- ॐ श्रीमते नमः
- ॐ शशधराय नमः
- ॐ चंद्राय नमः
- ॐ ताराधीशाय नमः
- ॐ निशाकराय नमः
- ॐ सुधानिधये नमः
- ॐ सदाराध्याय नमः
- ॐ सतृतये नमः
- ॐ साधुपूजिताय नमः
- ॐ जितेंद्रियाय नमः
- ॐ जगद्योनये नमः
- ॐ ज्योतिश्चक्रप्रवर्तकाय नमः
- ॐ विकर्तनानुजाय नमः
- ॐ वीराय नमः
- ॐ विश्वेशाय नमः
- ॐ विदुषांपतये नमः
- ॐ दोषकराय नमः
- ॐ दुष्टदूराय नमः
- ॐ पुष्टिमते नमः
- ॐ शिष्टपालकाय नमः
- ॐ अष्टमूर्ति प्रियाय नमः
- ॐ अनंताय नमः
- ॐ कष्टदारुकुठारकाय नमः
- ॐ स्वप्रकाशाय नमः
- ॐ प्रकाशात्मने नमः
- ॐ द्युचराय नमः
- ॐ देवभोजनाय नमः
- ॐ कळाधराय नमः
- ॐ कालहेतवे नमः
- ॐ कामकृते नमः
- ॐ कामदायकाय नमः
- ॐ मृत्युसंहारकाय नमः
- ॐ अमर्त्याय नमः
- ॐ नित्यानुष्ठानदाय नमः
- ॐ क्षपाकराय नमः
- ॐ क्षीणपापाय क्षय वृद्धि समन्विताय नमः
- ॐ जैवातृकाय नमः
- ॐ शशिने नमः
- ॐ शुभ्राय नमः
- ॐ जयिने नमः
- ॐ जयफलप्रदाय नमः
- ॐ सुधामयाय नमः
- ॐ सुरस्वामिने नमः
- ॐ भक्तानामिष्टदायकाय नमः
- ॐ शुक्तिदाय नमः
- ॐ भद्राय नमः
- ॐ भक्त दारिद्र्याभंजनाय नमः
- ॐ सामगानप्रियाय नमः
- ॐ सर्वरक्षकाय नमः
- ॐ सागरोद्बवाय नमः
- ॐ भयांतकृते नमः
- ॐ भक्तिगम्याय नमः
- ॐ बवबंधविमोचकाय नमः
- ॐ जगत्रकाशकिरणाय नमः
- ॐ जगदानंदकारणाय नमः
- ॐ निस्सपत्नाय नमः
- ॐ निराहाराय नमः
- ॐ निर्विकाराय नमः
- ॐ निरामयाय नमः
- ॐ भूच्चायाच्चादिताय नमः
- ॐ भव्याय नमः
- ॐ भुवनप्रतिपालकाय नमः
- ॐ सकलार्तिहराय नमः
- ॐ सौम्यजनकाय नमः
- ॐ साधुवंदिताय नमः
- ॐ सर्वगमज्ञाय नमः
- ॐ सर्वज्ञाय नमः
- ॐ सनकादिमुनिस्तुताय नमः
- ॐ सितच्चत्रध्वजोपेताय नमः
- ॐ शीतांगाय नमः
- ॐ शीतभूषणाय नमः
- ॐ श्वेतमाल्यांबरधराय नमः
- ॐ श्वेतगंधानुलेपनाय नमः
- ॐ दशाश्वरधसंरूढाय नमः
- ॐ दंडपाणये नमः
- ॐ धनुर्धराय नमः
- ॐ कुंदपुषोज्वलाकाराय नमः
- ॐ नयनाब्जसमुद्भवाय नमः
- ॐ आत्रेयगोत्रजाय नमः
- ॐ अत्यंतविनयाय नमः
- ॐ प्रियदायकाय नमः
- ॐ करुणारससंपूर्णाय नमः
- ॐ कर्कटप्रभवे नमः
- ॐ अव्ययाय नमः
- ॐ चतुरशासनारूढाय नमः
- ॐ चतुराय नमः
- ॐ दिव्यवाहनाय नमः
- ॐ विवस्वन्मंडलाल्लेयवासाय नमः
- ॐ वसुसमृद्धिदाय नमः
- ॐ महेश्वरप्रियाय नमः
- ॐ दांताय नमः
- ॐ मेरुगोत्र प्रदक्षिणाय नमः
- ॐ ग्रहमंडलमध्यस्थाय नमः
- ॐ ग्रषितार्काय नमः
- ॐ ग्रहाधिपाय नमः
- ॐ द्विजराजाय नमः
- ॐ द्युतिलकाय नमः
- ॐ द्विभुजाय नमः
- ॐ द्विजपूजिताय नमः
- ॐ औदुंबरनगावासाय नमः
- ॐ उदाराय नमः
- ॐ रोहिणीपतये नमः
- ॐ नित्योदयाय नमः
- ॐ मुनिस्तुत्याय नमः
- ॐ नित्यांदफलप्रदाय नमः
- ॐ सकलाह्लादनकराय नमः
- ॐ पलाशसमिधप्रियाय नमः
- ॐ श्री चंद्रमसे नमः
|| इति श्री चंद्र अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री चंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि भगवान चंद्र देव को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक स्तोत्र है। हिंदू धर्म में, चंद्र देव को नवग्रहों में से एक महत्वपूर्ण देवता के रूप में पूजा जाता है, और यह नामावलि उनकी स्तुति और आराधना का एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण माध्यम है। यह स्तोत्र चंद्र देव के विभिन्न गुणों, शक्तियों और दिव्य विशेषताओं का वर्णन करता है, जिससे भक्तों को उनके साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में मदद मिलती है।
चंद्र देव मन, भावनाओं, शांति और समृद्धि के अधिपति हैं। ज्योतिष में, चंद्रमा की स्थिति व्यक्ति की मानसिक स्थिति, माता से संबंध और समग्र कल्याण पर गहरा प्रभाव डालती है। इस अष्टोत्तर शतनामावलि में, चंद्र देव को 'शशधर' (खरगोश धारण करने वाले), 'ताराधीश' (तारों के स्वामी), 'निशाकर' (रात्रि के निर्माता), 'सुधानिधि' (अमृत का सागर), 'जगद्योनि' (विश्व के मूल) और 'कालहेतु' (समय के कारण) जैसे नामों से पुकारा जाता है। ये नाम चंद्र देव की संप्रभुता, उनकी रचनात्मक शक्ति और काल पर उनके नियंत्रण को उजागर करते हैं।
नामावलि में चंद्र देव को 'साधु पूजित' (संतों द्वारा पूजे जाने वाले), 'जितेंद्रिय' (इंद्रियों को जीतने वाले) और 'शिष्टपालक' (सज्जनों के रक्षक) के रूप में भी स्तुति की जाती है, जो उनके शुद्ध और सुरक्षात्मक स्वरूप को दर्शाता है। 'कष्टदारुकुठारक' (दुखों के वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी) नाम भक्तों के कष्टों को दूर करने की उनकी क्षमता को इंगित करता है। 'क्षीर्णपापाय' और 'क्षय वृद्धि समन्वित' जैसे नाम चंद्र देव की पाप-निवारक शक्ति और उनके कलाओं के घटने-बढ़ने के चक्र को नियंत्रित करने की क्षमता का वर्णन करते हैं। इस स्तोत्र का पाठ चंद्र देव की दिव्य ऊर्जा का आह्वान करता है और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने में सहायता करता है।
इस नामावलि का नियमित पाठ मन को शांति प्रदान करता है, भावनात्मक संतुलन में सुधार करता है, और ज्योतिष में चंद्र की कमजोर स्थिति से उत्पन्न होने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम करता है। यह भक्तों के जीवन में सद्भाव, प्रेम और आध्यात्मिक प्रगति को बढ़ाता है। श्री चंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि केवल नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि चंद्र देव के साथ गहरा संबंध स्थापित करने, उनके दिव्य गुणों का ध्यान करने और उनकी कृपा का आह्वान करने का एक शक्तिशाली साधन है। ऐसा माना जाता है कि इसका प्रतिदिन पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन: चंद्र देव मन के स्वामी होने के कारण, इस नामावलि का पाठ करने से मानसिक तनाव कम होता है, शांति मिलती है और भावनात्मक स्थिरता बढ़ती है।
- स्वास्थ्य में सुधार: चंद्र देव शरीर में तरल पदार्थों और रक्त पर प्रभाव डालते हैं। यह स्तोत्र शरीर के तरल संतुलन को बनाए रखने और पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करने में सहायक होता है।
- संबंधों में सुधार: चंद्र देव माता और पारिवारिक संबंधों को नियंत्रित करते हैं। इस नामावलि के पाठ से परिवार के सदस्यों के साथ संबंध मजबूत होते हैं, प्रेम और सद्भाव बढ़ता है।
- आर्थिक समृद्धि: चंद्र देव समृद्धि और धन से जुड़े हैं। इसका पाठ करने से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है और जीवन में धन व सफलता प्राप्त होती है।
- ज्योतिषीय दोष निवारण: ज्योतिष में चंद्र की कमजोर स्थिति से उत्पन्न होने वाले दोषों को दूर करने में यह नामावलि अत्यंत प्रभावी है। यह ग्रहों के नकारात्मक प्रभावों को कम कर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री चंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि क्या है?
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री चंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस नामावलि का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री चंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि का उद्गम क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
