श्री भास्कर सप्तकं (सप्तसप्तिसप्तकं)
ध्वांतदंतिकेसरी हिरण्यकांतिभासुरः
कोटिरश्मिभूषितस्तमोहरोऽमितद्युतिः |
वासरेश्वरो दिवाकरः प्रभाकरः खगो
भास्करः सदैव पातु मां विभावसू रविः || 1 ||
यक्षसिद्धकिन्नरादिदेवयोनिसेवितं
तापसैरृषीश्वरैश्च नित्यमेव वंदितं |
तप्तकांचनाभमर्कमादिदैवतं रविं
विश्वचक्षुषं नमामि सादरं महाद्युतिं || 2 ||
भानुना वसुंधरा पुरैव निर्मिता तथा
भास्करेण तेजसा सदैव पालिता मही |
भूर्विलीनतां प्रयाति काश्यपेयवर्चसा
तं रवि भजाम्यहं सदैव भक्तिचेतसा || 3 ||
अंशुमालिने तथा च सप्तसप्तये नमो
बुद्धिदायकाय शक्तिदायकाय ते नमः |
अक्षराय दिव्यचक्षुषेऽमृताय ते नमः
शंखचक्रभूषणाय विष्णुरूपिणे नमः || 4 ||
भानवीयभानुभिर्नभस्तलं प्रकाशते
भास्करस्य तेजसा निसर्ग एष वर्धते |
भास्करस्य भा सदैव मोदमातनोत्यसौ
भास्करस्य दिव्यदीप्तये सदा नमो नमः || 5 ||
अंधकारनाशकोऽसि रोगनाशकस्तथा
भो ममापि नाशयाशु देहचित्तदोषतां |
पापदुःखदैन्यहारिणं नमामि भास्करं
शक्तिधैर्यबुद्धिमोददायकाय ते नमः || 6 ||
भास्करं दयार्णवं मरीचिमंतमीश्वरं
लोकरक्षणाय नित्यमुद्यतं तमोहरं |
चक्रवाकयुग्मयोगकारिणं जगत्पतिं
पद्मिनीमुखारविंदकांतिवर्धनं भजे || 7 ||
सप्तसप्तिसप्तकं सदैव यः पठेन्नरो
भक्तियुक्तचेतसा हृदि स्मरन् दिवाकरं |
अज्ञतातमो विनाश्य तस्य वासरेश्वरो
नीरुजं तथा च तं करोत्यसौ रविः सदा || 8 ||
इति श्री आपटीकरविरचितं सप्तसप्तिसप्तकं नाम श्री भास्कर सप्तकं |
अर्थ
श्री भास्कर सप्तकं, जिसे सप्तसप्तिसप्तकं भी कहा जाता है, भगवान सूर्य की सात प्रमुख महिमाओं, सात शक्तियों और सात दिव्य रूपों का अद्भुत स्तुतिगान है। महाकवि आपतिकर द्वारा रचित यह सप्तक सूर्य के अद्भुत प्रकाश, सृष्टि और पालन में उनकी भूमिका, तथा भक्तों को उनके द्वारा दिए गए अनुग्रहों का हृदयस्पर्शी वर्णन करता है। यह केवल सूर्य का गुणगान नहीं, बल्कि उनकी दिव्य शक्ति को हमारे जीवन में आमंत्रित करने वाली एक शक्तिशाली प्रार्थना है।
सूर्य अंधकार को चीरने वाले सिंह (ध्वांतदंतिकेसरी) के समान प्रकाशित होते हैं। वे करोड़ों किरणों से सुशोभित होकर, अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर, जगत को अपरिमित तेज से भर देते हैं। वे वासरेस्वर, दिवाकर, प्रभाकर, खग और विभावसु – इन सभी रूपों में लोक का पालन करते हैं। उनका प्रकाश केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है, जो हमारे मन के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
यक्षों, सिद्धों, किन्नरों, देवताओं और महाऋषियों द्वारा नित्य पूजित आदिकाल से देवता सूर्य हैं। वे तपे हुए सोने (तप्तकांचनाभं) के समान निर्मल होकर प्रकाशित होते हुए विश्व की आँख (विश्वचक्षुशं) बनकर खड़े हैं। पृथ्वी की सृष्टि और पालन में सूर्य ही आधार हैं। पृथ्वी सूर्य के प्रकाश से उत्पन्न हुई, उनके प्रकाश से ही स्थिर है, और उनके प्रकाश में ही विलीन हो जाती है। वे अंशुमाली, सप्तसप्ति स्वरूप, बुद्धि और शक्ति के दाता, अमृत स्वरूप, शंख-चक्र धारण किए हुए विष्णु रूपी ही हैं।
सूर्य की दिव्य किरणों से आकाश निर्मल होता है; संसार शक्ति से परिपूर्ण होता है। भास्कर की दिव्य दीप्ति आत्मा को आनंद प्रदान करती है। वे अंधकारनाशक और रोगनाशक हैं। शरीर, मन और आत्मा के दोषों को दूर करने वाली औषधि ही सूर्य हैं। वे पाप, शोक और दीनता को मिटाकर शक्ति, धैर्य, ज्ञान और संतोष प्रदान करने वाले करुणा मूर्ति हैं। मार्तंड चक्रवाक पक्षियों को प्रातःकाल का आनंद प्रदान करते हुए जगत को शोभा देते हैं; वे कमलों के मुख को प्रकाशित करते हैं।
अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस सप्तक का नित्य सत्य भक्ति के साथ जप करता है, सूर्य उसे अज्ञान के अंधकार से मुक्त कर स्वास्थ्य, प्रकाश, मानसिक निर्मलता और दीर्घायु प्रदान करते हैं। हृदय में दिवाकर की पूजा करने वाले को सूर्य निरोगी (रोगरहित) करते हैं। यह स्तोत्र भक्त के लिए सूर्य के रक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।
लाभ (Benefits):
- अज्ञान का नाश और ज्ञानोदय: इस स्तोत्र के पाठ से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है, जिससे मन में स्पष्टता और विवेक आता है।
- शारीरिक-मानसिक शुद्धि: सूर्य देव की कृपा से शरीर, मन और आत्मा के पाप, दोष और रोग नष्ट होते हैं, जिससे आंतरिक शुद्धि प्राप्त होती है।
- शक्ति और साहस में वृद्धि: भास्कर सप्तकं का पाठ करने से शारीरिक और मानसिक शक्ति, धैर्य, बुद्धि और उत्साह बढ़ता है, चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित होती है।
- सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति: सूर्य देव की कृपा से सौभाग्य, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त होती है, जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- सूर्य रक्षा कवच: यह स्तोत्र भक्त के लिए सूर्य के दिव्य रक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जो सभी प्रकार की बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री भास्कर सप्तकं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री भास्कर सप्तकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र की उत्पत्ति या रचनाकार कौन हैं?
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