श्री सूर्य स्तोत्रं (देव कृतं)
देवा ऊचुः |
नमस्ते ऋक्स्वरूपाय सामरूपाय ते नमः |
यजुः स्वरूपरूपाय साम्नां धामवते नमः || 1 ||
ज्ञानैकधामभूताय निर्धूततमसे नमः |
शुद्धज्योतिः स्वरूपाय विशुद्धायामलात्मने || 2 ||
चक्रिणे शंखिने धाम्ने शार्ङ्गिणे पद्मिने नमः |
वरिष्ठाय वरेण्याय परस्मै परमात्मने || 3 ||
नमोऽखिलजगद्व्यापिस्वरूपायात्ममूर्तये |
सर्वकारणभूताय निष्ठायै ज्ञानचेतसां || 4 ||
नमः सूर्यस्वरूपाय प्रकाशात्मस्वरूपिणे |
भास्कराय नमस्तुभ्यं तथा दिनकृते नमः || 5 ||
शर्वरीहेतवे चैव संध्याज्योत्स्नाकृते नमः |
त्वं सर्वमेतद्भगवन् जगदुद्भ्रमता त्वया || 6 ||
भ्रमत्या विद्धमखिलं ब्रह्मांडं सचराचरं |
त्वदंशुभिरिदं स्पृष्टं सर्वं संजायते शुचिः || 7 ||
क्रियते त्वत्करैः स्पर्शाज्जलादीनां पवित्रता |
होमदानादिको धर्मो नोपकाराय जायते || 8 ||
तावद्यावन्न संयोगि जगदेतत् त्वदंशुभिः |
ऋचस्ते सकला ह्येता यजूंष्येतानि चान्यतः || 9 ||
सकलानि च सामानि निपतंति त्वदंगतः |
ऋङ्मयस्त्वं जगन्नाथ त्वमेव च यजुर्मयः || 10 ||
यतः साममयश्चैव ततो नाथ त्रयीमयः |
त्वमेव ब्रह्मणो रूपं परं चापरमेव च || 11 ||
मूर्तामूर्तस्तथा सूक्ष्मः स्थूलरूपस्तथा स्थितः |
निमेषकाष्ठादिमयः कालरूपः क्षयात्मकः |
प्रसीद स्वेच्छया रूपं स्वतेजः शमनं कुरु || 12 ||
इदं स्तोत्रवरं रम्यं श्रोतव्यं श्रद्धया नरैः |
शिष्यो भूत्वा समाधिस्थो दत्त्वा देयं गुरोरपि || 13 ||
इति श्रीमार्कंडेयपुराणे पंचसप्ततितमोऽध्याये देव कृत श्री सूर्य स्तोत्रं |
अर्थ
श्री सूर्य स्तोत्रं (देव कृतं) एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसमें देवता स्वयं भगवान सूर्य की स्तुति करते हैं। इस स्तोत्र में, देवगण सूर्यदेव को वेदों के स्वरूप, जगत् के संचालन के मूल कारण और पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित करने वाले परमात्मा के रूप में वर्णित करते हैं। वे घोषणा करते हैं कि सूर्य ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद, इन तीनों वेदों के स्वरूप और उनके धाम हैं। ज्ञान के एकमात्र धाम स्वरूप, वे अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर, अपनी शुद्ध ज्योति से पूरे संसार को प्रकाशित करते हैं।
देवता बताते हैं कि चक्र, शंख, शार्ङ्गधनुष और पद्म जैसे सभी वैष्णव आयुध सूर्य के तेज में ही निहित हैं। वे समस्त लोकों में व्याप्त हैं और सृष्टि, स्थिति तथा लय के मूल कारण, परब्रह्म परमात्मा हैं। सूर्य स्वरूप भास्कर दिनकर्ता के रूप में इस विश्व का संचालन करते हैं। रात्रि, दिवस और संध्याकाल – ये सभी उनकी ज्योति से ही उत्पन्न होते हैं। पूरा संसार सूर्य की किरणों से ही गतिशील रहता है; जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता, वहाँ जीवन संभव नहीं है। ब्रह्मांड का चर-अचर जगत् उनके तेज के स्पर्श से ही उत्पन्न होता है, पलता है और स्थित रहता है।
जल का पवित्र होना, यज्ञों का सफल होना, दान-धर्म का कल्याणकारी होना – ये सभी सूर्य की किरणों के स्पर्श से ही संभव होते हैं। सभी वेद सूर्य से ही उद्भूत होते हैं। ऋग्वेद सूर्य की श्वास के समान, यजुर्वेद उनकी शक्ति के समान और सामवेद उनके दिव्य नाद के समान प्रवाहित होते हैं। इसलिए देवता घोषणा करते हैं कि सूर्य त्रयीमय हैं – वे वेदत्रयी के स्वरूप हैं। वे ही परब्रह्म हैं, परात्पर हैं, सगुण भी हैं और निर्गुण भी; सूक्ष्म और स्थूल दोनों रूप उनके लिए सहज हैं। वे कालस्वरूप हैं – क्षण से लेकर युगांत तक काल का संचालन करने वाली शक्ति उन्हीं में है।
अंत में, देवता सूर्यदेव से प्रार्थना करते हुए कहते हैं – "हे प्रभु! अपनी इच्छा से दया करें और अपने तेज से उत्पन्न कठोरता को शांत करें।" वे संसार के जीवों के कल्याण के लिए कोमल आशीर्वाद की याचना करते हैं। यह भी कहा गया है कि इस स्तोत्र को गुरु के प्रति श्रद्धा भाव से, एकाग्रचित्त होकर सुनना और इसका पाठ करना महापुण्यकारी है। यह स्तोत्र सूर्य भगवान की अनंत शक्ति और लोककल्याणकारी स्वरूप का बोध कराता है।
लाभ (Benefits):
- शारीरिक बल और स्वास्थ्य: सूर्यदेव की कृपा से शारीरिक शक्ति, मानसिक स्थिरता और उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
- ज्ञान और एकाग्रता: वेदों के अध्ययन में रुचि बढ़ती है, ज्ञान में वृद्धि होती है और किसी भी कार्य में एकाग्रता बढ़ती है। यह विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है।
- ग्रह शांति और दोष निवारण: यदि कुंडली में सूर्य की स्थिति कमजोर हो या सूर्य दोष हों, तो इस स्तोत्र के पाठ से वे दोष दूर होते हैं और ग्रह शांति मिलती है।
- आध्यात्मिक प्रगति: सूर्य आत्मा के कारक हैं, अतः यह स्तोत्र आध्यात्मिक प्रगति, आंतरिक शुद्धि और आत्मिक तेज प्रदान करता है।
- शुभ कार्यों में सफलता: किसी भी नए कार्य की शुरुआत करते समय या महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय इस स्तोत्र का पाठ करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं और कार्यों में सफलता मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री सूर्य स्तोत्रं (देव कृतं) क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री सूर्य स्तोत्रं का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
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