श्री दुर्गा स्तोत्रं (शिवरहस्ये)
दुर्गां शिवां शांतिकरीं ब्रह्माणीं ब्रह्मणः प्रियां |
सर्वलोकप्रणेत्रीं च प्रणमामि सदाशिवां || 1 ||
मंगळां शोभनां शुद्धां निष्कळां परमां कलां |
विश्वेश्वरीं विश्वमातां चंडिकां प्रणमाम्यहं || 2 ||
सर्वदेवमयीं देवीं सर्वरोगभयापहां |
ब्रह्मेशविष्णुनमितां प्रणमामि सदा उमां || 3 ||
विंध्यस्थां विंध्यनिलयां दिव्यस्थाननिवासिनीं |
योगिनीं योगमातां च चंडिकां प्रणमाम्यहं || 4 ||
ईशानमातरं देवीमीश्वरीमीश्वरप्रियां |
प्रणतोऽस्मि सदा दुर्गां संसारार्णवतारिणीं || 5 ||
य इदं पठते स्तोत्रं शृणुयाद्वापि यो नरः |
स मुक्तः सर्वपापैस्तु मोदते दुर्गया सह || 6 ||
इति शिवरहस्ये श्री दुर्गा स्तोत्रं |
अर्थ
श्री दुर्गा स्तोत्रं (शिवरहस्ये) शिव रहस्य ग्रंथ में वर्णित एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तुति है। इस स्तोत्र में, भगवान शिव स्वयं देवी दुर्गा की स्तुति करते हैं, उन्हें शिवप्रिया, जगदाधार, भयनाशक और संसार-सागर से मुक्ति दिलाने वाली माता के रूप में वर्णित करते हैं। प्रारंभ में, देवी दुर्गा को शिव-स्वरूपा, शांति प्रदान करने वाली शक्ति, ब्रह्माणी को प्रिय और सभी लोकों का संचालन करने वाली महाशक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। जो लोग उन्हें प्रणाम करते हैं, वे शिव की कृपा प्राप्त करते हैं।
वह मंगलकारिणी, पवित्रता, शोभा, शुद्धि और परम शक्ति का कलात्मक स्वरूप हैं। विश्वमाता के रूप में वह सभी लोकों का आधार हैं, और चंडिका रूप में वह दुष्टों का नाश करने वाली शक्ति हैं। इसके बाद, देवी को सभी देवताओं में व्याप्त शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है – इसीलिए उन्हें 'सर्वदेवमयी' कहा जाता है। रोगों का नाश, भय का निवारण, स्वास्थ्य और सुरक्षा का वरदान – यह सब उन्हीं से प्राप्त होता है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी उन्हें नमन करते हैं, यह उनकी पराशक्ति का प्रमाण है।
वह विंध्याचल में निवास करने वाली विंध्यवासिनी के रूप में, योगिनी और योगमाता के रूप में – योग सिद्धियों की आदि शक्ति, ध्यान और तपस्या की मूल प्रेरक हैं। देवी ईशानप्रिया, ईशानमाता – यानी शिव तत्व की मूल शक्ति हैं। वह भक्तों को संसार रूपी महासागर से पार उतारती हैं। जिसके जीवन में भय, दुःख, निराशा या अंधकार हो, उनकी स्मरण मात्र से वे सब दूर हो जाते हैं।
इस स्तोत्र के अंत में, भगवान शिव कहते हैं कि जो कोई भी इस स्तोत्र का पाठ करता है या श्रवण करता है, वह सभी पाप बंधनों से मुक्त होकर, देवी दुर्गा के साथ सुखमय देवलोक का आनंद प्राप्त करता है। यह स्तोत्र भक्तों को मानसिक शांति, आत्मबल और सभी प्रकार के शुभ फल प्रदान करने की क्षमता रखता है।
लाभ (Benefits):
- पाप नाश और चिंता-दुःख निवारण: इस स्तोत्र के पाठ या श्रवण से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन की चिंताएं व दुःख दूर होते हैं।
- दुर्गा देवी की कृपा और सुरक्षा: दुर्गा देवी की कृपा दृष्टि से सदैव रक्षा और उनकी दिव्य शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- संसार बंधन से मुक्ति का भाव: यह भवसागर को पार कर मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है, सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्रदान करता है।
- भय, रोग और दुष्ट प्रभावों से मुक्ति: किसी भी प्रकार के भय, रोगों और नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से रक्षा मिलती है।
- मानसिक शांति और आत्मबल: इस स्तोत्र का पाठ मन को शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दुर्गा स्तोत्रं (शिवरहस्ये) क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना उत्तम है?
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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