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श्री आदित्य स्तवं

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श्री आदित्य स्तवं

ब्रह्मोवाच |
नमस्ये यन्मयं सर्वमेतत्सर्वमयश्च यः |
विश्वमूर्तिः परंज्योतिर्यत्तद्ध्यायंति योगिनः || 1 ||

य ऋङ्मयो यो यजुषां निधानं
साम्नां च यो योनिरचिंत्यशक्तिः |
त्रयीमयः स्थूलतयार्धमात्रा
परस्वरूपो गुणपारयोग्यः || 2 ||

त्वां सर्वहेतुं परमं च वेद्य-
-माद्यं परं ज्योतिरवेद्यरूपं |
स्थूलं च देवात्मतया नमस्ये
भास्वन् तमाद्यं परमं परेभ्यः || 3 ||

सृष्टिं करोमि यदहं तवशक्तिराद्या
तत्प्रेरितो जलमहीपवनाग्निरूपां |
तद्देवतादिविषयां प्रणवाद्यशेषां
नात्मेच्छया स्थितिलयावपि तद्वदेव || 4 ||

वह्निस्त्वमेव जलशोषणतः पृथिव्याः
सृष्टिं करोषि जगतां च तथाद्य पाकं |
व्यापी त्वमेव भगवन् गगनस्वरूपं
त्वं पंचधा जगदिदं परिपासि विश्वं || 5 ||

यज्ञैर्यजंति परमात्मविदो भवंतं
विष्णुस्वरूपमखिलेष्टिमयं विवस्वन् |
ध्यायंति चापि यतयो नियतात्मचित्ताः
सर्वेश्वरं परममात्मविमुक्तिकामा || 6 ||

नमस्ते देवरूपाय यज्ञरूपाय ते नमः |
परब्रह्मस्वरूपाय चिंत्यमानाय योगिभिः || 7 ||

उपसंहर तेजो यत्तेजसः संहतिस्तव |
सृष्टेर्विधाताय विभो सृष्टौ चाऽहं समुद्यतः || 8 ||

मार्कंडेय उवाच |
इत्येवं संस्तुतो भास्वान् ब्रह्मणा सर्गकर्तृणा |
उपसंहृतवांस्तेजः परं स्वल्पमधारयत् || 9 ||

चकार च ततः सृष्टिं जगतः पद्मसंभवः |
तथा तेषु महाभागः पूर्वकल्पांतरेषु वै || 10 ||

देवासुरादीन्मर्त्यांश्च पश्वादीन्वृक्षवीरुधः |
ससर्ज पूर्ववद्ब्रह्मा नरकांश्च महामुने || 11 ||

इति श्रीमार्कंडेयपुराणे शततमोऽध्याये ब्रह्म कृत श्री आदित्य स्तवं |

अर्थ

मार्कण्डेय पुराण में वर्णित यह 'श्री आदित्य स्तवं' एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जिसमें ब्रह्माजी भगवान सूर्य को सृष्टि का मूल कारण, परम ज्योति, विश्वमूर्ति, वेदों का स्वरूप, यज्ञ का साकार रूप और परब्रह्म के प्रत्यक्ष रूप में स्तुति करते हैं। स्तोत्र के प्रारंभ में, ब्रह्माजी घोषणा करते हैं कि 'यह संपूर्ण जगत तुम ही हो, तुमसे ही उत्पन्न हुआ है और तुम में ही विलीन हो जाता है।' सूर्य को विश्वव्यापी, योगियों द्वारा ध्यानी जाने वाली परम ज्योति, और ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद का उद्गम और सार बताया गया है। उनकी शक्ति अकल्पनीय और अनंत है।

वेदों का स्थूल रूप और सूक्ष्म तत्व दोनों ही सूर्य से उत्पन्न होते हैं। उनके गुणों को समझना आसान नहीं है – यह एक अपार, अवर्णनीय शक्ति है। सूर्य सभी कारणों का कारण हैं। ब्रह्माजी विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं कि 'भले ही मैं सृष्टि करता हुआ प्रतीत होता हूँ, परंतु वास्तविक सृजनात्मक शक्ति आपकी ही है।' जल का वाष्पीकरण, वर्षा, अग्नि, पृथ्वी की ऊष्मा, वायु की गति – ये सभी सूर्य की शक्ति से उत्पन्न होते हैं। पृथ्वी, आकाश, अग्नि, वायु, जल – इन पंचभूतों में व्याप्त होकर ब्रह्मांड की रक्षा करना उनका कार्य बताया गया है।

वेदज्ञ सूर्य को विष्णु के रूप में, यज्ञमय के रूप में पूजते हैं। नियम पालन करने वाले यति और मोक्ष की आकांक्षा रखने वाले उन्हें परब्रह्म के रूप में ध्यान करते हैं। स्तोत्र वर्णन करता है कि सूर्य देव रूप, यज्ञ रूप और परब्रह्म स्वरूप – इन तीन रूपों में लोकों का पालन करते हैं। इसके बाद ब्रह्माजी सूर्य से विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करते हैं – 'मैं सृष्टि करने के लिए तैयार हूँ; कृपया अपनी कुछ तेजस्विता को वापस ले लें।'

ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर, सूर्य अपनी असीम तेजस्विता का केवल एक भाग वापस लेते हैं और अपनी चमक को इस तरह से शांत करते हैं कि संसार की सृष्टि संभव हो सके। पुराण बताता है कि इसके बाद ब्रह्माजी ने पूर्व कल्पों की तरह ही लोकों में देवता, असुर, मनुष्य, प्राणी, वृक्ष, पशु और यहाँ तक कि नर्क के जीवों तक विभिन्न सृष्टियों का निर्माण किया। इस स्तोत्र से स्पष्ट होता है: सूर्य सृष्टि का हृदय हैं, यज्ञ की आत्मा हैं, वेदों का मूल हैं, लोकों के रक्षक हैं और परमात्मा तत्व का प्रत्यक्ष रूप हैं।

लाभ (Benefits):

  • पाप क्षय और अज्ञान का नाश: इस स्तोत्र के पाठ से किए गए पापों का नाश होता है और अज्ञान दूर होकर आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है।
  • स्वास्थ्य और ऊर्जा: सूर्य की शक्ति का आह्वान करने से शारीरिक ऊर्जा, उत्तम स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे शारीरिक दोष शांत होते हैं।
  • आत्मविश्वास और मानसिक शांति: सूर्य की प्रार्थना से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, मन को शांति मिलती है और आंतरिक दुखों का निवारण होकर मानसिक स्थिरता आती है।
  • दिव्य सुरक्षा और समृद्धि: सूर्य देव की कृपा से सभी प्रकार की दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है, और जीवन में समृद्धि तथा सफलता आती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ योगियों द्वारा ध्यानी जाने वाली परम ज्योति का अनुभव करने में मदद करता है, जिससे आध्यात्मिक प्रगति और मोक्ष का मार्ग सुगम होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री आदित्य स्तवं क्या है?
श्री आदित्य स्तवं मार्कण्डेय पुराण में वर्णित एक पवित्र स्तोत्र है, जिसमें ब्रह्माजी भगवान सूर्य को सृष्टि का मूल कारण, परम ज्योति और परब्रह्म के प्रत्यक्ष रूप में स्तुति करते हैं। यह सूर्य की दिव्य शक्ति और महत्व को दर्शाता है।
श्री आदित्य स्तवं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सूर्योदय के समय, स्नान के बाद शुद्ध मन से और सूर्य की ओर मुख करके करना उत्तम माना जाता है। यह सूर्य की ऊर्जा को आकर्षित करने में सहायक होता है।
श्री आदित्य स्तवं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से पापों का नाश होता है, उत्तम स्वास्थ्य, शारीरिक ऊर्जा, आत्मविश्वास और मानसिक शांति मिलती है। यह आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाता है और दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है।
श्री आदित्य स्तवं का पाठ किसे करना चाहिए?
जो लोग सूर्य देव की कृपा, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन में सफलता की कामना करते हैं, वे इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। यह विशेष रूप से सूर्य ग्रह के दोषों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए लाभकारी है।
श्री आदित्य स्तवं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
नियमित रूप से 11, 21, या 108 बार पाठ करना शुभ माना जाता है। किसी विशेष संकल्प के साथ पाठ करते समय, एक निश्चित संख्या में पाठ करने से अधिक फल प्राप्त होता है।
श्री आदित्य स्तवं का उद्गम क्या है?
श्री आदित्य स्तवं मार्कण्डेय पुराण का एक महत्वपूर्ण भाग है। ब्रह्माजी ने सृष्टि कार्य आरंभ करने से पहले, सूर्य की अत्यधिक तेजस्विता को कम करने के लिए प्रार्थना करते हुए इस स्तोत्र की रचना की थी।

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