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श्री सूर्य स्तुतिः (ब्रह्म कृतं)

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श्री सूर्य स्तुतिः (ब्रह्म कृतं)

ब्रह्मोवाच |
आदिदेवोऽसि देवानामैश्वर्याच्च त्वमीश्वरः |
आदिकर्ताऽसि भूतानां देवदेवो दिवाकरः || 1 ||

जीवनः सर्वभूतानां देवगंधर्वरक्षसां |
मुनिकिन्नरसिद्धानां तथैवोरगपक्षिणां || 2 ||

त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः |
वायुरिंद्रश्च सोमश्च विवस्वान् वरुणस्तथा || 3 ||

त्वं कालः सृष्टिकर्ता च हर्ता भर्ता तथा प्रभुः |
सरितः सागराः शैला विद्युदिंद्रधनूंषि च || 4 ||

प्रळयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः |
ईश्वरात्परतो विद्या विद्यायाः परतः शिवः || 5 ||

शिवात्परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वरः |
सर्वतः पाणिपादांतः सर्वतोक्षिशिरोमुखः || 6 ||

सहस्रांशुः सहस्रास्यः सहस्रचरणेक्षणः |
भूतादिर्भूर्भुवः स्वश्च महः सत्यं तपो जनः || 7 ||

प्रदीप्तं दीपनं दिव्यं सर्वलोकप्रकाशकं |
दुर्निरीक्ष्यं सुरेंद्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः || 8 ||

सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिपुलहादिभिः |
स्तुतस्य परमव्यक्तं यद्रूपं तस्य ते नमः || 9 ||

वेद्यं वेदविदां नित्यं सर्वज्ञानसमन्वितं |
सर्वदेवाधिदेवस्य यद्रूपं तस्य ते नमः || 10 ||

विश्वकृद्विश्वभूतं च वैश्वानरसुरार्चितं |
विश्वस्थितमवेद्यं च यद्रूपं तस्य ते नमः || 11 ||

परं यज्ञात्परं वेदात्परं लोकात्परं दिवः |
परमात्मेत्यभिख्यातं यद्रूपं तस्य ते नमः || 12 ||

अविज्ञेयमनालक्ष्यमध्यानगतमव्ययं |
अनादिनिधनं चैव यद्रूपं तस्य ते नमः || 13 ||

नमो नमः कारणकारणाय
नमो नमः पापविमोचनाय |
नमो नमस्तेऽदितिवंदिताय
नमो नमो रोगविनाशनाय || 14 ||

नमो नमः सर्ववरप्रदाय
नमो नमः सर्वसुखप्रदाय |
नमो नमः सर्वधनप्रदाय
नमो नमः सर्वमतिप्रदाय || 15 ||

इति श्रीब्रह्मपुराणे एकत्रिंशोऽध्याये ब्रह्मकृत श्री सूर्य स्तुतिः |

अर्थ

ब्रह्मदेव द्वारा रचित यह 'श्री सूर्य स्तुति' भगवान सूर्य को परब्रह्म स्वरूप, जगत के मूल कारण और समस्त दैवीय शक्तियों के आधार के रूप में महिमामंडित करती है। ब्रह्मदेव स्वयं सूर्य के वैश्वानर महिमा, तेज और सृष्टि-स्थिति-लय चक्र में उनके दिव्य कार्यों की प्रशंसा करते हुए इस स्तोत्र का गंभीर उद्घोष करते हैं। यह स्तुति उन्हें आदिदेव, देवताओं में श्रेष्ठ और समस्त लोकों के जीवनदाता के रूप में वर्णित करती है।

स्तोत्र के अनुसार, देवता, गंधर्व, राक्षस, मुनि, किन्नर, सिद्ध, पक्षी, सर्प – सभी प्राणियों की जीवनशक्ति सूर्य की किरणों में ही निहित है। सूर्य केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, प्रजापति, वायु, इंद्र, सोम, वरुण जैसे समस्त दैवीय शक्तियों के प्रतीक स्वरूप हैं। भगवान सूर्य काल के अधिपति हैं, और वे सृष्टि, रक्षा तथा संहार के प्रभु हैं।

नदियाँ, सागर, पर्वत, मेघ, विद्युत – ये सभी सूर्य से ही उत्पन्न होते हैं और उन्हीं में विलीन हो जाते हैं। वे व्यक्त, अव्यक्त, प्रलय के कारण और सनातन स्वरूप हैं। ब्रह्मदेव सूर्य को विद्या का परम कारण और शिवतत्व से भी परे परमेश्वर स्वरूप के रूप में वर्णित करते हैं। उनकी सहस्र किरणें समस्त लोकों को प्रकाशित करती हैं; उनका स्वरूप देवताओं के लिए भी सहज दर्शन योग्य नहीं, अत्यंत दिव्य है।

भृगु, अत्रि, पुलह आदि सुरों, सिद्धों और ऋषियों द्वारा सदा स्तुत उनका स्वरूप परम व्यक्त है, वेदों द्वारा ज्ञात परम तत्व है। वे विश्वकर्ता, विश्वस्थिति के आधार, वैश्वानर शक्ति के प्रतीक, परम यज्ञ, परम वेद, परलोकनाथ और परमात्मा हैं। इस स्तोत्र के अंतिम श्लोकों में, सूर्य को पापों का नाश करने वाला, रोगों का हरण करने वाला, वरदान देने वाला, सुखदाता, धन-संपदा का कर्ता, और बुद्धि, मति, ज्ञान प्रदान करने वाला देवता घोषित किया गया है। ब्रह्मदेव इस स्तोत्र के माध्यम से स्पष्ट करते हैं कि सूर्य की कृपा दृष्टि जीवन को परिवर्तित कर देती है।

प्रयोजन (Benefits):

  • शरीर के रोग, पाप-बंधन और बाधाएँ दूर होती हैं।
  • उत्तम स्वास्थ्य, धैर्य, बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है।
  • धन-संपत्ति, शांति, सुख और विजय प्राप्त होती है।
  • ग्रह दोष, भय और दरिद्रता का नाश होता है।
  • आध्यात्मिक प्रकाश, धर्मबुद्धि और जीवनशक्ति में वृद्धि होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री सूर्य स्तुति (ब्रह्म कृतं) क्या है?
ब्रह्मदेव द्वारा रचित श्री सूर्य स्तुति एक पवित्र स्तोत्र है जो भगवान सूर्य को परब्रह्म स्वरूप, जगत के मूल कारण और समस्त दैवीय शक्तियों के आधार के रूप में महिमामंडित करती है। यह सृष्टि, स्थिति और लय के कार्यों में सूर्य की भूमिका का वर्णन करती है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह सूर्योदय के समय, स्नान के बाद शुद्ध मन से करना श्रेष्ठ माना जाता है। सूर्य के सम्मुख खड़े होकर या बैठकर पाठ करने से उत्तम फल प्राप्त होता है।
श्री सूर्य स्तुति के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से रोग, पाप और बाधाएँ दूर होती हैं, तथा उत्तम स्वास्थ्य, धैर्य, बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त, धन-संपत्ति, शांति और विजय की प्राप्ति होती है।
किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
सूर्य की कृपा चाहने वाले, स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति, ज्ञान और बुद्धिमत्ता बढ़ाने के इच्छुक और ग्रह दोषों से मुक्ति पाने वाले इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। यह सभी के लिए अत्यंत लाभकारी है।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
उत्तम परिणामों के लिए इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन कम से कम 3, 9, 11, या 21 बार किया जा सकता है। निष्ठा और श्रद्धा के साथ पाठ करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र का मूल या रचनाकार कौन हैं?
यह स्तोत्र स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव द्वारा भगवान सूर्य की महिमा का गुणगान करने के लिए रचा गया है। यह पुराणों में वर्णित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तुति है।

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