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श्री चंडिका दळ स्तुतिः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रदुर्गा देवी
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श्री चंडिका दळ स्तुतिः

ॐ नमो भगवति जय जय चामुंडिके, चंडेश्वरि, चंडायुधे, चंडरूपे, तांडवप्रिये, कुंडलीभूतदिङ्नागमंडित गंडस्थले, समस्त जगदंड संहारकारिणि, परे, अनंतानंदरूपे, शिवे, नरशिरोमालालंकृतवक्षःस्थले, महाकपाल मालोज्ज्वल मणिमकुट चूडाबद्ध चंद्रखंडे, महाभीषणि, देवि, परमेश्वरि, ग्रहायुः किल महामाये, षोडशकलापरिवृतोल्लासिते, महादेवासुर समरनिहतरुधिरार्द्रीकृत लंभित तनुकमलोद्भासिताकार संपूर्ण रुधिरशोभित महाकपाल चंद्रांसि निहिता बद्ध्यमान रोमराजी सहित मोहकांची दामोज्ज्वलीकृत नव सारुणी कृत नूपुरप्रज्वलित महीमंडले, महाशंभुरूपे, महाव्याघ्रचर्मांबरधरे, महासर्पयज्ञोपवीतिनि, महाश्मशान भस्मावधूळित सर्वगात्रे, काळि, महाकाळि, कालाग्नि रुद्रकाळि, कालसंकर्षिणि, कालनाशिनि, काळरात्रि, रात्रिसंचारिणि, शवभक्षिणि, नानाभूत प्रेत पिशाचादि गण सहस्र संचारिणि, धगद्धगेत्या भासित मांसखंडे, गात्रविक्षेप कलकल समान कंकाल रूपधारिणि, नानाव्याधि प्रशमनि, सर्वदुष्टशमनि, सर्वदारिद्र्यनाशिनि, मधुमांस रुधिरावसिक्त विलासिनि, सकलसुरासुर गंधर्व यक्ष विद्याधर किन्नर किंपुरुषादिभिः स्तूयमानचरिते, सकलमंत्रतंत्रादि भूताधिकारिणि, सर्वशक्ति प्रधाने, सकललोकभाविनि, सकल दुरित प्रक्षाळिनि, सकललोकैक जननि, ब्रह्माणि माहेश्वरि कौमारि वैष्णवि शंखिनि वाराहि इंद्राणि चामुंडि महालक्ष्मी रूपे, महाविद्ये, योगिनि, योगेश्वरि, चंडिके, महामाये, विश्वेश्वररूपिणि, सर्वाभरणभूषिते, अतल वितल नितल सुतल रसातल तलातल पाताल भूलोक भुवर्लोक सुवर्लोक महर्लोक जनोलोक तपोलोक सत्यलोक चतुर्दश भुवनैक नायिके, ॐ नमः पितामहाय ॐ नमो नारायणाय ॐ नमः शिवायेति सकललोकजाजप्यमाने, ब्रह्म विष्णु शिव दंड कमंडलु कुंडल शंख चक्र गदा परशु शूल पिनाक टंकधारिणि, सरस्वति, पद्मालये, पार्वती, सकल जगत्स्वरूपिणि, महाक्रूरे, प्रसन्नरूपधारिणि, सावित्रि, सर्वमंगळप्रदे, महिषासुरमर्दिनि, कात्यायनि, दुर्गे, निद्रारूपिणि, शर चाप शूल कपाल करवाल खड्ग डमरुकांकुश गदा परशु शक्ति भिंडिवाल तोमर भुशुंडि मुसल मुद्गर प्रास परिघ दंडायुध दोर्दंड सहस्रे, इंद्राग्नि यम निर्ऋति वरुण वायु कुबेरेशान प्रधानशक्ति हेतुभूते, चंद्रार्कवह्निनयने, सप्तद्वीप समुद्रोपर्युपरि व्याप्ते, ईश्वरि, महासचराचर प्रपंचांतरुधिरे, महाप्रभावे, महाकैलास पर्वतोद्यान वनक्षेत्र नदीतीर्थ देवताद्यायतनालंकृत मेदिनी नायिके, वसिष्ठ वामदेवादि सकल मुनिगण वंद्यमान चरणारविंदे, द्विचत्वारिंशद्वर्ण माहात्म्ये, पर्याप्त वेदवेदांगाद्यनेक शास्त्राधारभूते, शब्द ब्रह्ममये, लिपि देवते, मातृकादेवि, चिरं मां रक्ष रक्ष, मम शत्रून् हुंकारेण नाशय नाशय, मम भूत प्रेत पिशाचादीनुच्चाटय उच्चाटय, स्तंभय स्तंभय, समस्त ग्रहान्वशीकुरु वशीकुरु, स्तोभय स्तोभय, उन्मादयोन्मादय, संक्रामय संक्रामय, विध्वंसय विध्वंसय, विमर्दय विमर्दय, विराधय विराधय विद्रावय विद्रावय, सकलारातीन्मूर्ध्नि स्फोटय स्फोटय, मम शत्रून् शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत्स्वप्न सुषुप्त्यवस्थास्वस्मांछत्रुमृत्यु ज्वरादि नाना रोगेभ्यो नानाभिचारेभ्यः परकर्म परमंत्र परयंत्र परतंत्र परमंत्रौषध शल्यशून्य क्षुद्रेभ्यः सम्यग्रक्ष रक्ष, ॐ श्रीं ह्रीं, मम सर्वशत्रु प्राणसंहार कारिणि हुं फट् स्वाहा ||इति श्री चंडिका दळ स्तुतिः||

अर्थ

श्री चंडिका दळ स्तुतिः एक अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है, जो सर्वोच्च शक्ति स्वरूपा देवी चंडिका का प्रत्यक्ष स्तुतिगान करता है। यह स्तोत्र देवी के भयंकर, सौम्य और सर्वव्यापी रूपों का वर्णन करता है, उनकी अनंत शक्ति और जगत्-रक्षा की क्षमता को उजागर करता है। यह भक्तों को सभी प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने वाला एक महाकवच है। देवी की यह स्तुति आध्यात्मिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली है और भक्तों को भय, दुख तथा बाधाओं से मुक्त करती है।

इस स्तोत्र में देवी को चामुंडी, चंडेश्वरी, चंडायुधधारिणी, महाकाली, कालाग्नि रुद्रकाली, कालसंकर्षिणी, कालनाशिनी, कालरात्रि जैसे भयंकर रूपों में स्तुति की जाती है। वे नर-सिरों की माला धारण करती हैं, व्याघ्रचर्म पहनती हैं, महासर्प को यज्ञोपवीत के रूप में धारण करती हैं और श्मशान भस्म से अपने शरीर को लेपित करती हैं। वे हजारों भूत, प्रेत, पिशाच गणों के साथ विचरण करती हैं और शवभक्षिणी हैं। ये रूप उनकी सृष्टि, स्थिति, लय की क्षमता और दुष्ट शक्तियों को नष्ट करने के उनके अटूट संकल्प को दर्शाते हैं। उनका तांडव नृत्य समस्त लोकों को कंपा देता है और उनकी मात्र उपस्थिति रोगों, दुखों, दरिद्रता और बुरी शक्तियों का नाश करती है।

चंडिका देवी को केवल भयानक रूप में ही नहीं, बल्कि अनंत आनंद स्वरूपिणी, परमेश्वरी और समस्त लोकों की जननी के रूप में भी वर्णित किया गया है। वे ब्रह्मांडों का संहार करने वाली शक्ति हैं, इंद्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान आदि अष्टदिग्पालकों के प्राणसत्व को नियंत्रित करने वाली हेतुभूत शक्ति हैं। ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडी - इन सप्तमातृका रूपों में भी उनकी पूजा की जाती है। वे सभी मंत्र-तंत्रों की अधिपति, योगिनी, योगेश्वरी, सर्वाभरणभूषिता, विश्वेश्वरी और चौदह लोकों की अधिपति हैं। वेद, वेदांगों का मूल आधार होने के कारण, वे शब्दब्रह्ममय रूप में, अक्षरमाला देवता के रूप में, मातृका देवी के रूप में और लोकजननी के रूप में उनका स्थान सर्वोच्च है।

इस स्तोत्र का अंतिम भाग देवी को समर्पित शौर्यपूर्ण प्रार्थनाओं को समाहित करता है। शत्रुओं को नष्ट करने, दुष्ट शक्तियों को उखाड़ फेंकने, ग्रह दोषों को दूर करने, पर-मंत्र-पर-यंत्रों के प्रभाव को रोकने, ज्वर, मृत्यु, दुर्भाग्य, अभिचार जैसे दोषों से रक्षा करने के लिए देवी का आह्वान किया जाता है। यह विश्वास निहित है कि उनके मात्र हुंकार से ही शत्रु नष्ट हो जाते हैं। यह स्तोत्र आश्वासन देता है कि भक्त चाहे निद्रा, जागरण या सुषुप्ति किसी भी अवस्था में हो, देवी की अटूट सुरक्षा उसे हर पल घेरे रहती है। यह स्तुति भक्तों को पूर्ण विश्वास और अभय प्रदान करती है।

लाभ (Benefits):

  • शत्रु नाश और विरोधियों का निवारण: इस स्तोत्र का पाठ शत्रुओं और आपकी प्रगति में बाधक सभी बाधाओं को नष्ट करता है।
  • दुष्ट शक्तियों का उच्चाटन: जादू-टोना, भूत-प्रेत, पिशाचों जैसी नकारात्मक शक्तियों से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है और उनके प्रभाव को समाप्त करता है।
  • ग्रह दोष और रोग निवारण: ज्योतिषीय दोषों, ग्रह पीड़ाओं और शारीरिक तथा मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाता है।
  • दरिद्रता नाश और समृद्धि: गरीबी को दूर कर, धन, समृद्धि और सुख-शांति लाता है।
  • समग्र सुरक्षा: जीवन के सभी चरणों में, नींद में, जागृति में, या सुषुप्ति में भी देवी की अटूट सुरक्षा प्राप्त होती है, जिससे सभी खतरों से बचाव होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री चंडिका दळ स्तुतिः क्या है?
श्री चंडिका दळ स्तुतिः देवी चंडिका के भयंकर और सर्वशक्तिशाली रूपों का स्तुतिगान करने वाला एक अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है। यह देवी को जगत्-रक्षक और दुष्ट-संहारक के रूप में वर्णित करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से दुर्गा नवरात्रि, अमावस्या, पूर्णिमा या किसी भी शुभ दिन पर किया जा सकता है। प्रतिदिन पाठ करना देवी की कृपा प्राप्त करने का उत्तम मार्ग है।
श्री चंडिका दळ स्तुतिः के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ शत्रु नाश, दुष्ट शक्तियों का उच्चाटन, ग्रह दोषों का निवारण, दरिद्रता का नाश और सभी रोगों से मुक्ति प्रदान करता है। यह भक्तों को पूर्ण सुरक्षा और समृद्धि देता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
देवी पर अटूट भक्ति और श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जो कठिनाई में हों, शत्रुओं से पीड़ित हों या सुरक्षा चाहते हों, वे इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
शुभ फल प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र का प्रतिदिन 11, 21, 51 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। संकल्प के साथ निश्चित संख्या में पाठ करना अधिक प्रभावी होता है।
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
श्री चंडिका दळ स्तुतिः शक्तिशाली तांत्रिक ग्रंथों से उत्पन्न एक प्राचीन स्तोत्र है। यह देवी चंडिका की गहरी आराधना और उनकी असीम शक्ति को समाहित करता है।

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