श्री दुर्गा देवि कवचं
ईश्वर उवाच |
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वसिद्धिदं |
पठित्वा पाठयित्वा च नरो मुच्येत संकटात् || 1 ||
अज्ञात्वा कवचं देवि दुर्गामंत्रं च यो जपेत् |
स नाप्नोति फलं तस्य परत्र नरकं व्रजेत् || 2 ||
उमा देवी शिरः पातु ललाटे शूलधारिणी |
चक्षुषी खेचरी पातु कर्णौ चत्वरवासिनी || 3 ||
सुगंधा नासिके पातु वदनं सर्वधारिणी |
जिह्वां च चंडिकादेवी ग्रीवां सौभद्रिका तथा || 4 ||
अशोकवासिनी चेतो द्वौ बाहू वज्रधारिणी |
हृदयं ललितादेवी उदरं सिंहवाहिनी || 5 ||
कटिं भगवती देवी द्वावूरू विंध्यवासिनी |
महाबला च जंघे द्वे पादौ भूतलवासिनी || 6 ||
एवं स्थिताऽसि देवि त्वं त्रैलोक्यरक्षणात्मिके |
रक्ष मां सर्वगात्रेषु दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते || 7 ||
इति कुब्जिकातंत्रोक्तं श्री दुर्गा कवचं |
अर्थ
श्री दुर्गा देवी कवचम् आदि शक्ति माँ दुर्गा की दिव्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र प्रार्थना है। कुब्जिका तंत्र में वर्णित इस कवच का उपदेश स्वयं भगवान शिव ने देवी पार्वती को दिया था। भगवान शिव स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति इस कवच को सही ढंग से जानता है, उसका पाठ करता है, या दूसरों को सिखाता है, वह सभी संकटों और खतरों से मुक्त हो जाता है। यह भी चेतावनी दी गई है कि जो व्यक्ति कवच को जाने बिना केवल दुर्गा मंत्रों का जप करता है, उसे अपेक्षित फल नहीं मिलता और परलोक में भी उसे नरक भोगना पड़ता है। यह इस कवच के महत्व और दिव्य शक्ति को दर्शाता है।
यह कवच बताता है कि कैसे देवी दुर्गा के विभिन्न रूप भक्त के सिर से लेकर पैरों तक के प्रत्येक अंग की रक्षा करते हैं। यह केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक सुरक्षा भी प्रदान करता है। उमा देवी हमारे सिर की रक्षा करती हैं, शूलधारिणी ललाट की, खेचरी देवी आँखों की, और चतुरवासिनी कानों की रक्षा करती हैं। इस प्रकार, देवी का प्रत्येक रूप हमारे अस्तित्व के एक विशिष्ट भाग की रक्षा के लिए नियुक्त है, जिससे भक्तों में अटूट विश्वास उत्पन्न होता है।
कवच आगे बताता है कि सुगंधा देवी नासिका की, सर्वधारिणी मुख की, चंडिका देवी जिह्वा की, और सौभद्रिका देवी ग्रीवा की रक्षा करती हैं। अशोकवासिनी मन की, वज्रधारिणी भुजाओं की, ललिता देवी हृदय की, और सिंहवाहिनी उदर की रक्षा करती हैं। यह दिव्य सुरक्षा हमारे शरीर के प्रत्येक संवेदनशील हिस्से को घेर लेती है, हमें किसी भी नकारात्मक ऊर्जा या बाधाओं से दूर रखती है।
भगवती देवी कटि (कमर) की, विंध्यवासिनी जांघों की, महाबला देवी जंघाओं की, और भूतलवासिनी पैरों की रक्षा करती हैं। इस प्रकार, दुर्गा देवी तीनों लोकों की रक्षक के रूप में, भक्त के शरीर के हर अंग में दिव्य कवच बनकर रक्षा करें, इसी प्रार्थना के साथ यह स्तोत्र समाप्त होता है। इस कवच का पाठ करके, भक्त पूरी तरह से दुर्गा देवी की शरण में आ जाता है और उनकी अखंड सुरक्षा प्राप्त करता है। यह केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा की सुरक्षा भी प्रदान करने का एक शक्तिशाली साधन है।
लाभ (Benefits):
- पूर्ण दैवीय सुरक्षा: सिर से पैर तक शरीर के प्रत्येक अंग को दुर्गा देवी के विभिन्न रूपों से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
- भय और संकटों से मुक्ति: नजर दोष, शत्रु भय, बुरी शक्तियों का प्रभाव, दुर्घटनाओं और जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।
- मानसिक शांति और साहस: स्वप्न भय, बीमारियों के प्रभाव और दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों से सुरक्षा मिलती है, जिससे मन में शांति, साहस और आत्मबल बढ़ता है।
- नकारात्मक शक्तियों का निवारण: नकारात्मक प्रभावों, शापों और अशुभ शक्तियों से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
- सभी इच्छाओं की पूर्ति: इस कवच के नियमित पाठ से भक्तों की सभी शुभ इच्छाएँ पूरी होती हैं, ऐसा माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री दुर्गा देवि कवचम् क्या है?
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री दुर्गा देवि कवचम् का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
श्री दुर्गा देवि कवचम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस कवच का मूल स्रोत क्या है?
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