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श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचं

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स्तोत्रदुर्गा देवी
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श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचं

श्री भैरव उवाच |
अधुना देवि वक्ष्येऽहं कवचं मंत्रगर्भकं |
दुर्गायाः सारसर्वस्वं कवचेश्वरसंज्ञकं || 1 ||

परमार्थप्रदं नित्यं महापातकनाशनं |
योगिप्रियं योगिगम्यं देवानामपि दुर्लभं || 2 ||

विना दानेन मंत्रस्य सिद्धिर्देवि कलौ भवेत् |
धारणादस्य देवेशि शिवस्त्रैलोक्यनायकः || 3 ||

भैरवी भैरवेशानी विष्णुर्नारायणो बली |
ब्रह्मा पार्वति लोकेशो विघ्नध्वंसी गजाननः || 4 ||

सेनानीश्च महासेनो जिष्णुर्लेखर्षभः प्रिये |
सूर्यस्तमोऽपहो लोके चंद्रोऽमृतविधिस्तथा || 5 ||

बहुनोक्तेन किं देवि दुर्गाकवचधारणात् |
मर्त्योऽप्यमरतां याति साधको मंत्रसाधकः || 6 ||

कवचस्यास्य देवेशि ऋषिः प्रोक्तो महेश्वरः |
छंदोऽनुष्टुप् प्रिये दुर्गा देवताऽष्टाक्षरा स्मृता |
चक्रिबीजं च बीजं स्यान्मायाशक्तिरितीरिता || 7 ||

ॐ मे पातु शिरो दुर्गा ह्रीं मे पातु ललाटकं |
दुं नेत्रेऽष्टाक्षरा पातु चक्री पातु श्रुती मम || 8 ||

मं ठं गंडौ च मे पातु देवेशी रक्तकुंडला |
वायुर्नासां सदा पातु रक्तबीजनिषूदिनी || 9 ||

लवणं पातु मे चोष्ठौ चामुंडा चंडघातिनी |
भेकी बीजं सदा पातु दंतान्मे रक्तदंतिका || 10 ||

ॐ ह्रीं श्रीं पातु मे कंठं नीलकंठांकवासिनी |
ॐ ऐं क्लीं पातु मे स्कंधौ स्कंदमाता महेश्वरी || 11 ||

ॐ सौः क्लीं मे पातु बाहू देवेशी बगलामुखी |
ऐं श्रीं ह्रीं पातु मे हस्तौ शिवाशतनिनादिनी || 12 ||

सौः ऐं ह्रीं पातु मे वक्षो देवता विंध्यवासिनी |
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पातु कुक्षिं मम मातंगिनी परा || 13 ||

ॐ ह्रीं ऐं पातु मे पार्श्वे हिमाचलनिवासिनी |
ॐ स्त्रीं ह्रूं ऐं पातु पृष्ठं मम दुर्गतिनाशिनी || 14 ||

ॐ क्रीं ह्रुं पातु मे नाभिं देवी नारायणी सदा |
ॐ ऐं क्लीं सौः सदा पातु कटिं कात्यायनी मम || 15 ||

ॐ ह्रीं श्रीं पातु शिश्नं मे देवी श्रीबगलामुखी |
ऐं सौः क्लीं सौः पातु गुह्यं गुह्यकेश्वरपूजिता || 16 ||

ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ह सौः पायादूरू मम मनोन्मनी |
ॐ जूं सः सौः जानु पातु जगदीश्वरपूजिता || 17 ||

ॐ ऐं क्लीं पातु मे जंघे मेरुपर्वतवासिनी |
ॐ ह्रीं श्रीं गीं सदा पातु गुल्फौ मम गणेश्वरी || 18 ||

ॐ ह्रीं दुं पातु मे पादौ पार्वती षोडशाक्षरी |
पूर्वे मां पातु ब्रह्माणी वह्नौ पातु च वैष्णवी || 19 ||

दक्षिणे चंडिका पातु नैरृत्ये नारसिंहिका |
पश्चिमे पातु वाराही वायव्ये मापराजिता || 20 ||

उत्तरे पातु कौमारी चैशान्यां शांभवी तथा |
ऊर्ध्वं दुर्गा सदा पातु पात्वधस्ताच्छिवा सदा || 21 ||

प्रभाते त्रिपुरा पातु निशीथे छिन्नमस्तका |
निशांते भैरवी पातु सर्वदा भद्रकाळिका || 22 ||

अग्नेरंबा च मां पातु जलान्मां जगदंबिका |
वायोर्मां पातु वाग्देवी वनाद्वनजलोचना || 23 ||

सिंहात् सिंहासना पातु सर्पात् सर्पांतकासना |
रोगान्मां राजमातंगी भूताद्भूतेशवल्लभा || 24 ||

यक्षेभ्यो यक्षिणी पातु रक्षोभ्यो राक्षसांतका |
भूतप्रेतपिशाचेभ्यः सुमुखी पातु मां सदा || 25 ||

सर्वत्र सर्वदा पातु ॐ ह्रीं दुर्गा नवाक्षरा |
इत्येवं कवचं गुह्यं दुर्गासर्वस्वमुत्तमं || 26 ||

मंत्रगर्भं महेशानि कवचेश्वरसंज्ञकं |
वित्तदं पुण्यदं पुण्यं वर्म सिद्धिप्रदं कलौ || 27 ||

वर्म सिद्धिप्रदं गोप्यं परापररहस्यकं |
श्रेयस्करं मनुमयं रोगनाशकरं परं || 28 ||

महापातककोटिघ्नं मानदं च यशस्करं |
अश्वमेधसहस्रस्य फलदं परमार्थदं || 29 ||

अत्यंतगोप्यं देवेशि कवचं मंत्रसिद्धिदं |
पठनात्सिद्धिदं लोके धारणान्मुक्तिदं शिवे || 30 ||

रवौ भूर्जे लिखेद्धीमान् कृत्वा कर्माह्निकं प्रिये |
श्रीचक्रांगेऽष्टगंधेन साधको मंत्रसिद्धये || 31 ||

लिखित्वा धारयेद्बाहौ गुटिकां पुण्यवर्धिनीं |
किं किं न साधयेल्लोके गुटिका वर्मणोऽचिरात् || 32 ||

गुटिकां धारयन्मूर्ध्नि राजानं वशमानयेत् |
धनार्थी धारयेत्कंठे पुत्रार्थी कुक्षिमंडले || 33

तामेव धारयेन्मूर्ध्नि लिखित्वा भूर्जपत्रके |
श्वेतसूत्रेण संवेष्ट्य लाक्षया परिवेष्टयेत् || 34 ||

सवर्णेनाथ संवेष्ट्य धारयेद्रक्तरज्जुना |
गुटिका कामदा देवि देवनामपि दुर्लभा || 35 ||

कवचस्यास्य गुटिकां धृत्वा मुक्तिप्रदायिनीं |
कवचस्यास्य देवेशि गुणितुं नैव शक्यते || 36 ||

महिमा वै महादेवि जिह्वाकोटिशतैरपि |
अदातव्यमिदं वर्म मंत्रगर्भं रहस्यकं || 37 ||

अवक्तव्यं महापुण्यं सर्वसारस्वतप्रदं |
अदीक्षिताय नो दद्यात्कुचैलाय दुरात्मने || 38 ||

अन्यशिष्याय दुष्टाय निंदकाय कुलार्थिनां |
दीक्षिताय कुलीनाय गुरुभक्तिरताय च || 39 ||

शांताय कुलशांताय शाक्ताय कुलवासिने |
इदं वर्म शिवे दद्यात्कुलभागी भवेन्नरः || 40 ||

इदं रहस्यं परमं दुर्गाकवचमुत्तमं |
गुह्यं गोप्यतमं गोप्यं गोपनीयं स्वयोनिवत् || 41 ||

इति श्रीदेवीरहस्यतंत्रे श्री दुर्गा कवचं |

अर्थ

श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् एक अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमय रक्षा कवच है। स्वयं भगवान भैरव द्वारा वर्णित, यह दुर्गा देवी के सार-सर्वस्व को समाहित करता है। इसे मंत्रगर्भित और दैवीय साधकों के लिए एक अमूल्य रक्षा-वस्त्र के रूप में सराहा गया है। यह कहा जाता है कि इस कवच को केवल धारण करने या श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मनुष्य भी दिव्य अवस्थाओं को प्राप्त कर सकता है। कलियुग में मंत्र-दान के बिना भी सिद्धि प्राप्त हो सकती है, यह इसकी एक विशेष विशेषता है।

इस कवच का पाठ महान पापों का नाश करता है और परमार्थ सिद्धि प्रदान करता है। भैरव कहते हैं कि इसके द्वारा योगियों और देवताओं द्वारा भी वांछित दुर्लभ दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इस कवच को धारण करने वाला साधक अपनी मानवीय सीमाओं को पार कर देवत्व प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है, अपार शक्ति, पवित्रता और विजय प्राप्त करता है। यह भी कहा जाता है कि सभी देवता भी अपनी रक्षा के लिए इस कवच को धारण करते हैं, जो इसकी असाधारण महिमा को दर्शाता है।

कवच का प्रत्येक बीजाक्षर और देवता का नाम शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा करता है। 'ॐ' सिर की, 'ह्रीं' ललाट (माथे) की और 'दुं' नेत्रों (आँखों) की रक्षा करता है। चंडिका, रक्तदंतिका, बगलामुखी, नीलांबरी, नारायणी, कात्यायनी, विंध्यवासिनी आदि दुर्गा देवी के विभिन्न रूप शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करते हैं और शारीरिक मंडलों को शुद्ध करते हैं। यह समस्त दोषों, अशुभों और अघोर शक्तियों को दूर करने के लिए विशेष शक्ति प्रदान करता है, शरीर की प्रत्येक कोशिका को पवित्र करता है।

यह केवल व्यक्तिगत सुरक्षा ही नहीं, बल्कि दिशाओं के रक्षकों - ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही आदि - का आह्वान करता है और आठों दिशाओं में पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। यह दिन और रात, भूत-प्रेत-पिशाच-राक्षस शक्तियों से, बीमारियों से, यक्ष-राक्षसों से, सर्पों से और अशुभ दृष्टियों से, ग्रह दोषों से और अदृश्य प्रतिकूल शक्तियों से भक्त की पूर्ण रक्षा करता है। यह किसी भी प्रकार की हानि से भक्त की रक्षा करने वाली एक दिव्य अग्नि-दीवार के समान कार्य करता है, भौतिक और आध्यात्मिक स्तर पर अभेद्य सुरक्षा प्रदान करता है।

यह कवच अत्यंत गोपनीय है और दिव्य सिद्धियाँ प्रदान करता है। शास्त्रीय विधि से भोजपत्र पर लिखकर इसे भुजा पर, गले में, कमर में या सिर पर धारण करने से राजसी संपत्ति, विजय, संतान, वशीकरण आदि शक्तियाँ और अधिकार प्राप्त होते हैं। यह शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने, धन और समृद्धि को आकर्षित करने, और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने में मदद करता है। ग्रंथ के अंतिम भाग में यह इंगित किया गया है कि इसे केवल योग्य और श्रद्धालु व्यक्तियों को ही दिया जाना चाहिए। इसे परम रहस्यमय और स्वयोनि के समान माना जाता है, इसकी पवित्रता और शक्ति को बनाए रखता है।

प्रयोजन (Benefits):

  • महाप्राचीन दुर्गाशक्ति का संरक्षण: दुर्गा देवी की अपार और सनातन शक्ति से सभी आपदाओं, विपत्तियों और अकाल मृत्यु से पूर्ण रक्षा मिलती है।
  • भूत-प्रेत-दोष-दृष्टि का नाश: नकारात्मक शक्तियों, बुरी नज़र, तंत्र-मंत्र के प्रभावों और प्रेत बाधाओं से पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है, आसपास का वातावरण शुद्ध होता है।
  • शरीर, मन और प्राणों के लिए पूर्ण कवच: शारीरिक, मानसिक और प्राणिक स्तर पर पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, स्वास्थ्य, मानसिक शांति और जीवन शक्ति में वृद्धि करता है।
  • अष्टसिद्धि-नवनिधि की प्राप्ति में सहायक: अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियों और कुबेर की संपत्ति के समान नवनिधियों (धन और समृद्धि) को प्राप्त करने में सहायक होता है।
  • कर्मदोष-ग्रहदोष-अशुभ कालों से रक्षा: पूर्वजन्म के कर्मों से उत्पन्न दोषों, ग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों और अशुभ समयों से सुरक्षा प्रदान करता है, जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् क्या है?
श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् दुर्गा देवी का एक शक्तिशाली और रहस्यमय रक्षात्मक मंत्र है। यह स्वयं भगवान भैरव द्वारा वर्णित है, जिसमें दुर्गा देवी का सार समाहित है और यह साधकों को सुरक्षा प्रदान करता है।
श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ नियमित रूप से, विशेष रूप से मंगलवार, शुक्रवार या नवरात्रि जैसे शुभ दिनों में किया जा सकता है। स्नान करके, शुद्ध मन से देवी के सामने बैठकर श्रद्धापूर्वक पाठ करना चाहिए।
श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से महान पापों का नाश होता है, भूत-प्रेत दोष, बुरी नज़र दूर होती है। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा मिलती है, और अष्टसिद्धि व नवनिधि की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् का पाठ किसे करना चाहिए?
दुर्गा देवी के भक्तों को, जीवन में कठिनाइयों, बाधाओं, भय या नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति पाने की इच्छा रखने वालों को, और आध्यात्मिक प्रगति व सुरक्षा चाहने वालों को इसका पाठ करना चाहिए।
श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, दिन में कम से कम एक या तीन बार पाठ करना शुभ होता है। विशेष सिद्धि के लिए या संकल्पपूर्वक 11, 21, 108 बार पाठ किया जा सकता है।
श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
श्री दुर्गाष्टाक्षर कवचम् भैरव तंत्र का एक हिस्सा है। स्वयं भगवान भैरव ने इस कवच की महिमा और इसकी रक्षात्मक शक्ति का वर्णन दुर्गा देवी के भक्तों के लिए किया है।

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