है। रक्तदोर को अभिमंत्रित कर कमर पर धारण करने से सुपुत्र सुख निश्चित होता है। इसे केवल गुरु के निर्देश से ही पालन किया जाने वाला अत्यंत गोपनीय कवच बताया गया है। कुल मिलाकर, यह कवच संतान की कामना करने वालों, वंश वृद्धि चाहने वालों, गर्भवती महिलाओं और गर्भ रक्षा चाहने वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दुर्गा कवच है। यह दैवीय कृपा, शक्ति जागरण, सुरक्षा, स्थिर गर्भ और संतान समृद्धि की नींव रखता है।

लाभ (Benefits):

  • बांझपन का निवारण और संतान प्राप्ति: बांझ महिलाओं को संतान प्राप्त करने में सहायता करता है।
  • गर्भपात से रक्षा और स्थिर गर्भधारण: गर्भपात को रोककर स्वस्थ गर्भधारण में मदद करता है।
  • कन्या या पुत्र संतान की प्राप्ति: इच्छानुसार कन्या या पुत्र संतान प्रदान करता है।
  • ग्रह बाधाओं, दृष्टि दोषों और शत्रु हानि का निवारण: सभी नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • गर्भवती महिलाओं के लिए संपूर्ण शारीरिक और मानसिक सुरक्षा: माँ और शिशु की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • वंश वृद्धि और पारिवारिक सुख: वंश को आगे बढ़ाने और परिवार में सुख-शांति लाने में सहायक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वंशवृद्धिकरं दुर्गा कवचम् क्या है?
वंशवृद्धिकरं दुर्गा कवचम् एक शक्तिशाली रक्षा स्तोत्र है जो संतान प्राप्ति, गर्भ रक्षा और वंश वृद्धि के लिए माँ दुर्गा की आराधना करता है। यह वह गोपनीय कवच है जिसे शनिदेव के पूछने पर भगवान सूर्य ने प्रकट किया था।
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ शुभ दिनों पर, विशेषकर दुर्गा देवी को समर्पित दिनों पर या गुरु के मार्गदर्शन में करना चाहिए। नियमित रूप से, शुद्ध मन और भक्ति के साथ पाठ करने से सर्वोत्तम परिणाम मिलते हैं।
वंशवृद्धिकरं दुर्गा कवचम् के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इसके मुख्य लाभों में बांझपन का निवारण, गर्भपात से रक्षा, स्थिर गर्भधारण, इच्छानुसार कन्या या पुत्र संतान की प्राप्ति और ग्रह बाधाओं, दृष्टि दोषों से सुरक्षा शामिल है। यह माँ और शिशु की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
इस कवच का पाठ किसे करना चाहिए?
संतानहीनता से पीड़ित दंपत्ति, गर्भपात की समस्या वाली महिलाएँ, स्थिर गर्भधारण की इच्छा रखने वाली महिलाएँ और अपने वंश की वृद्धि चाहने वाले इस कवच का पाठ कर सकते हैं। गर्भवती महिलाएँ अपनी और शिशु की रक्षा के लिए इसका पाठ करें।
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
पूर्ण फल प्राप्ति के लिए, इस कवच का पाठ प्रतिदिन या कम से कम सात सप्ताह तक निरंतर करना चाहिए। फलश्रुति के अनुसार, सात सप्ताह तक जल पर अभिमंत्रित करके पीने से गर्भधारण में सहायता मिलती है।
इस कवच की उत्पत्ति या पृष्ठभूमि क्या है?
इस कवच की उत्पत्ति शनिदेव और भगवान सूर्य के संवाद में निहित है। जब शनिदेव ने भगवान सूर्य से वंश वृद्धि के लिए एक गोपनीय कवच के बारे में पूछा, तब सूर्यदेव ने इस वंशवृद्धिकरं दुर्गा कवचम् को प्रकट किया।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...