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श्री दुर्गा कवचं (ब्रह्मांडमोहनं)

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स्तोत्रदुर्गा देवी
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श्री दुर्गा कवचं (ब्रह्मांडमोहनं)

नारायण उवाच |
ॐ दुर्गेति चतुर्थ्यंतः स्वाहांतो मे शिरोऽवतु |
मंत्रः षडक्षरोऽयं च भक्तानां कल्पपादपः || 1 ||

विचारो नास्ति वेदेषु ग्रहणेऽस्य मनोर्मुने |
मंत्रग्रहणमात्रेण विष्णुतुल्यो भवेन्नरः || 2 ||

मम वक्त्रं सदा पातु ॐ दुर्गायै नमोऽंततः |
ॐ दुर्गे रक्षयति च कंठं पातु सदा मम || 3 ||

ॐ ह्रीं श्रीमिति मंत्रोऽयं स्कंधं पातु निरंतरं |
ह्रीं श्रीं क्लीमिति पृष्ठं च पातु मे सर्वतः सदा || 4 ||

ह्रीं मे वक्षःस्थलं पातु हस्तं श्रीमिति संततं |
श्रीं ह्रीं क्लीं पातु सर्वांगं स्वप्ने जागरणे तथा || 5 ||

प्राच्यां मां प्रकृतिः पातुः पातु वह्नौ च चंडिका |
दक्षिणे भद्रकाली च नैरृत्यां च महेश्वरी || 6 ||

वारुण्यां पातु वाराही वायव्यां सर्वमंगला |
उत्तरे वैष्णवी पातु तथैशान्यां शिवप्रिया || 7 ||

जले स्थले चांतरिक्षे पातु मां जगदंबिका |
इति ते कथितं वत्स कवचं च सुदुर्लभं || 8 ||

यस्मै कस्मै न दातव्यं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् |
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालंकारचंदनैः |
कवचं धारयेद्यस्तु सोऽपि विष्णुर्न संशयः || 9 ||

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे प्रकृतिखंडे नारदनारायणसंवादे दुर्गोपाख्याने सप्तषष्टितमोऽध्याये ब्रह्मांडमोहनं नाम श्री दुर्गा कवचं |

अर्थ

श्री दुर्गा कवचम (ब्रह्मांडमोहनं) एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली रक्षा कवच है, जिसे देवर्षि नारद के पूछने पर स्वयं भगवान श्रीनारायण ने प्रकट किया था। इस कवच में, भगवान नारायण बताते हैं कि 'ॐ दुर्गायै नमः' यह षडाक्षर महामंत्र दुर्गादेवी की संपूर्ण कृपा प्राप्त करने के लिए कल्पवृक्ष के समान कार्य करता है। वेदों में भी इसके ग्रहण के लिए किसी विशेष विचार या संशय की आवश्यकता नहीं है, केवल इस मंत्र को स्वीकार करने मात्र से ही भक्त विष्णु के समान पुण्य का अधिकारी बन जाता है। यह इस कवच की अद्वितीय आध्यात्मिक शक्ति और प्रभावकारिता को दर्शाता है।

यह कवच शरीर के प्रत्येक अंग को दुर्गादेवी के विभिन्न रूपों, बीजाक्षरों और शक्तियों से रक्षा करने की प्रार्थना करता है। सिर से पैर तक, 'ॐ दुर्गे', 'ॐ दुर्गायै नमः', 'ह्रीं, श्रीं, क्लीं' जैसे मंत्रों को शक्तिशाली बीजमंत्रों के रूप में वर्णित किया गया है, जो सिर, कंठ, कंधे, छाती, रीढ़ और हाथों की रक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं। कवच कहता है कि स्वप्न और जाग्रत अवस्था दोनों में ही भक्त की सर्वांग रक्षा के लिए देवी के बीजाक्षर एक ढाल के रूप में कार्य करते हैं। यह केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर और आध्यात्मिक अस्तित्व के लिए भी सुरक्षा प्रदान करता है।

कवच में यह भी उल्लेख है कि दुर्गादेवी के अनेक रूप सभी दिशाओं से भक्त की रक्षा करते हैं—पूर्व में प्रकृति देवी, आग्नेय कोण में चंडिका, दक्षिण में भद्रकाली, नैऋत्य में माहेश्वरी, पश्चिम में वाराही, वायव्य में सर्वमंगला, उत्तर में वैष्णवी और ईशान कोण में शिवप्रिया। यह कवच आश्वासन देता है कि जगदंबिका माँ पृथ्वी, जल और आकाश—तीनों लोकों में भक्त की रक्षा करती हैं। यह न केवल भौगोलिक बल्कि अलौकिक और अदृश्य शक्तियों से भी सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जिससे भक्त को हर स्थिति में अभय प्राप्त होता है।

इस कवच की पवित्र और गोपनीय प्रकृति के कारण, भगवान नारायण चेतावनी देते हैं कि इसे किसी को भी आसानी से नहीं देना चाहिए या बताना नहीं चाहिए। वे कहते हैं कि गुरु की श्रद्धापूर्वक पूजा करने के बाद ही इसे ग्रहण करने वाले व्यक्ति के लिए यह एक महान रक्षा कवच बनता है। अंत में, यह निश्चित रूप से घोषित किया जाता है कि इस कवच को धारण करने वाला या पाठ करने वाला व्यक्ति भगवान विष्णु के समान पवित्रता, सुरक्षा और शक्ति प्राप्त करता है। यह भक्त को दिव्य सान्निध्य के करीब लाता है और उसके जीवन में पूर्ण सुरक्षा तथा समृद्धि लाता है।

लाभ (Benefits):

  • अत्यंत शक्तिशाली दिव्य सुरक्षा: दुर्गादेवी के विभिन्न रूपों और बीजाक्षरों के माध्यम से सर्वांग सुरक्षा प्राप्त होती है, जो भक्त को किसी भी प्रकार के अनिष्ट से बचाती है।
  • समग्र भय निवारण: शरीर, मन और जीवन में व्याप्त भय, अशुभ प्रभाव, बाधाएं और खतरे दूर होते हैं। यह आंतरिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
  • दिशाओं और लोकों में सुरक्षा: अष्ट दिशाओं में और पृथ्वी, जल, आकाश नामक तीनों लोकों में देवी की सुरक्षा होने से भक्त हर जगह सुरक्षित रहता है।
  • स्वप्न दोष और बुरी शक्तियों का निवारण: स्वप्न दोष, दुर्घटनाएं, नजर दोष, अग्नि, जल और शत्रु भय दूर होते हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
  • आध्यात्मिक शक्ति और साहस में वृद्धि: कवच के निरंतर पाठ से आध्यात्मिक शक्ति, आत्मविश्वास, साहस और मानसिक शांति बढ़ती है, जो जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सहायता करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रह्मांड मोहन दुर्गा कवचम क्या है?
यह देवर्षि नारद को भगवान नारायण द्वारा बताया गया एक अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय रक्षा कवच है। यह दुर्गादेवी के विभिन्न रूपों और बीजाक्षरों के माध्यम से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से करना उत्तम होता है। गुरु की पूजा करने के बाद इसे ग्रहण कर, श्रद्धापूर्वक पाठ करने से अधिक लाभ मिलते हैं।
ब्रह्मांड मोहन दुर्गा कवचम के पाठ से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इसके पाठ से दिव्य सुरक्षा, भय निवारण, अष्ट दिशाओं में सुरक्षा, स्वप्न दोषों का निवारण और आध्यात्मिक शक्ति, साहस तथा शांति में वृद्धि होती है।
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
दुर्गादेवी में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस कवच का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से भय, बाधाओं या खतरों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
दैनिक पाठ के लिए इसे दिन में एक बार या तीन बार पढ़ा जा सकता है। विशेष अवसरों पर या अधिक सुरक्षा की आवश्यकता होने पर इसे अधिक बार भी पढ़ा जा सकता है।
इस कवच का मूल या उद्गम क्या है?
यह कवच तब प्रकट हुआ जब देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से पूछा, और नारायण ने लोक कल्याण के लिए इसे उजागर किया। यह प्राचीन और पवित्र हिंदू ग्रंथों में उल्लिखित है।

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