श्री भास्कर स्तोत्रं
(अथ पौराणिकैः श्लोकै राष्ट्रै द्वादशाभिः शुभैः |
प्रणमेद्दंडवद्भानुं साष्टांगं भक्तिसंयुतः ||)
हंसाय भुवनध्वांतध्वंसायाऽमिततेजसे |
हंसवाहनरूपाय भास्कराय नमो नमः || 1 ||
वेदांगाय पतंगाय विहंगारूढगामिने |
हरिद्वर्णतुरंगाय भास्कराय नमो नमः || 2 ||
भुवनत्रयदीप्ताय भुक्तिमुक्तिप्रदाय च |
भक्तदारिद्र्यनाशाय भास्कराय नमो नमः || 3 ||
लोकालोकप्रकाशाय सर्वलोकैकचक्षुषे |
लोकोत्तरचरित्राय भास्कराय नमो नमः || 4 ||
सप्तलोकप्रकाशाय सप्तसप्तिरथाय च |
सप्तद्वीपप्रकाशाय भास्कराय नमो नमः || 5 ||
मार्तांडाय द्युमणये भानवे चित्रभानवे |
प्रभाकराय मित्राय भास्कराय नमो नमः || 6 ||
नमस्ते कमलानाथ नमस्ते कमलप्रिय |
नमः कमलहस्ताय भास्कराय नमो नमः || 7 ||
नमस्ते ब्रह्मरूपाय नमस्ते विष्णुरूपिणे |
नमस्ते रुद्ररूपाय भास्कराय नमो नमः || 8 ||
सत्यज्ञानस्वरूपाय सहस्रकिरणाय च |
गीर्वाणभीतिनाशाय भास्कराय नमो नमः || 9 ||
सर्वदुःखोपशांताय सर्वपापहराय च |
सर्वव्याधिविनाशाय भास्कराय नमो नमः || 10 ||
सहस्रपत्रनेत्राय सहस्राक्षस्तुताय च |
सहस्रनामधेयाय भास्कराय नमो नमः || 11 ||
नित्याय निरवद्याय निर्मलज्ञानमूर्तये |
निगमार्थप्रकाशाय भास्कराय नमो नमः || 12 ||
आदिमध्यांतशून्याय वेदवेदांतवेदिने |
नादबिंदुस्वरूपाय भास्कराय नमो नमः || 13 ||
निर्मलज्ञानरूपाय रम्यतेजः स्वरूपिणे |
ब्रह्मतेजः स्वरूपाय भास्कराय नमो नमः || 14 ||
नित्यज्ञानाय नित्याय निर्मलज्ञानमूर्तये |
निगमार्थस्वरूपाय भास्कराय नमो नमः || 15 ||
कुष्ठव्याधिविनाशाय दुष्टव्याधिहराय च |
इष्टार्थदायिने तस्मै भास्कराय नमो नमः || 16 ||
भवरोगैकवैद्याय सर्वरोगापहारिणे |
एकनेत्रस्वरूपाय भास्कराय नमो नमः || 17 ||
दारिद्र्यदोषनाशाय घोरपापहराय च |
दुष्टशिक्षणधुर्याय भास्कराय नमो नमः || 18 ||
होमानुष्ठानरूपेण कालमृत्युहराय च |
हिरण्यवर्णदेहाय भास्कराय नमो नमः || 19 ||
सर्वसंपत्प्रदात्रे च सर्वदुःखविनाशिने |
सर्वोपद्रवनाशाय भास्कराय नमो नमः || 20 ||
नमो धर्मनिधानाय नमः सुकृतसाक्षिणे |
नमः प्रत्यक्षरूपाय भास्कराय नमो नमः || 21 ||
सर्वलोकैकपूर्णाय कालकर्माघहारिणे |
नमः पुण्यस्वरूपाय भास्कराय नमो नमः || 22 ||
द्वंद्वव्याधिविनाशाय सर्वदुःखविनाशिने |
नमस्तापत्रयघ्नाय भास्कराय नमो नमः || 23 ||
कालरूपाय कळ्याणमूर्तये कारणाय च |
अविद्याभयसंहर्त्रे भास्कराय नमो नमः || 24 ||
इति भास्कर स्तोत्रं ||
अर्थ
श्री भास्कर स्तोत्रं भगवान सूर्यदेव की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। यह 24 श्लोकों का एक दिव्य संग्रह है, जिसमें सूर्य भगवान के अपार तेज, परब्रह्म स्वरूप, लोकपालकत्व, रोगनाशक शक्ति, पाप-पुण्य विवेक और धर्मप्रचारक शक्ति - इन सभी आयामों का भक्तिमय वर्णन किया गया है। प्रत्यक्ष देवता सूर्य संपूर्ण जगत के प्राण और ऊर्जा के स्रोत हैं, और इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को अतुलनीय लाभ प्रदान करता है। यह केवल सूर्य के गुणों का बखान नहीं, बल्कि उनकी दिव्य शक्तियों का आह्वान करने का एक शक्तिशाली माध्यम है।
सूर्य हंसवाहन पर आरूढ़ होकर अपनी दिव्य प्रभा से समस्त लोकों के अंधकार को नष्ट करते हैं। वेदों के अंग स्वरूप, हरे रंग के घोड़ों पर सवार होकर, अपने रथ में संचरण करते हैं। सृष्टि की गति के आधारभूत, वे लोकों को भुक्ति (भौतिक सुख) और मुक्ति (आध्यात्मिक मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाले दयालु देवता हैं। सूर्य लोकचक्षु के रूप में पूरे जगत का अवलोकन करते हैं, उनके तेज से ही सप्त लोक और सप्त द्वीप प्रकाशित होते हैं। सूर्य की प्रत्येक किरण जगत में जीवन और ज्ञान का संचार करती है।
मार्तंड, भानु, चित्रभानु, प्रभाकर और मित्र जैसे विभिन्न रूपों में सूर्य उदय-अस्त के चक्र को संचालित करते हुए जगत को जीवन और शक्ति प्रदान करते हैं। कमल के स्वामी, वेदों द्वारा ज्ञात, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र - इन त्रिमूर्तियों के रूप में भी सूर्यत्व ही परिलक्षित होता है। सहस्त्र किरणों के स्वामी, वे शिव और शक्ति के मिलन स्वरूप हैं। सूर्य समस्त दुखों, व्याधियों, पापों, दरिद्रता और दुष्ट दोषों को दूर करने वाली महौषधि हैं। उनका प्रकाश अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है।
सहस्त्र कमल-नेत्रों वाले, सहस्त्र नामों से प्रसिद्ध, निर्मल ज्ञानमूर्ति सूर्य वेदों के अर्थ को प्रकाशित करने वाले हैं। वे आदि और अंत रहित हैं, नादबिंदु स्वरूप हैं - सृष्टि में ध्वनि, प्रकाश और प्राण तत्व के मूल कारण हैं। अज्ञान रूपी भय को नष्ट कर धर्म की स्थापना करने की शक्ति सूर्य में ही निहित है। दुष्ट व्याधियाँ, कुष्ठ रोग, अकाल मृत्यु, दरिद्रता और शत्रु दोष सूर्य के प्रखर तेज के सामने फीके पड़ जाते हैं। होमादि अनुष्ठानों के रूप में वे पित्त, बल और कांति धातु को पुनर्जीवित कर जीवन शक्ति बढ़ाते हैं। सूर्य केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी प्रदान करते हैं।
सूर्य की कृपा प्राप्त करने वाला व्यक्ति सभी प्रकार की संपत्ति, शांति, यश, धैर्य, विजय और उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करता है। प्रत्यक्ष देवता सूर्य सभी कर्मों के साक्षी बनकर उनके फल प्रदान करते हैं। इस स्तोत्र का पाठ सभी पापों के क्षय, धर्म की वृद्धि और सौभाग्य के लिए मार्गदर्शक बनता है। यह स्तोत्र सूर्य को ज्योति, जीवन, धर्म, ज्ञान और शांति के साकार रूप में प्रस्तुत करता है। इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों पर सूर्यदेव का आशीर्वाद सदैव बना रहता है, और उनका जीवन सफलता तथा समृद्धि से परिपूर्ण होता है।
लाभ (Benefits):
- समस्त रोगों का नाश: कुष्ठ रोग, दरिद्रता और अन्य दुष्ट दोषों को दूर करके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करता है।
- पाप क्षय और धर्म वृद्धि: पिछले और वर्तमान जन्म के पापों को समाप्त कर, धर्म में निष्ठा बढ़ाता है और ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है।
- दीर्घायु और शक्ति: सूर्य की ऊर्जा से दीर्घायु, शारीरिक बल और आंतरिक जीवन शक्ति में वृद्धि होती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
- सफलता और शांति: जीवन में उत्साह, विजय, मानसिक शांति और सौभाग्य लाता है, सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करने में सहायता करता है।
- अज्ञान का निवारण: अज्ञान, भय और मानसिक अंधकार को दूर करके स्पष्टता, साहस और आत्मविश्वास प्रदान करता है, सकारात्मक सोच को प्रेरित करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री भास्कर स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री भास्कर स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री भास्कर स्तोत्रं का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री भास्कर स्तोत्रं का उद्गम कहाँ से है?
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