नारायणि स्तुति
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते |
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते || 1 ||
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि |
विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते || 2 ||
सर्वमंगळमांगळ्ये शिवे सर्वार्थसाधिके |
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते || 3 ||
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि |
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते || 4 ||
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे |
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते || 5 ||
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि |
कौशांभःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते || 6 ||
त्रिशूलचंद्राहिधरे महावृषभवाहिनि |
माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तुते || 7 ||
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे |
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते || 8 ||
शंखचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे |
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते || 9 ||
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे |
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते || 10 ||
नृसिंहरूपेणोग्रेण हंतुं दैत्यान् कृतोद्यमे |
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते || 11 ||
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले |
वृत्रप्राणहरे चैंद्रि नारायणि नमोऽस्तु ते || 12 ||
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले |
घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते || 13 ||
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे |
चामुंडे मुंडमथने नारायणि नमोऽस्तु ते || 14 ||
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे |
महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते || 15 ||
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि |
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तुते || 16 ||
अर्थ
नारायणि स्तुति देवी महात्म्य में वर्णित एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह जगज्जननी भगवती नारायणी को सृष्टि, स्थिति और संहार की परम शक्ति के रूप में वर्णित करता है। वे समस्त प्राणियों के हृदय में बुद्धि, ज्ञान और विवेक के रूप में निवास करती हैं, और उन्हें स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं। कालचक्र को चलाने वाली, विश्व के प्रत्येक क्षण से लेकर महाकल्पों तक के परिवर्तन को नियंत्रित करने वाली शक्ति भी वे ही हैं, ऐसा यह स्तोत्र उद्घोष करता है।
यह स्तोत्र देवी को सर्वमंगलकारिणी, शुभप्रदा, समस्त मनोरथों को सिद्ध करने वाली के रूप में महिमामंडित करता है। शरणागतों की रक्षा करने वाली, त्रयम्बक की माता गौरी के रूप में नारायणी समस्त संसार की आश्रयदात्री हैं। वे तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) की आधार हैं, सनातनी हैं, और अपनी अनंत शक्ति से पूरे ब्रह्मांड का संचालन करती हैं। स्तोत्र में नारायणी के विभिन्न दिव्य रूपों—ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, इंद्राणी, चामुंडा, लक्ष्मी, सरस्वती, महामाया, मेधा, ध्रुवा—का वर्णन किया गया है। यह दर्शाता है कि ये सभी देवियाँ वास्तव में एक ही परम शक्ति नारायणी के विभिन्न स्वरूप और अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं, उनकी अनंत ऊर्जा की किरणें हैं।
भक्तों की रक्षा और अधर्म का नाश करने के लिए देवी विभिन्न अवतार धारण करती हैं। वे दैत्यों का संहार कर लोकों को पीड़ा से मुक्त करती हैं, धर्म की स्थापना करती हैं, और निरंतर सृष्टि का कल्याण करती हैं। शरणागतों के दुःखों को दूर कर उन्हें शांति, संपत्ति, धैर्य और ज्ञान प्रदान करने वाली भी वे ही हैं। कुल मिलाकर, नारायणि स्तुति दिव्य शक्ति की समग्रता, मातृ करुणा, शक्ति के विकास और सुरक्षा के अधिकार को अत्यंत सुंदरता से व्यक्त करती है। इसका पाठ शांति, शक्ति, संरक्षण और अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
लाभ (Benefits):
- शारीरिक और मानसिक सुरक्षा, शांति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ शरीर और मन को दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे आंतरिक शांति की प्राप्ति होती है।
- दुष्ट शक्तियों और दोषों का निवारण: देवी नारायणी की कृपा से जीवन से नकारात्मक शक्तियां, दोष और बुरी नज़र के प्रभाव समाप्त होते हैं।
- शक्ति, ज्ञान और साहस की वृद्धि: देवी की आराधना भक्तों में आत्मविश्वास, ज्ञान, बुद्धि और अदम्य साहस का संचार करती है।
- देवी अनुग्रह, ऐश्वर्य और धर्मबल: नारायणी के आशीर्वाद से जीवन में ऐश्वर्य, समृद्धि और धार्मिक शक्ति की वृद्धि होती है, जिससे सभी शुभ कार्य सिद्ध होते हैं।
- ग्रह दोष और भय का शमन: ग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों और सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है, मन में स्थिरता और निर्भीकता आती है।
- शरणागतों की इच्छाओं की पूर्ति: जो भक्त श्रद्धापूर्वक देवी की शरण लेते हैं, उनकी सभी न्यायोचित मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, और उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नारायणि स्तुति क्या है?
नारायणि स्तुति का पाठ कब करना चाहिए?
नारायणि स्तुति के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
नारायणि स्तुति का पाठ कौन कर सकता है?
नारायणि स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
नारायणि स्तुति का मूल स्रोत क्या है?
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