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श्री रवि स्तोत्रं (सांबपुराणे)

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स्तोत्रनवग्रह
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श्री रवि स्तोत्रं (सांबपुराणे)

त्वं देव ऋषिकर्ता च प्रकृतिः पुरुषः प्रभुः |
छाया संज्ञा प्रतिष्ठापि निरालंबो निराश्रयः || 1 ||

आश्रयः सर्वभूतानां नमस्तेऽस्तु सदा मम |
त्वं देव सर्वतश्चक्षुः सर्वतः सर्वदा गतिः || 2 ||

सर्वदः सर्वदा सर्वः सर्वसेव्यस्त्वमार्तिहा |
त्वं देव ध्यानिनां ध्यानं योगिनां योग उत्तमः || 3 ||

त्वं भाषाफलदः सर्वः सद्यः पापहरो विभुः |
सर्वार्तिनाशं नो नाशीकरणं करुणा विभुः || 4 ||

दयाशक्तिः क्षमावासः सघृणिर्घृणिमूर्तिमान् |
त्वं देव सृष्टिसंहारस्थितिरूपः सुराधिपः || 5 ||

बकः शोषो वृकोदाहस्तुषारो दहनात्मकः |
प्रणतार्तिहरो योगी योगमूर्ते नमोऽस्तु ते || 6 ||

त्वं देव हृदयानंद शिरोरत्नप्रभामणिः |
बोधकः पाठको ध्यायी ग्राहको ग्रहणात्मकः || 7 ||

त्वं देव नियमो न्यायी न्यायको न्यायवर्धनः |
अनित्यो नियतो नित्यो न्यायमूर्ते नमोऽस्तु ते || 8 ||

त्वं देव त्रायसे प्राप्तान् पालयस्यर्पवस्थितान् |
ऊर्द्वत्राणार्दितान् लोकान् लोकचक्षुर्नमोऽस्तु ते || 9 ||

दमनोऽसि त्वं दुर्दांतः साध्यानां चैव साधकः |
बंधुः स्वबंधुहीनानां नमस्ते बंधुरूपिणे || 10 ||

इति श्रीसांबपुराणे त्रिचत्वारिंशोऽध्याये रवि स्तोत्रं ||

अर्थ

श्री रवि स्तोत्रं (सांबपुराणे) सूर्य भगवान को परब्रह्म स्वरूप, जगत के एकमात्र आश्रय, ज्ञान के दाता और रक्षक के रूप में कृतज्ञतापूर्वक स्तुति करता है। यह स्तोत्र उन्हें सृष्टि-स्थिति-लय के मूल कारण के रूप में वर्णित करता है, जो प्रकृति और पुरुष तत्वों के एकत्व को धारण करने वाले आदिदेव हैं। सभी भूतों (प्राणियों) के वही आधार हैं, सभी दिशाओं में देखने वाली दिव्य चक्षु हैं, भक्तों की रक्षा करने वाले शरणदाता हैं, योगियों के लिए परम योग स्वरूप हैं और ध्यानियों का ध्यान हैं।

उनकी कृपा से भाषा, ज्ञान, ग्रहणशक्ति, बोधन, बुद्धि की स्पष्टता और न्यायबुद्धि — ये सभी स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। सूर्य की किरणें संसार के अंधकार, पाप और सभी दुखों को दूर कर प्राणियों को उत्साह, प्राणशक्ति और धैर्य प्रदान करती हैं। दया, क्षमा, करुणा, रक्षा और न्याय — ये सभी गुण उन्हीं से प्रकट होते हैं। वे कमजोरों के लिए बंधु बनकर, अशक्तों को आश्रय देकर, अपनी कांति से लोकों को धारण करते हैं। भक्त द्वारा शरणागति दिखाते ही उनकी रक्षा अवश्य प्राप्त होती है।

यह स्तोत्र सूर्य देव को केवल एक ग्रह के रूप में नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड की चेतना शक्ति के रूप में, सभी जीवों के अस्तित्व के कारण के रूप में और धर्म तथा न्याय के प्रतिरूप के रूप में पूजता है। उनकी प्रत्येक किरण ज्ञान का प्रतीक है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर सत्य का प्रकाश फैलाती है। 'त्वं देव सृष्टि संहार स्थिति रूपः सुराधिपः' श्लोक उनकी सृष्टि, स्थिति और संहार शक्तियों को उजागर करता है। योगी और ध्यानी अपने आंतरिक ज्ञान को बढ़ाने के लिए सूर्य को अपने ध्यान का केंद्र बनाते हैं।

इस स्तोत्र का पाठ केवल आध्यात्मिक लाभ ही नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रदान करता है। सूर्य की उपासना आत्मविश्वास, साहस और निर्णय लेने की शक्ति को बढ़ाती है। सांब पुराण में वर्णित यह स्तोत्र सूर्य देव की महिमा और उनकी अनंत शक्ति का बोध कराता है। यह स्तोत्र हमें बताता है कि सूर्य केवल प्रकाश देने वाले नहीं हैं, बल्कि समस्त विश्व के अस्तित्व का मूल, सभी शुभ कार्यों के प्रेरक और अंतिम मोक्ष के मार्गदर्शक हैं।

लाभ (Benefits):

  • शारीरिक और मानसिक शक्ति में वृद्धि: इस स्तोत्र के पाठ से शरीर और मन को नई ऊर्जा, उत्साह और शक्ति मिलती है। यह शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार करता है और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
  • पाप, कष्ट और अशुभ प्रभावों का निवारण: सूर्य देव के आशीर्वाद से पाप, दुख, भय और जीवन के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं। यह नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • विद्या, बुद्धि और निर्णय शक्ति में सुधार: स्तोत्र पाठ से विद्या में प्रगति, स्पष्ट बुद्धि, बेहतर निर्णय लेने की क्षमता और न्याय की भावना बढ़ती है। यह ज्ञान और ग्रहण शक्ति को तेज करता है।
  • शत्रुओं, रोगों और संकटों से रक्षा: सूर्य देव एक रक्षक के रूप में कार्य करते हैं, भक्तों को शत्रुओं, रोगों और जीवन के विभिन्न संकटों से बचाते हैं। यह स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करता है।
  • भय और दुख का नाश; धैर्य और चेतना की वृद्धि: भय और दुख नष्ट होते हैं, जिससे धैर्य, आत्मविश्वास और नई चेतना का संचार होता है। यह जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री रवि स्तोत्रं (सांबपुराणे) क्या है?
यह सांब पुराण में वर्णित सूर्य देव को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। यह सूर्य को परब्रह्म स्वरूप, सृष्टि-स्थिति-लय का कारण और सभी जीवों का आश्रयदाता बताता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह सूर्योदय के समय, स्नान करके शुद्ध मन से करना अत्यंत शुभ माना जाता है। सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद इसका पाठ किया जा सकता है।
श्री रवि स्तोत्रं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इसके पाठ से शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ती है, पाप और दुख दूर होते हैं, बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है, तथा शत्रुओं और रोगों से रक्षा मिलती है। यह धैर्य और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है।
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
सूर्य देव की कृपा चाहने वाले, रोगों से मुक्ति पाने की इच्छा रखने वाले, ज्ञान और बुद्धि शक्ति को बढ़ाना चाहने वाले, तथा जीवन में स्थिरता और सफलता चाहने वाले सभी लोग इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
आप अपनी सुविधा और श्रद्धा के अनुसार प्रतिदिन कम से कम 11 या 21 बार इसका पाठ कर सकते हैं। नियमित पाठ से अधिक अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
यह स्तोत्र प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में से एक सांब पुराण से लिया गया है। सांब पुराण सूर्य देव की महिमा और उनकी उपासना के तरीकों का विस्तृत वर्णन करता है।

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