श्री सूर्य स्तवराज स्तोत्रं
ब्रह्मोवाच |
स्तवनं सामवेदोक्तं सूर्यस्य व्याधिमोचनं |
सर्वपापहरं सारं धनारोग्यकरं परं || 1 ||
तं ब्रह्म परमं धाम ज्योतीरूपं सनातनं |
त्वामहं स्तोतुमिच्छामि भक्तानुग्रहकारकं || 2 ||
त्रैलोक्यलोचनं लोकनाथं पापविमोचनं |
तपसां फलदातारं दुःखदं पापिनां सदा || 3 ||
कर्मानुरूपफलदं कर्मबीजं दयानिधिं |
कर्मरूपं क्रियारूपमरूपं कर्मबीजकं || 4 ||
ब्रह्मविष्णुमहेशानामंशं च त्रिगुणात्मकं |
व्याधिदं व्याधिहंतारं शोकमोहभयापहं |
सुखदं मोक्षदं सारं भक्तिदं सर्वकामदं || 5 ||
सर्वेश्वरं सर्वरूपं साक्षिणं सर्वकर्मणां |
प्रत्यक्षं सर्वलोकानामप्रत्यक्षं मनोहरं || 6 ||
शश्वद्रसहरं पश्चाद्रसदं सर्वसिद्धिदं |
सिद्धिस्वरूपं सिद्धेशं सिद्धानां परमं गुरुं || 7 ||
स्तवराजमिदं प्रोक्तं गुह्याद्गुह्यतरं परं |
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं व्याधिभ्यः स प्रमुच्यते || 8 ||
आंध्यं कुष्ठं च दारिद्र्यं रोगः शोको भयं कलिः |
तस्य नश्यति विश्वेश श्रीसूर्यकृपया ध्रुवं || 9 ||
महाकुष्ठी च गलितो चक्षुर्हीनो महाव्रणी |
यक्ष्मग्रस्तो महाशूली नानाव्याधियुतोऽपि वा || 10 ||
मासं कृत्वा हविष्यान्नं श्रुत्वाऽतो मुच्यते ध्रुवं |
स्नानं च सर्वतीर्थानां लभते नात्र संशयः || 11 ||
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे गणपतिखंडे एकोनविंशोऽध्याये ब्रह्मकृत श्री सूर्य स्तवराजं |
अर्थ
ब्रह्मवैवर्त महापुराण में वर्णित "श्री सूर्य स्तवराज स्तोत्रम्" भगवान सूर्य को समर्पित एक अत्यंत गोपनीय, गहन शक्ति वाला और परम स्तोत्र है। इसे सामवेदोक्त दैवी स्तुति के रूप में वर्णित किया गया है, जो रोगों का नाश करने वाला, पापों का शमन करने वाला, धन-स्वास्थ्य में वृद्धि करने वाला और सभी दुखों तथा नकारात्मकता को दूर करने वाला है। ब्रह्मा जी ने इसे रोगनाशक और धन-आरोग्य प्रदाता सामवेदिक स्तोत्र कहा है।
यह स्तोत्र भगवान सूर्य की परब्रह्म स्वरूप, सनातन ज्योतिर्मय और भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले अनुग्रहकारी के रूप में स्तुति करता है। वे तीनों लोकों के नेत्र, लोकनाथ और दुखों को दूर करने वाले पापनाशक हैं। सूर्यदेव सृष्टि के मूल, तपस्या के फलदाता, पापों का विनाश करने वाले और सभी प्राणियों के आधार हैं।
सूर्यदेव कर्मफलदाता हैं – वे कर्म के बीज, कर्मफल देने वाले और दया के सागर हैं। उनकी किरणों के माध्यम से जीवों को स्वभाव, शक्ति, धर्म और ज्ञान प्राप्त होता है। वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सम्मिलित तत्व स्वरूप हैं; त्रिगुणात्मक हैं। वे रोगों को देने वाले भी हैं, लेकिन अपनी कृपा दृष्टि से उन्हें दूर भी करते हैं। वे शोक, मोह और भय का नाश कर सुख, मोक्ष, भक्ति और समस्त कामनाओं को प्रदान करते हैं।
सूर्यदेव सभी कर्मों के साक्षी हैं। समस्त कर्म उनकी उपस्थिति में संपन्न होते हैं। वे प्रत्यक्ष देवता हैं; किंतु अंतर्मुख होकर मन में भी दर्शन देते हैं। वे सिद्धों के गुरु, सिद्धियों में परम सिद्धि, और सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं। इस स्तोत्र को "स्तवराजम्" कहने का कारण यह है कि शास्त्रों में इसे सूर्य स्तोत्रों का राजा कहा गया है।
यह स्तोत्र अत्यंत गूढ़ और रहस्यों में भी रहस्यमय है। जो व्यक्ति इसे तीनों संध्याकालों में नित्य जपता है, वह बीमारियों, अंधत्व, कुष्ठ रोग, दरिद्रता, शोक, भय और कलियुग से संबंधित दोषों से मुक्त हो जाता है। अत्यंत जटिल रोग जैसे महाकुष्ठ, दृष्टिहीनता, घाव, यक्ष्मा (टीबी) और नव प्रकार के रोग भी इस स्तोत्र के श्रवण के साथ एक मास तक हविष्य अन्न व्रत का पालन करने से नष्ट हो जाते हैं, ऐसा श्लोक में पुष्टि की गई है। इसका पाठ करने वाला सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त करता है।
लाभ (Benefits):
- दरिद्रता, भय, कुष्ठ रोग, नेत्र रोग और शूल व्याधियाँ दूर होती हैं।
- शरीर के दीर्घकालिक रोग नष्ट होते हैं।
- सभी सिद्धियाँ, शुभ कार्यों में सफलता और धन लाभ प्राप्त होता है।
- पापों का नाश होता है, दुख, मोह और भय का निवारण होता है।
- मानसिक शांति, धर्म बुद्धि, शक्ति और धैर्य में वृद्धि होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
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