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श्री दुर्गा स्तोत्रं (श्रीकृष्ण कृतं)

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रदुर्गा देवी
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श्री दुर्गा स्तोत्रं (श्रीकृष्ण कृतं)

श्रीकृष्ण उवाच |
त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी |
त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका || 1 ||

कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयं |
परब्रह्मस्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी || 2 ||

तेजः स्वरूपा परमा भक्तानुग्रविग्रहा |
सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा || 3 ||

सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया |
सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमंगळमंगळा || 4 ||

सर्वबुद्धिस्वरूपा च सर्वशक्तिस्वरूपिणी |
सर्वज्ञानप्रदा देवी सर्वज्ञा सर्वभाविनी || 5 ||

त्वं स्वाहा देवदाने च पितृदाने स्वधा स्वयं |
दक्षिणा सर्वदाने च सर्वशक्तिस्वरूपिणी || 6 ||

निद्रा त्वं च दया त्वं च तृष्णा त्वं चात्मनः प्रिया |
क्षुत् क्षांतिः शांतिरीशा च कांतिस्तुष्टिश्च शाश्वती || 7 ||

श्रद्धा पुष्टिश्च तंद्रा च लज्जा शोभा दया तथा |
सतां संपत्स्वरूपा श्रीर्विपत्तिरसतामिह || 8 ||

प्रीतिरूपा पुण्यवतां पापिनां कलहांकुरा |
शश्वत्कर्ममयी शक्तिः सर्वदा सर्वजीविनां || 9 ||

देवेभ्यः स्वपदो दात्री धातुर्धात्री कृपामयी |
हिताय सर्वदेवानां सर्वासुरविनाशिनी || 10 ||

योगिनिद्रा योगरूपा योगदात्री च योगिनां |
सिद्धिस्वरूपा सिद्धानां सिद्धिदा सिद्धयोगिनी || 11 ||

माहेश्वरी च ब्रह्माणी विष्णुमाया च वैष्णवी |
भद्रदा भद्रकाली च सर्वलोकभयंकरी || 12 ||

ग्रामे ग्रामे ग्रामदेवी गृहदेवी गृहे गृहे |
सतां कीर्तिः प्रतिष्ठा च निंदा त्वमसतां सदा || 13 ||

महायुद्धे महामारी दुष्टसंहाररूपिणी |
रक्षास्वरूपा शिष्टानां मातेव हितकारिणी || 14 ||

वंद्या पूज्या स्तुता त्वं च ब्रह्मादीनां च सर्वदा |
ब्रह्मण्यरूपा विप्राणां तपस्या च तपस्विनां || 15 ||

विद्या विद्यावतां त्वं च बुद्धिर्बुद्धिमतां सतां |
मेधा स्मृतिस्वरूपा च प्रतिभा प्रतिभावतां || 16 ||

राज्ञां प्रतापरूपा च विशां वाणिज्यरूपिणी |
सृष्टौ सृष्टिस्वरूपा त्वं रक्षारूपा च पालने || 17 ||

तथांते त्वं महामारी विश्वे विश्वैश्च पूजिते |
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च मोहिनी || 18 ||

दुरत्यया मे माया त्वं यया सम्मोहितं जगत् |
यया मुग्धो हि विद्वांश्च मोक्षमार्गं न पश्यति || 19 ||

इत्यात्मना कृतं स्तोत्रं दुर्गाया दुर्गनाशनं |
पूजाकाले पठेद्यो हि सिद्धिर्भवति वांछिता || 20 ||

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे द्वितीये प्रकृतिखंडे नारदनारायणसंवादे दुर्गोपाख्याने षट्षष्टितमोऽध्याये श्री दुर्गा स्तोत्रं |

अर्थ

श्री कृष्ण कृत दुर्गा स्तोत्रं जगज्जननी दुर्गा देवी की स्तुति में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहा गया एक अत्यंत शक्तिशाली और महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसमें दुर्गा देवी को सृष्टि, स्थिति और संहार – तीनों कार्यों का संचालन करने वाली पराशक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। वे मूल प्रकृति, त्रिगुणात्मिका शक्ति, सत्यरूपिणी और नित्य सनातनी स्वरूपिणी हैं। समस्त जगत का आधार, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमयी वे ही हैं।

भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि देवी सगुण रूप में संसार के समस्त व्यवहारों का संचालन करती हैं, किंतु अपने वास्तविक स्वरूप में वे पूर्णतः निर्गुण परब्रह्म हैं। वे तेज का स्वरूप हैं और भक्तों की रक्षा तथा उन पर कृपा करने के लिए अनुग्रह-विग्रह धारण करने वाली दयालु माता हैं। समस्त सृष्टि का उद्गम उन्हीं से होता है, वे ही सभी बीजों का मूल स्वरूप हैं। देवता, योगी, सिद्ध और मुनि – सभी वर्गों को देवी ही शक्ति प्रदान करने वाली योगदात्री हैं।

अनंत दिव्य गुणों में – ज्ञान, शक्ति, बुद्धि, तपस्या, धैर्य, क्षमा, शांति, तृप्ति, शोभा, विश्रांति, दया, श्रद्धा और पुष्टि – ये सभी देवी के ही विविध रूप हैं। सत्पुरुषों के लिए वे संपत्ति का रूप हैं, जबकि दुष्टों का पतन भी उनकी ही क्रिया है। भक्तों की रक्षा करने वाली रक्षक रूपिणी और दुष्टों का संहार करने वाली उनकी ही शक्ति का रूप है। वे माहेश्वरी, ब्रह्माणी, वैष्णवी, भद्रकाली, ग्रामदेवता और गृहदेवी – ये सभी रूपांतरण एक ही शक्ति के गर्भ से हैं।

शिष्टों की रक्षा करने वाली मातृरूपिणी, दुष्ट संहारिणी, महामारी नाशिनी और युद्ध में सहायक भी वे ही हैं। वे विद्या का रूप, बुद्धि का रूप, मेधा का रूप, राज्य के प्रताप का रूप, वाणिज्य की उन्नति का आधार, तथा सृष्टि-पालन-लय जैसी जगत्-व्यवस्थाओं का आधार हैं। अंततः श्रीकृष्ण कहते हैं कि देवी की माया दुरत्यय है, अर्थात इसे पार करना अत्यंत कठिन है। उनकी शक्ति के कारण ही समस्त लोक मोहित रहता है।

जो इस शक्ति का स्मरण करते हैं, उन्हें ही मोक्ष का मार्ग दिखाई देता है। भगवान श्रीकृष्ण ने यह आश्वासन दिया है कि इस स्तोत्र का पूजा काल में भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों की कोई भी मनोकामना शीघ्र पूर्ण होती है और उन्हें देवी का दिव्य संरक्षण प्राप्त होता है।

लाभ (Benefits):

  • संकटों से रक्षा: दुष्ट शक्तियों, दुर्घटनाओं और ग्रह दोषों से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • शक्ति और ज्ञान की वृद्धि: शारीरिक और मानसिक शक्ति, ज्ञान, धैर्य तथा ऐश्वर्य में वृद्धि होती है।
  • शैक्षणिक और बौद्धिक विकास: छात्रों को उत्तम स्मृति शक्ति, प्रतिभा और शैक्षणिक प्रगति मिलती है।
  • शत्रु नाश और रोग मुक्ति: शत्रुओं पर विजय, रोगों से शांति और परिवार में कल्याण की प्राप्ति होती है।
  • योग सिद्धि और मानसिक शांति: आध्यात्मिक उन्नति, योग सिद्धि, मानसिक स्थिरता और मोक्ष मार्ग में प्रगति प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कृष्ण कृत दुर्गा स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं दुर्गा देवी की स्तुति में कहा गया एक शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें देवी दुर्गा को सृष्टि, स्थिति और संहार की अधिष्ठात्री पराशक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद या किसी भी शुभ अवसर पर, विशेषकर नवरात्रि या शुक्रवार को करना उत्तम है। देवी की मूर्ति या चित्र के समक्ष धूप-दीप जलाकर शुद्ध मन से पाठ करें।
श्री कृष्ण कृत दुर्गा स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से दुष्ट शक्तियों से रक्षा, शक्ति, ज्ञान, ऐश्वर्य में वृद्धि, विद्या और प्रतिभा का विकास, शत्रुओं का नाश, रोगों से मुक्ति और मानसिक शांति मिलती है। यह मोक्ष मार्ग में प्रगति में सहायक है।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
जो कोई भी दुर्गा देवी में श्रद्धा रखता है, वह लिंग या आयु के भेद के बिना इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से जो सुरक्षा, ज्ञान और समृद्धि चाहते हैं, उन्हें नियमित रूप से इसका पाठ करना चाहिए।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना उचित है?
सामान्यतः प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना शुभ माना जाता है। विशेष अवसरों पर 11, 21 या 108 बार पाठ करने से अधिक फल प्राप्त होता है, ऐसी मान्यता है।
इस स्तोत्र का उद्गम या पृष्ठभूमि क्या है?
यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में पाया जाता है। यह उस प्रसंग का वर्णन करता है जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं दुर्गा देवी की स्तुति की थी, इसलिए इसे 'श्री कृष्ण कृत' कहा जाता है।

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